संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआभूत संप्लव वर्णन ] [ ७३
पादभागसपादं तु चकृत्यामपि सस्थितम् ।
चतुर्थमुत्तरं चैवमद्रवत्पावमद्रकौ ॥४०
मद्रकोदक्षिणस्यापि यथोक्ता वर्त्तते कला ।
सर्वमेवानुयोगं तु द्वितीयं बुद्धिरिष्यते ॥४१
पादौ वा हरणं चास्मात्पारं नात्र विधीयते ।
एकत्वं मनुयोगस्य द्वयोर्यद्यद्विजोत्तम ॥४२
अनेकसमवायस्तु पातका हरिणा स्मृताः ।
तिसृणां चैव वृत्तीनां वृत्तौ वृत्ते च दक्षिणः ॥४३
अष्टौ तु समवायस्तु वीरा संमूर्छना तथा ।
कस्यनासुतरा चैव स्वरशाखा प्रकीर्त्तिता ॥४४
तथा भानुसोममक में अगदर्शन है—यह कहते हैं। द्वितीय मास मात्राओं से सब प्रतिष्ठित हैं ।३६। इस प्रकार से प्रकृति से उत्तरा की भांति माता ब्रह्म तलायत है । तथा हतारोपीड़क में जहाँ पर माया निवृत्त हो जाया करती है ।३७। एक पाद से माया का पादोना में अति चारी होते हैं । सख्यापनोय हृत वितन्न पान—यह कहा गया है ।३८। और द्वितीय पाद भङ्ग ग्रह में नाम प्रतिष्ठित है । पूर्व अष्ट तीर तोन द्वितीय अपरान्तिकों से होता है ।३८-३६। पदभाग सपाद तो प्रकृति में संस्थित प्राप्त होता है । चतुर्थ उत्तर इस प्रकार से पान और मद्रक को द्रवित करता था ।४०। दक्षिण की भी मद्रका यथोक्त कला होती है । सम्पूर्ण अनुयोग द्वितीय हैं जो बुद्धि को अभीष्ट किया करती है ।४१। और पादों का ही आहरण होता है और यहाँ पर पार नहीं होता है । हे द्विजोत्तम ! दोनों का जो-जो भी है वह अनुयोग का एकत्व है ।४२। अनेकों का जो समवाय है वह पातक हरण कहे गये हैं तीनों वृत्तियों का वृत्ति में और वृत्त में दक्षिण है ।४३। आठ समवाय तो तथा वीरा संमूच्छ्र्ना होती है । कस्यना सुतरा स्वर शाखा कीर्त्तित की गयी है ।४४।