संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स तु राजऋषिः संक्रुद्धो यज्ञवाटेऽखिले तथा ।।४५
मग्ने गंडूषजलवत्स पपौ तामशेषतः ।
मग्ने गंडूषजलवत्स षपौ तामशेषतः ।
अतंद्रितो वर्षशतं शुश्रूषित्वा स तं पुनः ।।४६
तस्मात्प्रसन्नान्नृपतिर्लेभे गंगां महात्मनः ।
उषित्वा सुचिरं तस्य निसृता जठराच्चतः ।।४७
प्रथितं जाह्नवीत्यस्यास्ततो नामाभवद्भुवि ।
भगीरथानुगा भूत्वा तत्पितॄणामशेषतः ।।४८
निजांभसाऽस्थिभस्मानि सिषेच सुरनिम्नगा ।
ततस्तदंभसा सिक्तेष्वस्थिभस्मसु तत्क्षणात् ।।४६
राजा भगीरथ ने जब ऐसा देखा तो उस गङ्गा देवी के प्रमोक्षण के लिये पुनः भगवान् शङ्कर की आराधना की थी। फिर भगवान् शिव के प्रसाद से राजा भगीरथ ने गङ्गा को भूमि पर लाने का कार्य सम्पन्न किया था।४३। राजा भगीरथ उस गङ्गा को उसी दिशा की ओर लाये थे जहाँ पर सगर सुत दग्ध हुए थे । वह गंगा राजा भगीरथ के पीछे ही अनुगमन कर रही थी कि उसके मार्ग में एक राजर्षि यज्ञ का यजन कर रहे थे।४४। गंगा देवी ने उसके यज्ञ स्थल को सभी ओर से पूर्णतया प्लावित कर दिया वह राजर्षि बहुत ही अधिक क्रुद्ध हो गया था जबकि गंगा के द्वारा उसका सब यज्ञ वाट निमग्न हो गया था। उस राजर्षि ने एक कुल्ली के ही समान उस सम्पूर्ण गंगा का पान कर लिया था। फिर बहुत ही सावधान होकर भगीरथ ने सौ वर्षों तक उस राजर्षि की शुश्रूषा की थी ।४५-४६। फिर जब वह राजर्षि प्रसन्न हुए तो भगीरथ ने उन महान् आत्मा वाले से गङ्गा की प्राप्ति की थी। बहुत समय पर्यन्त निवास करके फिर उनके जटा से गंगा निकली थी। इसीलिए सभी से जह्नु के उदर से निकलने से ही उनका भूमण्डल में जाह्नवी—यह नाम प्रख्यात हो गया था। फिर भागीरथ के पीछे अनुगमन करने वाली होकर उसके समस्त पितरों का उसने उद्धार कर दिया था ।४७-४८। फिर सुर नदी ने अपने परम पुनीत जल से सगर सुतों की अस्थियों और भस्म का सेवन किया था। गंगा जल के सेचन होने पर जो उनकी अस्थियाँ और भस्म पर हुआ था उसी क्षण में उन सबका उद्धार हो गया था ।४६।