भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483

७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वादशे च कलास्थानामेकांतरगतस्तथा ।
प्रेङ्खोलिलिखितमलकारमेव स्वरसमन्विता ॥१७
स्वरस्वरबहुग्रामकाप्रयोष्टनुपत्कला ।
प्रक्षिप्तमेव कलयाचोपादानारयो भवेत् ॥१८
द्विकथंवावथाभूत यत्रभाषितमुच्यते ।
उच्चराद्विश्वरारूढा तथायाष्टस्वरातथा ॥१९
वापः स्यादवरोहेण नारतो भवति ध्रुवम् ।
एकांतरं च ह्येतेवैतमेवस्वरसत्तमः ॥२०
मक्षिप्रच्छेदनामाचचतुष्कलगणः स्मृतः ।
अलंकारा भवंत्येते त्रिंशद्देवैः प्रकीर्त्तिताः ॥२१

एकोत्तर स्वर तो षड्ज से परम स्वर होता है । आक्षेप स्कन्दन कार्य काक का उपच पुष्कल है ।१५। वे दोनों अनुसर्वाध्य संतार हैं अथवा कार्य तथा कारण है । आक्षिप्त अवरोही था तथा प्रोक्षमद्य होता है ।१६। और द्वादश में कलास्थों का उसी भाँति एकान्तर गत होता है । प्रेङ्खोलिलिखित अलंकार एक स्वर से समन्वित है ।१७। स्वर-स्वर बहु ग्राम का प्रयोष्टनुपत्कला और कला के द्वारा प्रक्षिप्त ही उपादानारय होता है ।१८। द्विकथ अथवा अवथाभूत भाषित जहाँ पर कहा जाया करता है । उच्चर से विश्वरारूढा तथा आयाष्ट स्वरा हो ।१९। अवरोहण से वाप होता है और निश्चय ही नार से होता है और एकान्तर एतेवैत ही स्वर संसय होता है । अर्थात् श्रेष्ठ स्वर होता है ।२०। और यह मक्षिप्रच्छेद नाम वाला चतुष्कल गण कहा गया है । ये अलंकार होते हैं जो देवों के द्वारा तीस कहे गये हैं ।२१।

वर्णस्थानप्रयोगेण कलामात्राप्रमाणतः ।
संस्थानं च प्रमाणं च विकारो लक्षणस्तथा ॥२२
चतुर्विधमिदं ज्ञेयमलंकारप्रयोजनम् ।
यथात्मनो ह्यलंकारो विपर्यस्तो विगर्हितः ॥२३
वर्णमेवाप्यलंकत्तुं विषमा ह्यात्मसंभवाः ।
नानाभरणसंयोगा यथा नार्या विभूषणम् ॥२४