भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अलंकारास्तु वक्तव्याः स्वैः स्वैर्वर्णैः प्रहेतवः । संस्थानयोगैश्च तथा सदा नाट्याद्यवेक्षया ॥२ वाक्यार्थपदयोगार्थैरलंकारैश्च पूरणम् । पदानि गीतकस्याहुः पुरस्तात्पृष्ठतोऽथ वा ॥३ स्थातोनिन्नीनरो नीड्डीमनः कंठशिरस्थया । एतेषु त्रिषु स्थानेषु प्रवृत्तो विधिरुत्तमः ॥४ चत्वारः प्रकृतौ वर्णाः प्रविचारश्चतुर्विधा । विकल्पमष्टधा चैव देवाः षोडशधा विदुः ॥५ सृष्टो वर्णः प्रसंचारी तृतीयमवरोहणम् । आरोहणं चतुर्थं तु वर्णं वर्णविदो विदुः ॥६ तत्रैकः संचरस्थायी संचरस्तु चरोऽभवत् । अवरोहणवर्णानामवरोहं विनिर्दिशेत् ॥७

श्री सूतजी ने कहा—मैं अपने पूर्व में होने वाले आचार्यों के मत को समझ कर क्रम से आरम्भ से अन्त तक बताऊँगा जो भी अलंकार परम प्रसिद्ध हैं उनको मुझ से आप लोग अब श्रवण कीजिए।१। जो अपने-अपने वर्णों से प्रकृष्ट हेतुओं वाले हैं वे ही अलंकार बताने चाहिए। और जो नाट्य आदि के अवेक्षण से संस्थान योगों से सदा समन्वित हुआ करते हैं।२। जहाँ पर वाक्य-अर्थ-पद-योग-अर्थ और अलंकारों से पूर्ति होती है वे गीत के पद आगे अथवा पीछे कहे गये हैं।३। स्थातोनिन्नीनर-नीड्डीमनः कण्ठ और शिर में स्थित-इन तीन स्थानों में जो विधि है वही उत्तम होती है ।४। प्रकृति में चार वर्ण हैं और प्रविचार के चार-प्रकार के हैं। आठ प्रकार से विकल्प है। इसको देव १६ प्रकार का जानते हैं।५। वर्ण प्रसंचारी सृजन किया गया है। तीसरा अवरोहण होता है। चौथा आरोहण है—इस तरह से वर्णों के ज्ञाता वर्ण को जानते हैं ।६। वहाँ पर संचर स्थायी है और संचर तो चर होगया है। जो अवरोहण वर्ण हैं उनका अवरोह विनिर्दिष्ट करना चाहिए ।७।

आरोहणेन वारोहान्वर्णान्वर्णविदो विदुः । एतेषामेव वर्णानामलंकारान्निबोधत ॥८

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