संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गांधर्वं प्रति यच्चापि पृष्टस्तु मुनिसत्तमाः । ततोऽहं संप्रवक्ष्यामि याथातथ्येन सुव्रताः ॥२८
हे विभो ! वह समय देवों के देव का तो एक ही मुहूर्त था और मनुष्यों का वह समय बहुत से युगों के बराबर था । फिर वह युवा यादवों के समुदायों से घिरी हुई अपनी पुरी में आ गया था ।२२। वह पुरी द्वारवती नाम वाली की गयी थी जिसमें बहुत से द्वार थे और यह परम मनोहर थी । भोज-वृष्णि और अन्धक जो यादवों के विभिन्न भेद थे जिनमें वसुदेव अग्र-गामी थे—इन सबने उसकी रक्षा की थी ।२३। अरियों के दमन करने वाले रैवत ने ठीक तात्त्विक रूप से उस कथा का श्रवण किया और फिर उसने अपनी सुन्दर व्रत वाली रेवती नाम वाली कन्या को बलदेवजी के लिए समर्पित करके वह फिर मेरु पर्वत के शिखर तप चला गया था और वहाँ पर करने में संस्थित हो गया था ।२४। फिर बलरामजी भी जो परम धर्मात्मा थे, अपनी प्रिय पत्नी रेवती के साथ रमण किया करते थे । इस कथा को ऋषियों ने श्रवण करके इसके पश्चात उन्होंने पूछा था ।२५। ऋषियों ने कहा—हे महामते ! बहुत युगों वाले काल के व्यतीत जाने पर भी रेवती को और ककुद्मी रैवत को जरावस्था किस कारण से प्राप्त नहीं हुई थी ? इस सबके श्रवण करने की इच्छा वालों को वह गान्धर्व क्या है—यह भी बतलाने की कृपा कीजिए ।२६। श्रीसूतजी ने कहा-जो प्राणी ब्रह्म लोक में गमन कर जाया करता है उसको न तो कोई रोग ही होता है और उसको न मृत्यु का भय रहता है । वहां पर जरा और भूख प्यास भी नहीं सताया करती हैं ।२७। हे श्रेष्ठ मुनिगणो ! आपने जो मुझसे गान्धर्व के विषय में पूछा है उसको भी मैं हे सुव्रतो ! ठीक-ठीक रूप से बतलाऊँगा ।२८।
सप्त स्वरात्रयो ग्रामा मूर्छनास्त्वेकविंशतिः । तानाश्चैकोनपंचाशदित्येतत्स्वरमंडलम् ॥२६ षड्जर्षभौ च गांधारो मध्यमः पंचमस्तथा । धैवतश्चापि विज्ञेयस्तथा चापि निषादकः ॥३० सौवीरा मध्यमा ग्रामा हरिणाश्च तथैव च ॥३१ तस्याः कालायनोपेताश्चतुर्थाशुद्धमध्यमाः । अग्नि च पौषा वै देव दृष्ट्वा कांच यथाक्रमः ॥३२