संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगान्धर्व लक्षण वर्णन ] [ ७१
वर्णस्य चैवालंकारो विभूषा ह्यात्मसंभवः ।
न पादे कुण्डलं दृष्टं न कंठे रसना तथा ॥२५॥
एवमेवाद्यलंकारे विपर्यस्तो विगर्हितः ।
क्रियमाणोऽप्यलंकार्यो नांगं यच्चैव दर्शयेत् ॥२६॥
यथादृष्टस्य मार्गस्यकर्त्तव्यस्य विधीयते ।
लक्षणं पर्यवस्यापिवर्त्तिकापिप्रवर्त्तते ॥२७॥
याथातथ्येन वक्ष्यामि मासोद्भवमुखोद्भव ।
त्रयोविंशतिशीतिस्तु विज्ञातपवदैवतम् ॥२८॥
वर्ण स्थान प्रयोग से—कला मात्रा के प्रमाण से सस्थान-प्रमाण-और लक्षण हैं ।२२। इस तरह से चार प्रकार का यह अलंकारों का प्रयोजन समझना चाहिए। जिस प्रकार से शरीर पर विपर्यस्त अर्थात् उचित स्थान के विपरीत अलंकार विगर्हित हुआ करता है ।२३। यह वर्ण को अलंकृत करने के वास्ते हैं और आत्मा में होने वाले भीषण हैं। ये नाना आभरणों के संयोग हैं जिस तरह से नारी के भूषण हुआ करते हैं ।२४। वर्ण का ही यह अलंकार आत्मा की विभूषा होते हैं। अलंकार का एक उचित स्थान होता है तभी वह अलंकरण किया करता है जैसे चरण में कभी कुण्डल नहीं देखा गया है और कण्ठ में रसना नहीं दिखाई दिया करती हैं ।२५। इसी प्रकार से अलंकार में भी विपरीतता बुरी होती है और उसमें शोभाधायकता नहीं हुआ करती है। किया हुआ भी अलंकार कोई भी शोभा नहीं दिखाता है ।२६। जिस रीति से अदृष्ट कर्त्तव्य मार्ग का लक्षण किया जाता है और जो पर्यववस्थ है उसका भी वृत्तिका होती है ।२७। अब मैं यथार्थ रूप से मासोद्भव को बतलाऊँगा । त्रयोविंशति शीति अपदैवत विज्ञात है ।२८।
नगोनातुपुरस्तानुमध्यमांणस्तु पर्यवः ।
तयोर्विभागो देवानां लावण्ये मार्गसंस्थितः ॥२९॥
अनुषंगमयो दृष्टं स्वसारं वस्वरातर ।
विपर्ययः संवृत्तं च सप्तस्वरपदक्रमम् ॥३०॥
गांधारसेतुगीयन्ते वरोमद्भगवानि च ।
पंचमं मध्यमं चैव धैवतं तु निषादतः ॥३१॥