संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स तु राजऋषिः संक्रुद्धो यज्ञवाटेऽखिले तथा ।।४५
मग्ने गंडूषजलवत्स पपौ तामशेषतः ।
मग्ने गंडूषजलवत्स षपौ तामशेषतः ।
अतंद्रितो वर्षशतं शुश्रूषित्वा स तं पुनः ।।४६
तस्मात्प्रसन्नान्नृपतिर्लेभे गंगां महात्मनः ।
उषित्वा सुचिरं तस्य निसृता जठराच्चतः ।।४७
प्रथितं जाह्नवीत्यस्यास्ततो नामाभवद्भुवि ।
भगीरथानुगा भूत्वा तत्पितॄणामशेषतः ।।४८
निजांभसाऽस्थिभस्मानि सिषेच सुरनिम्नगा ।
ततस्तदंभसा सिक्तेष्वस्थिभस्मसु तत्क्षणात् ।।४६
राजा भगीरथ ने जब ऐसा देखा तो उस गङ्गा देवी के प्रमोक्षण के लिये पुनः भगवान् शङ्कर की आराधना की थी। फिर भगवान् शिव के प्रसाद से राजा भगीरथ ने गङ्गा को भूमि पर लाने का कार्य सम्पन्न किया था।४३। राजा भगीरथ उस गङ्गा को उसी दिशा की ओर लाये थे जहाँ पर सगर सुत दग्ध हुए थे । वह गंगा राजा भगीरथ के पीछे ही अनुगमन कर रही थी कि उसके मार्ग में एक राजर्षि यज्ञ का यजन कर रहे थे।४४। गंगा देवी ने उसके यज्ञ स्थल को सभी ओर से पूर्णतया प्लावित कर दिया वह राजर्षि बहुत ही अधिक क्रुद्ध हो गया था जबकि गंगा के द्वारा उसका सब यज्ञ वाट निमग्न हो गया था। उस राजर्षि ने एक कुल्ली के ही समान उस सम्पूर्ण गंगा का पान कर लिया था। फिर बहुत ही सावधान होकर भगीरथ ने सौ वर्षों तक उस राजर्षि की शुश्रूषा की थी ।४५-४६। फिर जब वह राजर्षि प्रसन्न हुए तो भगीरथ ने उन महान् आत्मा वाले से गङ्गा की प्राप्ति की थी। बहुत समय पर्यन्त निवास करके फिर उनके जटा से गंगा निकली थी। इसीलिए सभी से जह्नु के उदर से निकलने से ही उनका भूमण्डल में जाह्नवी—यह नाम प्रख्यात हो गया था। फिर भागीरथ के पीछे अनुगमन करने वाली होकर उसके समस्त पितरों का उसने उद्धार कर दिया था ।४७-४८। फिर सुर नदी ने अपने परम पुनीत जल से सगर सुतों की अस्थियों और भस्म का सेवन किया था। गंगा जल के सेचन होने पर जो उनकी अस्थियाँ और भस्म पर हुआ था उसी क्षण में उन सबका उद्धार हो गया था ।४६।
गंगा का पृथ्वी पर आगमन ] [ ५६
निर्यातात्सागराः सर्वे नष्टपापा दिवं ययुः ।
एवं सा सागरान्सर्वान्दिवं नीत्वा महानदी ॥५०
तेनैव मार्गेण जवात्प्रयाता पूर्वसागरम् ।
मेरोर्मूध्नँश्चतुर्भेदा भूत्वा याता चतुर्दिशम् ॥५१
चतुर्भेदतया चाभूत्तस्या नाम्नां चतुष्टयम् ।
सीता चालकनंदा च सुचक्षुर्भद्रवत्यपि ॥५२
अगस्त्यपीतसलिलाच्चिरं शुष्कोदका अपि ।
गंगांभसा पुनः पूर्णाश्चत्वारोऽम्बुधयोऽभवन् ॥५३
पूर्यमाणे समुद्रे तु सागरैः परिवर्द्धिते ।
अंतर्हिताऽभवन्देशा बहवस्तत्समीपगाः ॥५४
समुद्रोपांतवर्त्तीनि क्षेत्राणि च समंततः ।
इतस्ततः प्रयाताश्च जनास्तन्निलया नृप ॥५५
गोकर्णमिति च क्षेत्रं पूर्वं प्रोक्तं तु यत्तव ।
अर्णवोपात्तवर्त्तित्वात्समुद्रैंस्तद्विभागमत् ॥५६
ततस्तन्निलयाः सर्वे तदुद्धाराभिकांक्षिणः ।
सह्याद्रेर्भृगुशार्दूलं द्रष्टुकामा ययुर्नृप ॥५७
नरकों में जो घोर यातना पा रहे थे वे सभी सगर के पुत्र समस्त पापों के नष्ट होने से नरक से उसी क्षण में स्वर्ग लोक में चले गये थे। इस रीति से उस महा नदी ने सब सगर सुतों को स्वर्ग में पहुँचा कर फिर वहन करने लगी थी ।५०। उसी मार्ग से बड़े वेग से उसने पूर्व सागर की ओर प्रयाण किया था। मेरु पर्वत के मस्तक से चार भेद होकर वह चारों दिशाओं में गमन कर गयी थी ।५१। उसके चार भेद होने से उसके नाम भी चार हो गये थे। वे नाम में हैं—सीता—अलक नन्दा— सुचक्षु और भद्रवती ये चार नाम हुए हैं ।५२। अगस्त्य मुनि के द्वारा जल पीये जाने पर बहुत समय तक जल के शुष्क ही जाने वाले चारों समुद्र भी गंगा के जल से पुनः परिपूर्ण जल वाले हो गये थे ।५३। समुद्र के पूरित होने पर और सगर सुतों के द्वारा परिवर्द्धित हो जाने पर उसके समीप में स्थित बहुत से
६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
देश थे वे सब लुप्त हो गये थे अर्थात् समुद्र में लीन हो गये थे ।५४। समुद्र के समीप में रहने वाले समस्त क्षेत्र सभी ओर से निमग्न हो गये थे और हे नृप ! वहाँ पर जो भी जन निवास करते थे वे सभी इधर-उधर चले गये थे ।५५। गोकर्ण नाम वाला क्षेत्र है जिसके विषय में पूर्व में ही आपसे कहा गया था। वह समुद्र के ही समीप में विद्यमान होने से समुद्र के ही अन्दर में छिप गया था ।५६। इसके अनन्तर उसके विनाश करने वाले सब उसके उद्धार की आकाङ्क्षा वाले थे और सह्य अद्रि पर भृगुशार्दूल की देखने की इच्छा वाले हे नृप ! वे सब वहाँ गये थे ।५७।
गान्धर्व मूर्छना लक्षण
सूत उवाच-
विसर्गं मनुपुत्राणां विस्तरेण निबोधत ।
पृषध्रो हिंसयित्वा तु गुरोर्गां निशि तत्क्षये ॥१
शापाच्छूद्रत्वमापन्नश्च्यवनस्य महात्मनः ।
करूषस्य तु कारूषाः क्षत्रिया युद्धदुर्मदाः ॥२
सहस्रं क्षत्रियगणो विक्रान्तः संबभूव ह ।
नाभागो दिष्टपुत्रस्तु विद्वानासीद्द्वालंदनः ॥३
भलंदनस्य पुत्रोऽभूत्प्रांशुर्नाममहाबलः ।
प्रांशोरेकोऽभवत्पुत्रः प्रजापतिसमो नृपः ॥४
संवर्तेन दिवं नीतः समुहृत्सहबांधवः ।
विवादोऽत्र महानासीत्संवर्त्तस्य वृहस्पतेः ॥५
ऋद्धिं दृष्ट्वा तु यज्ञस्य क्रुद्धस्तस्य वृहस्पतिः ।
संवर्त्तेन तते यज्ञे चुकोप स भृशं तदा ॥६
लोकानां स हि नाशाय दैवतैर्हि प्रसादितः ।
मरुत्तश्चक्रवर्त्ती स नरिष्यंतमवासवान् ॥७
श्री सूतजी ने कहा—अब आप मनु के पुत्रों का विसर्ग विस्तार के साथ समझ लीजिए। पृषध्र रात्रि में गुरुदेव की गौ की हिंसा करके उसके क्षय होने पर महात्मा च्यवन के शाप से शूद्रता को प्राप्त हो गया था। करूष
गान्धर्व मूर्छना लक्षण ] [ ६१
के कारूष क्षत्रिय हुए थे जो युद्ध करने में दुर्मद थे ।१-२। यह एक सहस्र क्षत्रियों का समुदाय था जो बहुत ही अधिक विक्रान्त हुआ था दिष्ट पुत्र नाभाग था और भलन्दन विद्वान था ।३। इस भलन्दन का पुत्र महान् बल-वान् प्रांशु नाम वाला हुआ था। प्रांशु का एक ही पुत्र हुआ था जो नृप प्रजापति के ही समान था ।४। उसको सुहृत् और बान्धवों के साथ संवर्त्त के द्वारा स्वर्ग में ले जाया गया था। इस विषय में संवर्त्त का और वृहस्पति का बड़ा भारी विवाद हुआ था ।५। उसके यज्ञ की ऋद्धि का अवलोकन करके वृहस्पति क्रुद्ध हो गये थे। संवर्त्त के द्वारा यज्ञ के विस्तृत होने पर उस समय में वह अत्यधिक कुपित हो गया था ।६। लोकों के विनाश करने के लिए देवगणों के द्वारा वह प्रसन्न किया था। मरुत चक्रवर्त्ती उसने नरिष्यन्त को बसाया था ।७।
नरिष्यंतस्य दायादो राजा दंडधरो दमः ।
तस्य पुत्रस्तु विज्ञातो राजाऽसीद्राष्ट्रवर्द्धनः ॥८
सुधृतिस्तस्य पुत्रस्तु नरः सुधृतितः पुनः ।
केवलस्य पुत्रस्तु बंधुमान्केवलात्मजः ॥९
अथ बंधुमतः पुत्रो धर्मात्मा वेगवान्नृप ।
बुधो वेगवतः पुत्रस्तृणबिंदुर्बुधात्मजः ॥१०
त्रेतायुगमुखे राजा तृतीये संबभूव ह ।
कन्या तु तस्येडविडा माता विश्रवसो हि सा ॥११
पुत्रो योऽस्य विशालोऽभूद्राजा परमधार्मिकः ।
दाश्वान्प्रख्यातवीर्य्योऽजा विशाला येन निर्मिता ॥१२
विशालस्य सुतो राजा हेमचन्द्रो महाबलः ।
सुचन्द्र इति विख्यातो हेमचन्द्रादनन्तरः ॥१३
सुचन्द्रतनयो राजा धूम्राश्व इति विश्रुतः ।
धूम्राश्वतनयो विद्वान्सृंजयः समपद्यत ॥१४
नरिष्यन्त का दायाद दण्डधर राजा दम था। उसका पुत्र परम विद्वान राष्ट्र वर्धन राजा हुआ था ।८। उसका पुत्र सुधृति हुआ था और फिर सुधृति से नर पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था। केवल का पुत्र तो एक
६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
केवलात्मज बन्धुमान् हुआ था ।९। हे नृप ! फिर बन्धुमान् के यहाँ धर्मात्मा वेगवान् ने पुत्र के रूप में जन्म धारण किया था। वेगवान् का पुत्र बुध हुआ था और बुध का पुत्र तृण बन्धु उत्पन्न हुआ था ।१०। तृतीय त्रेता के मुख में राजा हुआ था। उसकी कन्या इडविडा थी जो विश्रवा की माता थी ।११। इसका पुत्र विशाल राजा हुआ था जो परम धार्मिक था। यह दाश्वान् और प्रख्यात वीर्य तथा ओज वाला था जिसने विशाल का निर्माण किया था ।१२। इस विशाल का पुत्र महाबलवान् हेमचन्द्र उत्पन्न हुआ था। इस हेमचन्द्र के अनन्तर सुचन्द्र नाम वाला विख्यात हुआ था ।१३। सुचन्द्र का पुत्र राजा धूम्राश्व हुआ था जो प्रसिद्ध था और धूम्राश्व का पुत्र परम विद्वान् सृंजय हुआ था ।१४।
सृञ्जयस्य सुतः श्रीमान्सहदेवः प्रतापवान् ।
कृशाश्वः सहदेवस्य पुत्रः परमधार्मिकः ॥१५
कृशाश्वस्य महातेजा सोमदत्तः प्रतापवान् ।
सोमदत्तस्य राजर्षेः सुतोऽभूज्जनमेजयः ॥१६
जनमेजयात्मजश्चैव प्रमतिर्नाम विश्रुतः ।
तृणबिंदुप्रभावेण सर्वे विशालका नृपाः ॥१७
दीर्घायुषो महात्मानो वीर्यवन्तः सुधार्मिकाः ।
शर्यातेर्मिथुनं त्वासीदानर्त्तो नाम विश्रुतः ॥१८
पुत्रः सुकन्या कन्या च भार्या या च्यवनस्य च ।
आनर्त्तस्य तु दायादो रेवो नाम सुवीर्यवान् ॥१९
आनर्त्तविषयो यस्य पुरी चापि कुशस्थली ।
रेवस्य रेवतः पुत्रः ककुद्मी नाम धार्मिकः ॥२०
ज्येष्ठो भ्रातृशतस्यासीद्राज्यं प्राप्य कुशस्थलीम् ।
कन्यया सह श्रुत्वा च गांधर्वं ब्रह्मणोऽन्तिके ॥२१
इस सृंजय का जो पुत्र समुत्पन्न हुआ था वह श्री सम्पन्न और प्रताप वाला सहदेव था। सहदेव के पुत्र का नाम कृशाश्व था। यह भी परम धार्मिक हुआ था ।१५। कृशाश्व का तनय सोमदत्त हुआ था जो महान तेज वाला था और परम प्रतापी था। राजर्षि सोमदत्त के यहां जनमेजय ने पुत्र
गान्धर्वं मूच्छेना लक्षण ] [ ६३
के रूप में जन्म धारण किया था। १६। इस जनमेजय का पुत्र प्रमति नाम वाला बहुत ही प्रख्यात हुआ था। तृणबिन्दु के प्रभाव से ये सब वैशालक नृप हुए थे। १७। ये सभी सुदीर्घ आयु वाले—महान् समुच्च आत्माओं वाले—बल—वीर्य से सुसमन्वित और बहुत ही अधिक धार्मिक वृत्ति वाले हुए थे। शर्याति के एक जोड़ा हुआ था जो आनर्त्त के नाम विश्रुत था। १८। एक पुत्र था और एक सुकन्या नाम वाली कन्या थी जो च्यवन ऋषि की भार्या थी। उस आनर्त्त के दायको ग्रहण करने वाला पुत्र रेव नामक हुआ था जो बड़ा वीर्य वाला था। १६। आनर्त्त का देश था जिसको कुशस्थली नाम वाली पुरी थी। रेव का पुत्र रेवत ककुद्मी नाम वाला बड़ा धार्मिक हुआ था। २०। यह सौ भाइयों में सबसे बड़ा था। इसने ही कुशस्थली के राज्य को प्राप्त किया था। ब्रह्माजी के समीप में कन्या का श्रवण करके उसके साथ गन्धर्व ज्ञान कर लिया था। २१।
मुहूर्त्तं देवदेवस्य मार्त्यं बहुयुगं विभो।
आजगाम युवा चैव स्वां पुरीं यादवैर्वृताम् ॥२२
कृतां द्वारवतीं नाम बहुद्वारां मनोरमाम् ।
भोजवृष्ण्यन्धकैर्गुप्तां वसुदेवपुरोगमैः ॥२३
तां कथां रेवतः श्रुत्वा यथातत्त्वमरिंदमः।
कन्यां तु बलदेवाय सुव्रतां नाम रेवतीम् ।
दत्त्वा जगाम शिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः ॥२४
रेमे रामश्च धर्मात्मा रेवत्या सहितः किल ।
तां कथामृषयः श्रुत्वा पप्रच्छुस्तदनंतरम् ॥२५
ऋषय ऊचुः-
कथं बहुयुगे काले समतीते महामते।
न जरा रेवतीं प्राप्ता रैवतं वा ककुद्मिनम् ।
एतच्छुश्रूषमाणान्नो गान्धर्वं वद चैव हि ॥२६
सूत उवाच-
न जरा क्षुत्पिपासे वा न च मृत्युभय ततः ।
न च रोगः प्रभवति ब्रह्मलोकं गतस्य ह ॥२७
६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गांधर्वं प्रति यच्चापि पृष्टस्तु मुनिसत्तमाः । ततोऽहं संप्रवक्ष्यामि याथातथ्येन सुव्रताः ॥२८
हे विभो ! वह समय देवों के देव का तो एक ही मुहूर्त था और मनुष्यों का वह समय बहुत से युगों के बराबर था । फिर वह युवा यादवों के समुदायों से घिरी हुई अपनी पुरी में आ गया था ।२२। वह पुरी द्वारवती नाम वाली की गयी थी जिसमें बहुत से द्वार थे और यह परम मनोहर थी । भोज-वृष्णि और अन्धक जो यादवों के विभिन्न भेद थे जिनमें वसुदेव अग्र-गामी थे—इन सबने उसकी रक्षा की थी ।२३। अरियों के दमन करने वाले रैवत ने ठीक तात्त्विक रूप से उस कथा का श्रवण किया और फिर उसने अपनी सुन्दर व्रत वाली रेवती नाम वाली कन्या को बलदेवजी के लिए समर्पित करके वह फिर मेरु पर्वत के शिखर तप चला गया था और वहाँ पर करने में संस्थित हो गया था ।२४। फिर बलरामजी भी जो परम धर्मात्मा थे, अपनी प्रिय पत्नी रेवती के साथ रमण किया करते थे । इस कथा को ऋषियों ने श्रवण करके इसके पश्चात उन्होंने पूछा था ।२५। ऋषियों ने कहा—हे महामते ! बहुत युगों वाले काल के व्यतीत जाने पर भी रेवती को और ककुद्मी रैवत को जरावस्था किस कारण से प्राप्त नहीं हुई थी ? इस सबके श्रवण करने की इच्छा वालों को वह गान्धर्व क्या है—यह भी बतलाने की कृपा कीजिए ।२६। श्रीसूतजी ने कहा-जो प्राणी ब्रह्म लोक में गमन कर जाया करता है उसको न तो कोई रोग ही होता है और उसको न मृत्यु का भय रहता है । वहां पर जरा और भूख प्यास भी नहीं सताया करती हैं ।२७। हे श्रेष्ठ मुनिगणो ! आपने जो मुझसे गान्धर्व के विषय में पूछा है उसको भी मैं हे सुव्रतो ! ठीक-ठीक रूप से बतलाऊँगा ।२८।
सप्त स्वरात्रयो ग्रामा मूर्छनास्त्वेकविंशतिः । तानाश्चैकोनपंचाशदित्येतत्स्वरमंडलम् ॥२६ षड्जर्षभौ च गांधारो मध्यमः पंचमस्तथा । धैवतश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादकः ॥३० सौवीरा मध्यमा ग्रामा हरिणाश्च तथैव च ॥३१ तस्याः कालायनोपेताश्चतुर्थाशुद्धमध्यमाः । अग्नि च पौषा वै देव दृष्ट्वा कांच यथाक्रमः ॥३२
गान्धर्व मूर्छना लक्षण ] [ ६५
मध्यमग्रामिकाख्याता षड्जग्रामा निबोधत ।
उत्तरं मंद्रा रजनी तथा वाचोन्नरायताः ॥३३
मध्यषड्जा तथा चैव तथान्या चाभिमुद्गणा ।
गांधारग्रामिका श्यामा कीर्तिमाना निबोधत ॥३४
अग्निष्टोमं तु माद्यं तु द्वितीयं वाजपेयिकम् ।
यवरातसूयस्तु षष्ठवत्तु सुवर्णकम् ॥३५
सात तो स्वर होते हैं-तीन ग्राम हैं और इक्कीस मूर्च्छनाएं होती हैं। और तान उनचास हैं—यह सम्पूर्ण स्वर मण्डल होता है ।२६। सात स्वरों के नाम बताये जाते हैं—षड्ज-ऋषभ-गान्धार मध्यम-धैवत और निषाद ये सात स्वर हैं ।३०। सौवीरा-मध्यमा और हरिणा—ये तीन ग्राम हैं ।३१। उसके कालायनोपेता चतुर्था शुद्ध मध्यमा है। हे देव ! क्रमानुसार नग्न-घोषा और कांच ये देखकर होती हैं ।३२। ये मध्य ग्रामिका कही गयी हैं। अब षड्ज ग्रामा को समझ लीजिए। उत्तर-मन्द्रा-रजनी और वाचोन्नारायता है ।३४। तथा मध्यषड्जा है और अन्य अभिमुद्रणा होती है। गान्धारग्रामिका-श्यामा अब कीर्त्तिमाना होती है उसको समझलो ।३४। अग्निष्टोम-माद्य-द्वितीय वाजयिक-यवरातसूया-षष्ठवत्-सुवर्णक है ।३५।
सप्त गोसवना नाम महावृष्टिक्राष्टमाम् ।
ब्रह्मदानं च नवमं प्राजापत्यमनंतरम् ।
नागयक्षाश्रयं विद्वान् तद्गोत्तरस्तथैव च ॥३६
पदक्रांतमृगक्रांतं विष्णुक्रांतमनोहरा ।
सूर्यकांतधरेण्यैव संतकोकिलविश्रुतः ॥३७
तेनवानित्यपवशपिशाचातीवनह्यपि ।
सावित्रमर्धसावित्रं सर्वतोभद्रमेव च ॥३८
मनोहरमधात्र्यं च गन्धर्वानुपतश्च यः ।
अलंबुषेमथो विष्णुर्वणवरावुभौ ॥३९
सागराविजयं चैव सर्वभूतमनोहरः ।
हतोत्सृष्टो विजानीत स्कंधं तु प्रियमेव च ॥४०
६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
मनोहरमधात्र्यं च गन्धर्वानुपतश्च यः । अलंबुसेष्टस्य तथा नारदप्रिय एव च ॥४१ कथितो भीमसेनेन नगरातानयप्रियः । विकलोपनीतविनताश्रीराख्यो भार्गवप्रियः ॥४२
सप्त गौसवना और महावृष्टिकृता अष्टमा है और प्रह्लादान नवम है । इसके अनन्तर प्राजापत्य है । नागयक्षाश्रय विद्वान् और तदुगोत्तर तथा है ।३६। पदक्रान्त-मृगक्रान्त-विष्णुक्रान्त-मनोहरा । सूर्यकान्त धरेण्या-सन्त कोकिलविश्रुत है तेनवानित्यपवशपिशाचा-अतीवनही-सावित्र-अर्ध सावित्र और सर्वतोभद्र है ।३७-३८। मनोहर-अधात्र्य और गन्धर्वानुपत है । अलम्बु-षेष्ट-विष्णु और वेणवर ये दो हैं ।३६। सागरा विजय और सर्वभूत मनोहर-हृतोत्सृष्ट-स्कन्ध और प्रिय जान लेना चाहिए ।४०। जो मनोहर अधात्र्य तथा गन्धर्वानुपत है । अलम्बुषेष्ट की और नारद प्रिय है ।४१। नगरातान-प्रिय भीमसेन के द्वारा कहा गया है । विकलोपनीत विनता श्री नाम वाला भार्गव को प्रिय है ।४२।
चतुर्दश तथा पंचदशेच्छंतीह नापदः । ससौवीरां सुसोवीरा ब्रह्मणो ह्युपगीयते ॥४३ उत्तरादिस्वरश्चैव ब्रह्मा वै देवतास्त्रयः । हरिदेशसमुत्पन्ना हरिणस्याव्यजायत ॥४४ मूर्च्छना हरिणा ते वै चन्द्रस्यास्याधिदैवतम् । करोपनीता विवृतावनुद्विः स्वरमंडले ॥४५ साकलोपनता तस्मान्मनुतस्र्यान्नदैवतः । मनुदेशाः समुत्पन्ना मूच्छर्नाशुद्धमात्मना ॥४६ तस्मात्तास्मान्मृगामार्गीमृगेंद्रोस्याधिदेवता । सावाश्रमसमाद्युम्ना अनेकापोरुषानखान् ॥४६ मूर्च्छनायोजना ह्येषा स्याद्रजसारजनी ततः । तानि उत्तरतद्ब्रांसपदगदैवतकं विदुः ॥४८ तस्मादुत्तरता यावत्प्रथमं स्वायमं विदुः । तमोदुत्तरमंद्रीयदेवतास्याध्रुवेन च ॥४६
गान्धर्व मूर्छना लक्षण ] [ ६७
यहाँ पर चतुर्दश और पञ्चदश की नारद इच्छा किया करते हैं ? ससोवीरा और सुसोवीरा ब्रह्माजी की उपगीत की जाती हैं।४३। और उत्तरादि स्वर है। ब्रह्मा तीन देवता हैं। हरि देश में समुत्पन्ना हरिण की हुई थी।४४। जो मूर्च्छना हरिणा है वे इस चन्द्रकी अधिदैवत हैं। निवृत्ति में करोपनीत स्वरमण्डल में अनुद्रि है।४५। साकलोपनता है इसलिये मन उसका अन्नदैवत है। मनुदेशा समुत्पन्ना मूर्च्छना आत्मा से शुद्ध है।४६। इससे मृगामार्गी मृगेन्द्र इसका अधिदेवता है। वह अनेक पौरुषा नखों को समुत्पन्ना है।४७। यह मूर्च्छना योजना रजसारजनीत से होती है। उनको उत्तरमद्रांस सपद्ग दैवत जाननी चाहिए।४८। इस कारण से जब तक उत्त-रता हो तब तक इस स्त्रायम जानना चाहिए। इस देयता तमोदुत्तर मन्द्रोम निश्चित रूप से समझना चाहिए।४६।
अपामदुत्तरत्वावधैवतस्योत्तरायणः । स्यादिजमूर्च्छनाह्येच पितरः श्राद्धदेवताः ॥५० शुद्धषड्जस्वरं कृत्वा यस्मादग्निमहर्षयः । उपैति तस्मान्नजानीयाच्छुद्धयच्छिकरासभाः ॥५१ इत्येता मूर्च्छनाः कृत्वा यस्यामीदृशभावनः । पक्षिणां मूर्च्छनाः श्रुत्वा पक्षोका मूर्च्छनाः स्मृताः ॥५२ नागादृष्टिविषागीता नोपसर्पन्तिमूर्च्छनाः । नानासाधारणाश्चैव वडवान्रिविदस्तथा ॥५३
अपामदुत्तरत्व होने से अवधैवत का उत्तरायण हैं। यह इजमूर्च्छना है और पितर श्राद्ध देवता होते हैं।५०। शुद्ध षड्ज स्वर करके जिससे अग्नि महर्षि हैं। इससे प्राप्त होता है अतः शुद्धयच्छिकरा सभा नहीं जाननी चाहिए।५१। ये इतनी मूर्च्छना करके जिसमें जैसा भी भाव हो। पक्षियों की मूर्च्छना का श्रवण करके पक्षी का मूर्च्छना कही गयी है। नानादृष्टि विषा गीता वडवा त्रिविद होती हैं।५२-५३।
गान्धर्व लक्षण वर्णन
पूर्वाचार्यमतं बुद्ध्वा प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । विख्यातान्वे अलंकारांस्तन्मे निगदतः शृणु ॥१
६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अलंकारास्तु वक्तव्याः स्वैः स्वैर्वर्णैः प्रहेतवः । संस्थानयोगैश्च तथा सदा नाट्याद्यवेक्षया ॥२ वाक्यार्थपदयोगार्थैरलंकारैश्च पूरणम् । पदानि गीतकस्याहुः पुरस्तात्पृष्ठतोऽथ वा ॥३ स्थातोनिन्नीनरो नीड्डीमनः कंठशिरस्थया । एतेषु त्रिषु स्थानेषु प्रवृत्तो विधिरुत्तमः ॥४ चत्वारः प्रकृतौ वर्णाः प्रविचारश्चतुर्विधा । विकल्पमष्टधा चैव देवाः षोडशधा विदुः ॥५ सृष्टो वर्णः प्रसंचारी तृतीयमवरोहणम् । आरोहणं चतुर्थं तु वर्णं वर्णविदो विदुः ॥६ तत्रैकः संचरस्थायी संचरस्तु चरोऽभवत् । अवरोहणवर्णानामवरोहं विनिर्दिशेत् ॥७
श्री सूतजी ने कहा—मैं अपने पूर्व में होने वाले आचार्यों के मत को समझ कर क्रम से आरम्भ से अन्त तक बताऊँगा जो भी अलंकार परम प्रसिद्ध हैं उनको मुझ से आप लोग अब श्रवण कीजिए।१। जो अपने-अपने वर्णों से प्रकृष्ट हेतुओं वाले हैं वे ही अलंकार बताने चाहिए। और जो नाट्य आदि के अवेक्षण से संस्थान योगों से सदा समन्वित हुआ करते हैं।२। जहाँ पर वाक्य-अर्थ-पद-योग-अर्थ और अलंकारों से पूर्ति होती है वे गीत के पद आगे अथवा पीछे कहे गये हैं।३। स्थातोनिन्नीनर-नीड्डीमनः कण्ठ और शिर में स्थित-इन तीन स्थानों में जो विधि है वही उत्तम होती है ।४। प्रकृति में चार वर्ण हैं और प्रविचार के चार-प्रकार के हैं। आठ प्रकार से विकल्प है। इसको देव १६ प्रकार का जानते हैं।५। वर्ण प्रसंचारी सृजन किया गया है। तीसरा अवरोहण होता है। चौथा आरोहण है—इस तरह से वर्णों के ज्ञाता वर्ण को जानते हैं ।६। वहाँ पर संचर स्थायी है और संचर तो चर होगया है। जो अवरोहण वर्ण हैं उनका अवरोह विनिर्दिष्ट करना चाहिए ।७।
आरोहणेन वारोहान्वर्णान्वर्णविदो विदुः । एतेषामेव वर्णानामलंकारान्निबोधत ॥८
गान्धर्व लक्षण वर्णन ] [ ६६
अलंकारास्तु चत्वारस्थापनी क्रमरेजनः । प्रमादस्याप्रमादश्च तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥६ विस्वरोऽष्टकलाश्चैव स्थानं द्वयेकतरागतः । आवर्त्तस्याक्रमोत्वाक्षी वेकार्या परिमाणतः ॥१० कुमारं संपरं विद्धि द्विस्तरं वामनं गतः । एष वं एष चैवस्यकुतरेकः कुलाधिकः ॥११ स्वेन स्वे कातरे जातकलामग्नितरैषितः । तस्मिश्ञ्चैव स्वरे वृद्धिनिष्प्ते तद्विचक्षणः ॥१२ स्येनस्तु अपरो हस्त उत्तरः कमला कलः । प्रमाणघसंबिदुर्ना जायते विदुरे पुनः ॥१३ कला कार्या तु वर्णानां तदा नुः स्थापितो भवेत् । विपर्ययस्य रोपिस्त्याद्यस्य प्रादुर्घंटी मम ॥१४
वर्णों के ज्ञाता विद्वद्गण आरोहण वर्णों को आरोहण से ज्ञात किया ज्ञात किया करते हैं। इन्हीं वर्णों के अलंकारों को समझ लीजिए ।८। अलंकार चार हैं—थापनी-क्रम-रोचन और प्रमाद का अप्रमाद-इनका लक्षण बताऊंगा ।६। विस्वर और अष्ट कला स्थान दो—एकतर में आगत-आवत्तं का अक्रम आक्षी और परिमाण से वेकार्य हैं ।१०। कुमार को संमर समझिए और द्विस्तर वामन को गत है । यह ही एक का है फिर एक कुलाधिक कैसे होता है ।११। अपने से अपने कातर में जात कलाको अग्नितरेषित कहा है । उसका विद्वान् उसमें ही निष्कृष्ट स्वर में वृद्धि समझ लेवे ।१२। स्येन तो दूसरा हाथ है और उत्तर कमलाकल होता है । फिर विदुर में प्रमाण घस बिन्दु नहीं होता है ।१३। तभी वर्णों की कला करनी चाहिए जन नुः स्थापित होवे । विपर्यय का रोगी होती है जिसको मेरी घंटी कहा करते हैं ।१४।
एकोत्तरः स्वरस्तु स्यात्षड्जतः परमः स्वरः । अक्षेपस्कंदनाकार्यं काकस्योपचपुष्कलम् ॥१५ संतारो तोनुसर्वार्थ्यो कार्यं वा कारणं तथा । आक्षिप्तमवरोह्यासीत्प्रोक्षमद्यन्तथैव च ॥१६
७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
द्वादशे च कलास्थानामेकांतरगतस्तथा ।
प्रेङ्खोलिलिखितमलकारमेव स्वरसमन्विता ॥१७
स्वरस्वरबहुग्रामकाप्रयोष्टनुपत्कला ।
प्रक्षिप्तमेव कलयाचोपादानारयो भवेत् ॥१८
द्विकथंवावथाभूत यत्रभाषितमुच्यते ।
उच्चराद्विश्वरारूढा तथायाष्टस्वरातथा ॥१९
वापः स्यादवरोहेण नारतो भवति ध्रुवम् ।
एकांतरं च ह्येतेवैतमेवस्वरसत्तमः ॥२०
मक्षिप्रच्छेदनामाचचतुष्कलगणः स्मृतः ।
अलंकारा भवंत्येते त्रिंशद्देवैः प्रकीर्त्तिताः ॥२१
एकोत्तर स्वर तो षड्ज से परम स्वर होता है । आक्षेप स्कन्दन कार्य काक का उपच पुष्कल है ।१५। वे दोनों अनुसर्वाध्य संतार हैं अथवा कार्य तथा कारण है । आक्षिप्त अवरोही था तथा प्रोक्षमद्य होता है ।१६। और द्वादश में कलास्थों का उसी भाँति एकान्तर गत होता है । प्रेङ्खोलिलिखित अलंकार एक स्वर से समन्वित है ।१७। स्वर-स्वर बहु ग्राम का प्रयोष्टनुपत्कला और कला के द्वारा प्रक्षिप्त ही उपादानारय होता है ।१८। द्विकथ अथवा अवथाभूत भाषित जहाँ पर कहा जाया करता है । उच्चर से विश्वरारूढा तथा आयाष्ट स्वरा हो ।१९। अवरोहण से वाप होता है और निश्चय ही नार से होता है और एकान्तर एतेवैत ही स्वर संसय होता है । अर्थात् श्रेष्ठ स्वर होता है ।२०। और यह मक्षिप्रच्छेद नाम वाला चतुष्कल गण कहा गया है । ये अलंकार होते हैं जो देवों के द्वारा तीस कहे गये हैं ।२१।
वर्णस्थानप्रयोगेण कलामात्राप्रमाणतः ।
संस्थानं च प्रमाणं च विकारो लक्षणस्तथा ॥२२
चतुर्विधमिदं ज्ञेयमलंकारप्रयोजनम् ।
यथात्मनो ह्यलंकारो विपर्यस्तो विगर्हितः ॥२३
वर्णमेवाप्यलंकत्तुं विषमा ह्यात्मसंभवाः ।
नानाभरणसंयोगा यथा नार्या विभूषणम् ॥२४
गान्धर्व लक्षण वर्णन ] [ ७१
वर्णस्य चैवालंकारो विभूषा ह्यात्मसंभवः ।
न पादे कुण्डलं दृष्टं न कंठे रसना तथा ॥२५॥
एवमेवाद्यलंकारे विपर्यस्तो विगर्हितः ।
क्रियमाणोऽप्यलंकार्यो नांगं यच्चैव दर्शयेत् ॥२६॥
यथादृष्टस्य मार्गस्यकर्त्तव्यस्य विधीयते ।
लक्षणं पर्यवस्यापिवर्त्तिकापिप्रवर्त्तते ॥२७॥
याथातथ्येन वक्ष्यामि मासोद्भवमुखोद्भव ।
त्रयोविंशतिशीतिस्तु विज्ञातपवदैवतम् ॥२८॥
वर्ण स्थान प्रयोग से—कला मात्रा के प्रमाण से सस्थान-प्रमाण-और लक्षण हैं ।२२। इस तरह से चार प्रकार का यह अलंकारों का प्रयोजन समझना चाहिए। जिस प्रकार से शरीर पर विपर्यस्त अर्थात् उचित स्थान के विपरीत अलंकार विगर्हित हुआ करता है ।२३। यह वर्ण को अलंकृत करने के वास्ते हैं और आत्मा में होने वाले भीषण हैं। ये नाना आभरणों के संयोग हैं जिस तरह से नारी के भूषण हुआ करते हैं ।२४। वर्ण का ही यह अलंकार आत्मा की विभूषा होते हैं। अलंकार का एक उचित स्थान होता है तभी वह अलंकरण किया करता है जैसे चरण में कभी कुण्डल नहीं देखा गया है और कण्ठ में रसना नहीं दिखाई दिया करती हैं ।२५। इसी प्रकार से अलंकार में भी विपरीतता बुरी होती है और उसमें शोभाधायकता नहीं हुआ करती है। किया हुआ भी अलंकार कोई भी शोभा नहीं दिखाता है ।२६। जिस रीति से अदृष्ट कर्त्तव्य मार्ग का लक्षण किया जाता है और जो पर्यववस्थ है उसका भी वृत्तिका होती है ।२७। अब मैं यथार्थ रूप से मासोद्भव को बतलाऊँगा । त्रयोविंशति शीति अपदैवत विज्ञात है ।२८।
नगोनातुपुरस्तानुमध्यमांणस्तु पर्यवः ।
तयोर्विभागो देवानां लावण्ये मार्गसंस्थितः ॥२९॥
अनुषंगमयो दृष्टं स्वसारं वस्वरातर ।
विपर्ययः संवृत्तं च सप्तस्वरपदक्रमम् ॥३०॥
गांधारसेतुगीयन्ते वरोमद्भगवानि च ।
पंचमं मध्यमं चैव धैवतं तु निषादतः ॥३१॥
७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
षड्जर्षभञ्च जानीमो मद्रकेष्वेवनांतरे । द्वे द्वव्यपरतु किं विद्याद्दव्यमुष्णंतिकस्य तु ॥३२ प्राकृते वैकृते चैव गांधारः संप्रयुज्यते । पदस्यात्ययरूपं तु सप्तरूपं तु कौशिकीम् ॥३३ गांधारस्येन कात्स्न्र्येन चायं यस्य विधिः स्मृतः । एष चैव क्रमोद्दिष्टो मध्यमांशस्य मध्यमः ॥३४ यानि प्रोक्तानि गीतानिबतुरूपं विशेषतः । ततः सप्तस्वर कार्यंसप्तरूपं च कौशिकी ॥३५
नगोनातु पुरस्तानु मध्यमांश पर्यय होता है । उन दोनों का विभाग देवों के लावण्य में मार्ग संस्थित है ।२६। अनुषङ्गमय वस्त्ररातर स्वसार देखा गया है और संवर्त्त में सप्तस्वर पदक्रम विपर्यय है ।३०। गान्धार सेतु और वरो मद्भंगवानि गाये जाया करते हैं और पंचम-मध्यम-धैवत निषाद से गाये जाते हैं ।३१। षड्ज और ऋषभ को हम मद्रकों में ही वनान्तर में जानते हैं । द्वे द्व य पद तो उष्णान्तिक के द्वय को क्या जाने ।३२। प्राकृत और वैवृत में वह गान्धार ही प्रयुक्त किया जाया करता है । पद का अत्यय रूप ओर सप्तरूप कौशिकी का प्रयोग करते हैं ।३३। गान्धार की इन कात्स्न्यं से यही विधि कही गयी है । यही मध्यमांश का मध्यम क्रमोद्दिष्ट है ।३४। जो भी गीत कहे गये हैं विशेष रूप से वतु रूप हैं । फिर सप्त स्वर सप्तरूप और कौशिकी करने चाहिए ।३५।
अगदर्शनमित्याहुर्मानुद्वैममके तथा । द्वितीयामास मात्राणाक्तिः सर्वाः प्रतिष्ठिताः ॥३६ उत्तरेवप्रकृत्येवंमाता ब्राह्मतलायत । तथाहृतारोपिण्डकेयत्रमायां निवर्त्तते ॥३७ पादेनैकेनमात्रायाः पादोनामतिवारिणः । संख्यापनोपहतां वै तव पानमिति स्मृतम् ॥३८ द्वितीयपादभंगं च ग्रहे नाम प्रतिष्ठितम् । पूर्वमष्टतीतटी न द्वितीयं चापरान्तिकैः ॥३६
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ७३
पादभागसपादं तु चकृत्यामपि सस्थितम् ।
चतुर्थमुत्तरं चैवमद्रवत्पावमद्रकौ ॥४०
मद्रकोदक्षिणस्यापि यथोक्ता वर्त्तते कला ।
सर्वमेवानुयोगं तु द्वितीयं बुद्धिरिष्यते ॥४१
पादौ वा हरणं चास्मात्पारं नात्र विधीयते ।
एकत्वं मनुयोगस्य द्वयोर्यद्यद्विजोत्तम ॥४२
अनेकसमवायस्तु पातका हरिणा स्मृताः ।
तिसृणां चैव वृत्तीनां वृत्तौ वृत्ते च दक्षिणः ॥४३
अष्टौ तु समवायस्तु वीरा संमूर्छना तथा ।
कस्यनासुतरा चैव स्वरशाखा प्रकीर्त्तिता ॥४४
तथा भानुसोममक में अगदर्शन है—यह कहते हैं। द्वितीय मास मात्राओं से सब प्रतिष्ठित हैं ।३६। इस प्रकार से प्रकृति से उत्तरा की भांति माता ब्रह्म तलायत है । तथा हतारोपीड़क में जहाँ पर माया निवृत्त हो जाया करती है ।३७। एक पाद से माया का पादोना में अति चारी होते हैं । सख्यापनोय हृत वितन्न पान—यह कहा गया है ।३८। और द्वितीय पाद भङ्ग ग्रह में नाम प्रतिष्ठित है । पूर्व अष्ट तीर तोन द्वितीय अपरान्तिकों से होता है ।३८-३६। पदभाग सपाद तो प्रकृति में संस्थित प्राप्त होता है । चतुर्थ उत्तर इस प्रकार से पान और मद्रक को द्रवित करता था ।४०। दक्षिण की भी मद्रका यथोक्त कला होती है । सम्पूर्ण अनुयोग द्वितीय हैं जो बुद्धि को अभीष्ट किया करती है ।४१। और पादों का ही आहरण होता है और यहाँ पर पार नहीं होता है । हे द्विजोत्तम ! दोनों का जो-जो भी है वह अनुयोग का एकत्व है ।४२। अनेकों का जो समवाय है वह पातक हरण कहे गये हैं तीनों वृत्तियों का वृत्ति में और वृत्त में दक्षिण है ।४३। आठ समवाय तो तथा वीरा संमूच्छ्र्ना होती है । कस्यना सुतरा स्वर शाखा कीर्त्तित की गयी है ।४४।
७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आभूत संप्लव वर्णन
श्रुत्वा पादं तृतीयं तु क्रांतं सूतेन धीमता ।
ततश्चतुर्थं पप्रच्छुः पादं वै ऋषिसत्तमः ॥१
ऋषय ऊचुः-
पादः क्रांतस्तृतीयोऽयमनुषंगेण नस्त्वया ।
चतुर्थं विस्तरात्पादं संहारं परिकीर्त्तय ॥२
मन्वंतराणि सर्वाणि पूर्वाण्येवापरैः सह ।
सप्तर्षीणामथैतेषां सांप्रतस्यांतरे मनोः ॥३
विस्तरावयवं चैव निसर्गस्य महात्मनः ।
विस्तरेणानुपूर्व्या च सर्वमेव ब्रवीहि नः ॥४
सूत उवाच-
भवतां कथयिष्यामि सर्वमेतद्यथातथम् ।
पादं त्विमं संसंहारं चतुर्थं मुनिसत्तमाः ॥५
मनोर्वैवस्वतस्येमं सांप्रतस्य महात्मनः ।
विस्तरेणानुपूर्व्या च निसर्गं शृणुत द्विजाः ॥६
मन्वंतराणां संक्षेपं भविष्यैः सह सप्तभिः ।
प्रलयं चैव लोकानां ब्रुवतो मे निबोधत ॥७
परम धीमान् श्री सूतजी के द्वारा वर्णित तृतीय पाद का श्रवण करके परम श्रेष्ठ ऋषियों ने फिर उनसे चतुर्थ पाद के विषय में पूछा था ।१। ऋषियों ने कहा—हे भगवन् ! आपने हमारे समक्ष में अनुषंग से यह तीसरा पाद तो भली भाँति वर्णन करके सुना दिया है । अब आप कृपा करके चतुर्थ पाद का जो संहार हो उसका परिकीर्त्तन कीजिए ।२। पूर्व में जो सब मन्वन्तर हुए हैं तथा दूसरे जो भी मन्वन्तर हैं उन्हीं के साथ इन सप्तर्षियों का वर्णन कीजिए और वर्त्तमान समय में जो भी मन्वन्तर है उसको बतलाइए ।३। इस महान् आत्मा वाले विसर्ग का अवयवों के सहित विस्तार बतलाइए । और सभी कुछ विस्तार के साथ तथा आनुपूर्वी से अर्थात् क्रमशः आरम्भ से अन्त तक हमको बतलाइए ।४। श्री सूतजी ने कहा—मैं
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ७५
आपके सामने अब सभी कुछ यथार्थता से वर्णन करूंगा। हे श्रेष्ठ मुनि- गणो ! अब मैं इस चतुर्थ पाद का संहार के सहित वर्णन करता हूँ ।५। वर्त्तमान में महात्मा वैवस्वत मनु का भी जो निसर्ग है उसका भी वर्णन विस्तार के साथ आरम्भ से अन्त तक क्रम से करूँगा । आप लोग इस सबका श्रवण करिए ।६। हे द्विजो ! सभी मन्वन्तरों का संक्षेप जो भी भविष्य में होने वाले सात मन्वन्तर हैं उनके ही साथ में वर्णन करूँगा और लोकों का जो प्रलय होगा उसको भी बतलाऊँगा । बता देने वाले मुझसे यह सभी भली भाँति समझ लीजिए ।७।
एतान्युक्तानि वै सम्यक्सप्तसप्त सु वै प्रजाः । मन्वंतराणि संक्षेपाच्छृणुतानागतानि मे ॥८ सावर्णस्य प्रवक्ष्यामि मनोर्वैवस्वतस्य ह । भविष्यस्य भविष्यं तु समासात्तन्निबोधत ॥९ अनागताश्च सप्तैव स्मृतास्त्विह महर्षयः । कौशिको गालवश्चैव जामदग्न्यश्च भार्गवः ॥१० द्वैपायनो वसिष्ठश्च कृपः शारद्वतस्तथा । आत्रेयो दीप्तिमांश्चैव ऋष्यशृंगस्तु काश्यपः ॥११ भरद्वाजस्तथा द्रौणिरश्वत्थामा महायशाः । एते सप्त महात्मानो भविष्याः परमर्षयः । सुतपाश्चामिताभाश्च सुखाश्चैव गणास्त्रयः ॥१२ तेषां गणस्तु देवानामकेको विंशकः स्मृतः । नामतस्तु प्रवक्ष्यामि निबोधध्वं समाहितः ॥१३ ऋतुस्तपश्च शुक्रश्च कृतिर्नेमिः प्रभाकरः । प्रभासो मासकृद्धर्मस्तेजोरश्मिः क्रतुविराट् ॥१४
ये सात मन्वन्तर तो मैंने आपको बता दिये हैं और भली भाँति कह कर सुना दिये हैं । अब प्रजा सातों में जो होगी वे अनागत मन्वन्तर जो आगे आने वाले हैं उनको संक्षेप से बतलाता हूँ । आप लोग श्रवण कीजिए ।८। अब सावर्ण वैवस्वत मनु के विषय में बताऊंगा । यह भविष्य में होने
७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वाला है। इसका भविष्य मैं संक्षेप से कहूँगा । आप लोग समझ लीजिए ।६। जो अभी तक नहीं हुए हैं वे सब सात ही महर्षिगण कहे गये हैं । उनके परम शुभ नाम ये हैं—कौशिक—गालव—जामदग्न्य—भागंव—द्वैपायन—वसिष्ठ—कृप—शारद्वत—आत्रेय—दीप्तिवान्—ऋष्यशृंग—काश्यप–भरद्वाज—द्रौणि—महायशस्वी अश्वत्थामा—ये सात महान् आत्मा वाले परमर्षिगण आगे होने वाले हैं । वे सब सुन्दर तप वाले—अपरिमित आभा से सुसम्पन्न और सुखद तीस गण हैं ।१०-१२। उन देवों का गण एक-एक विंशक कहा गया है। मैं अब उनके नाम बताते हुए कहूँगा । आप लोग बहुत ही सावधान होकर उनका श्रवण कीजिए और भली भाँति समझ लीजिए ।१३। क्रतु–तप–शुक्र–कृति–नेति–प्रभाकर–प्रभास–मासकृत्–धर्म–तेजोरश्मि–ऋतु–विराट् ।१४।
अर्चिष्मान् द्योतनो भानुर्यशः कीर्त्तिर्बुधो धृतिः ॥१५
विंशतिः सुतपा ह्येते नामभिः परिकीर्त्तिताः ।
प्रभुर्विभुर्विभासश्च जेता हंतारिहा ऋतुः ॥१६
सुमतिः प्रमतिर्दीप्तिः समाख्यातो महो महान् ।
देही मुनिरिनः पोष्टा समः सत्यश्च विश्रुतः ॥१७
इत्येते ह्यमिताभास्तु विंशतिः परिकीर्त्तिताः ।
दामो दानी ऋतः सोमो वित्तं वैद्यो यमो निधिः ॥१८
होमो हव्यं हुतं दानं देयं दाता तपः शमः ।
ध्रुवं स्थानं विधानं च नियमश्चेति विंशतिः ॥१६.
सुखा ह्येते समाख्याताः सावर्ये प्रथमेंतरे ।
मारीचस्यैव ते पुत्राः कश्यपस्य महात्मनः ॥२०
सांप्रतस्य भविष्यन्ति षष्टिर्देवास्तदन्तरे ।
सावर्णस्य मनोः पुत्रा भविष्यंति नवैव तु ॥२१
अर्चिष्मान्—द्योतन–भानु–यश कीर्ति–बुध–धृति–।१५। ये सुन्दर तपों वाले हैं । इनकी विंशति है जो नाम बताकर कीर्त्तित कर दिये गये हैं । प्रभु–विभु–विभास–जेता–हंता–रिहा–ऋतु. ।१६। सुमति–प्रमति–दीप्ति और महान् मह समाख्यात हुआ है । देही–मुनि–इन–पोष्टा–सम–सत्य–विश्रुत ।१७।
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ७७
ये सब अमित आभा से सम्पन्न थे। इनकी भी विंशति कही गयी है अर्थात् इन बीसों का समुदाय बताया गया है। अब अन्य विंशति भी बतायी जाती है—दम-दानो-ऋत-सोम-वेद्यायम-निधि-होम-हव्य-हुत-दान-देय-दाता-तप-शम-ध्रुव-स्थान-विधान और नियम—ये विंशति होती हैं। १८-१९। ये सब सावर्ण्य मन्वन्तर में सुख बताये गये हैं। वे सब मारीच काश्यप के ही पुत्र हैं जो महान् आत्मा वाले थे। २०। इसके अन्तर में वर्त्तमान् काल के साठ देवता होंगे। सावर्णि मनु के पुत्र तो नौ ही होंगे। २१।
विरजाश्चार्वरीवांश्च निर्मोकाद्यास्तथा परे ।
नव चान्येषु वक्ष्यामि सावर्णेष्वांतरेषु वै ॥२२
सावर्णमनवश्चान्ये भविष्या ब्रह्मणः सुताः ।
मेरुसावर्णितस्ते वै चत्वारो दिव्यदृष्टयः ॥२३
दक्षस्य ते हि दौहित्राः क्रियाया दुहितुः सुताः ।
महता तपसा युक्ता मेरुपृष्ठे महौजसः ॥२४
ब्रह्मादिभिस्ते जनिता दक्षेणैव च धीमता ।
महर्लोकं गता वृत्ता भविष्या मेरुमाश्रिताः ॥२५
महानुभावास्ते पूर्वं जज्ञिरे चाक्षुषेंतरे ।
जज्ञिरे मनवस्ते हि भविष्यानागतांतरे ॥२६
प्राचेतसस्य दक्षस्य दौहित्रा मनवस्तु ये ।
सावर्णा नामतः पंच चत्वारः परमर्षिजाः ॥२७
संज्ञापुत्रस्तु सावर्णिरेको वैवस्वतस्तथा ।
ज्येष्ठः संज्ञासुतो नाम मनुर्वैवस्वतः प्रभुः ॥२८
विरजा-वार्वरीवान् तथा दूसरे निर्मोक आद्य अन्य सावर्ण अन्तरों में नौ बतलाऊँगा। २२। अन्य सावर्ण मनु ब्रह्माजी के पुत्र होने वाले हैं। वे मेरु सावर्णि से लेकर चार दिव्य दृष्टि वाले हैं। २३। वे सब प्रजापति दक्ष के दौहित्र हैं और क्रिया नाम वाली उसकी दुहिता के पुत्र हैं। ये सब महान् तप से युक्त थे। २४। वे सब ब्रह्मादि के द्वारा तथा धीमान् दक्ष के द्वारा जनित हुए हैं। महर्लोक को गये थे और वृत्त भविष्य मेरु पर्वत पर समाश्रित थे। २५। वे महानुभाव पूर्व में समुत्पन्न हुए थे। जिस समय में चाक्षुष