भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

षड्जर्षभञ्च जानीमो मद्रकेष्वेवनांतरे । द्वे द्वव्यपरतु किं विद्याद्दव्यमुष्णंतिकस्य तु ॥३२ प्राकृते वैकृते चैव गांधारः संप्रयुज्यते । पदस्यात्ययरूपं तु सप्तरूपं तु कौशिकीम् ॥३३ गांधारस्येन कात्स्न्र्येन चायं यस्य विधिः स्मृतः । एष चैव क्रमोद्दिष्टो मध्यमांशस्य मध्यमः ॥३४ यानि प्रोक्तानि गीतानिबतुरूपं विशेषतः । ततः सप्तस्वर कार्यंसप्तरूपं च कौशिकी ॥३५

नगोनातु पुरस्तानु मध्यमांश पर्यय होता है । उन दोनों का विभाग देवों के लावण्य में मार्ग संस्थित है ।२६। अनुषङ्गमय वस्त्ररातर स्वसार देखा गया है और संवर्त्त में सप्तस्वर पदक्रम विपर्यय है ।३०। गान्धार सेतु और वरो मद्भंगवानि गाये जाया करते हैं और पंचम-मध्यम-धैवत निषाद से गाये जाते हैं ।३१। षड्ज और ऋषभ को हम मद्रकों में ही वनान्तर में जानते हैं । द्वे द्व य पद तो उष्णान्तिक के द्वय को क्या जाने ।३२। प्राकृत और वैवृत में वह गान्धार ही प्रयुक्त किया जाया करता है । पद का अत्यय रूप ओर सप्तरूप कौशिकी का प्रयोग करते हैं ।३३। गान्धार की इन कात्स्न्यं से यही विधि कही गयी है । यही मध्यमांश का मध्यम क्रमोद्दिष्ट है ।३४। जो भी गीत कहे गये हैं विशेष रूप से वतु रूप हैं । फिर सप्त स्वर सप्तरूप और कौशिकी करने चाहिए ।३५।

अगदर्शनमित्याहुर्मानुद्वैममके तथा । द्वितीयामास मात्राणाक्तिः सर्वाः प्रतिष्ठिताः ॥३६ उत्तरेवप्रकृत्येवंमाता ब्राह्मतलायत । तथाहृतारोपिण्डकेयत्रमायां निवर्त्तते ॥३७ पादेनैकेनमात्रायाः पादोनामतिवारिणः । संख्यापनोपहतां वै तव पानमिति स्मृतम् ॥३८ द्वितीयपादभंगं च ग्रहे नाम प्रतिष्ठितम् । पूर्वमष्टतीतटी न द्वितीयं चापरान्तिकैः ॥३६