संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगान्धर्व मूर्छना लक्षण ] [ ६७
यहाँ पर चतुर्दश और पञ्चदश की नारद इच्छा किया करते हैं ? ससोवीरा और सुसोवीरा ब्रह्माजी की उपगीत की जाती हैं।४३। और उत्तरादि स्वर है। ब्रह्मा तीन देवता हैं। हरि देश में समुत्पन्ना हरिण की हुई थी।४४। जो मूर्च्छना हरिणा है वे इस चन्द्रकी अधिदैवत हैं। निवृत्ति में करोपनीत स्वरमण्डल में अनुद्रि है।४५। साकलोपनता है इसलिये मन उसका अन्नदैवत है। मनुदेशा समुत्पन्ना मूर्च्छना आत्मा से शुद्ध है।४६। इससे मृगामार्गी मृगेन्द्र इसका अधिदेवता है। वह अनेक पौरुषा नखों को समुत्पन्ना है।४७। यह मूर्च्छना योजना रजसारजनीत से होती है। उनको उत्तरमद्रांस सपद्ग दैवत जाननी चाहिए।४८। इस कारण से जब तक उत्त-रता हो तब तक इस स्त्रायम जानना चाहिए। इस देयता तमोदुत्तर मन्द्रोम निश्चित रूप से समझना चाहिए।४६।
अपामदुत्तरत्वावधैवतस्योत्तरायणः । स्यादिजमूर्च्छनाह्येच पितरः श्राद्धदेवताः ॥५० शुद्धषड्जस्वरं कृत्वा यस्मादग्निमहर्षयः । उपैति तस्मान्नजानीयाच्छुद्धयच्छिकरासभाः ॥५१ इत्येता मूर्च्छनाः कृत्वा यस्यामीदृशभावनः । पक्षिणां मूर्च्छनाः श्रुत्वा पक्षोका मूर्च्छनाः स्मृताः ॥५२ नागादृष्टिविषागीता नोपसर्पन्तिमूर्च्छनाः । नानासाधारणाश्चैव वडवान्रिविदस्तथा ॥५३
अपामदुत्तरत्व होने से अवधैवत का उत्तरायण हैं। यह इजमूर्च्छना है और पितर श्राद्ध देवता होते हैं।५०। शुद्ध षड्ज स्वर करके जिससे अग्नि महर्षि हैं। इससे प्राप्त होता है अतः शुद्धयच्छिकरा सभा नहीं जाननी चाहिए।५१। ये इतनी मूर्च्छना करके जिसमें जैसा भी भाव हो। पक्षियों की मूर्च्छना का श्रवण करके पक्षी का मूर्च्छना कही गयी है। नानादृष्टि विषा गीता वडवा त्रिविद होती हैं।५२-५३।
गान्धर्व लक्षण वर्णन
पूर्वाचार्यमतं बुद्ध्वा प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । विख्यातान्वे अलंकारांस्तन्मे निगदतः शृणु ॥१