भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गान्धर्व लक्षण वर्णन ] [ ६६

अलंकारास्तु चत्वारस्थापनी क्रमरेजनः । प्रमादस्याप्रमादश्च तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥६ विस्वरोऽष्टकलाश्चैव स्थानं द्वयेकतरागतः । आवर्त्तस्याक्रमोत्वाक्षी वेकार्या परिमाणतः ॥१० कुमारं संपरं विद्धि द्विस्तरं वामनं गतः । एष वं एष चैवस्यकुतरेकः कुलाधिकः ॥११ स्वेन स्वे कातरे जातकलामग्नितरैषितः । तस्मिश्ञ्चैव स्वरे वृद्धिनिष्प्ते तद्विचक्षणः ॥१२ स्येनस्तु अपरो हस्त उत्तरः कमला कलः । प्रमाणघसंबिदुर्ना जायते विदुरे पुनः ॥१३ कला कार्या तु वर्णानां तदा नुः स्थापितो भवेत् । विपर्ययस्य रोपिस्त्याद्यस्य प्रादुर्घंटी मम ॥१४

वर्णों के ज्ञाता विद्वद्गण आरोहण वर्णों को आरोहण से ज्ञात किया ज्ञात किया करते हैं। इन्हीं वर्णों के अलंकारों को समझ लीजिए ।८। अलंकार चार हैं—थापनी-क्रम-रोचन और प्रमाद का अप्रमाद-इनका लक्षण बताऊंगा ।६। विस्वर और अष्ट कला स्थान दो—एकतर में आगत-आवत्तं का अक्रम आक्षी और परिमाण से वेकार्य हैं ।१०। कुमार को संमर समझिए और द्विस्तर वामन को गत है । यह ही एक का है फिर एक कुलाधिक कैसे होता है ।११। अपने से अपने कातर में जात कलाको अग्नितरेषित कहा है । उसका विद्वान् उसमें ही निष्कृष्ट स्वर में वृद्धि समझ लेवे ।१२। स्येन तो दूसरा हाथ है और उत्तर कमलाकल होता है । फिर विदुर में प्रमाण घस बिन्दु नहीं होता है ।१३। तभी वर्णों की कला करनी चाहिए जन नुः स्थापित होवे । विपर्यय का रोगी होती है जिसको मेरी घंटी कहा करते हैं ।१४।

एकोत्तरः स्वरस्तु स्यात्षड्जतः परमः स्वरः । अक्षेपस्कंदनाकार्यं काकस्योपचपुष्कलम् ॥१५ संतारो तोनुसर्वार्थ्यो कार्यं वा कारणं तथा । आक्षिप्तमवरोह्यासीत्प्रोक्षमद्यन्तथैव च ॥१६