भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गान्धर्वं मूच्छेना लक्षण ] [ ६३

के रूप में जन्म धारण किया था। १६। इस जनमेजय का पुत्र प्रमति नाम वाला बहुत ही प्रख्यात हुआ था। तृणबिन्दु के प्रभाव से ये सब वैशालक नृप हुए थे। १७। ये सभी सुदीर्घ आयु वाले—महान् समुच्च आत्माओं वाले—बल—वीर्य से सुसमन्वित और बहुत ही अधिक धार्मिक वृत्ति वाले हुए थे। शर्याति के एक जोड़ा हुआ था जो आनर्त्त के नाम विश्रुत था। १८। एक पुत्र था और एक सुकन्या नाम वाली कन्या थी जो च्यवन ऋषि की भार्या थी। उस आनर्त्त के दायको ग्रहण करने वाला पुत्र रेव नामक हुआ था जो बड़ा वीर्य वाला था। १६। आनर्त्त का देश था जिसको कुशस्थली नाम वाली पुरी थी। रेव का पुत्र रेवत ककुद्मी नाम वाला बड़ा धार्मिक हुआ था। २०। यह सौ भाइयों में सबसे बड़ा था। इसने ही कुशस्थली के राज्य को प्राप्त किया था। ब्रह्माजी के समीप में कन्या का श्रवण करके उसके साथ गन्धर्व ज्ञान कर लिया था। २१।

मुहूर्त्तं देवदेवस्य मार्त्यं बहुयुगं विभो।
आजगाम युवा चैव स्वां पुरीं यादवैर्वृताम् ॥२२
कृतां द्वारवतीं नाम बहुद्वारां मनोरमाम् ।
भोजवृष्ण्यन्धकैर्गुप्तां वसुदेवपुरोगमैः ॥२३
तां कथां रेवतः श्रुत्वा यथातत्त्वमरिंदमः।
कन्यां तु बलदेवाय सुव्रतां नाम रेवतीम् ।
दत्त्वा जगाम शिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः ॥२४
रेमे रामश्च धर्मात्मा रेवत्या सहितः किल ।
तां कथामृषयः श्रुत्वा पप्रच्छुस्तदनंतरम् ॥२५

ऋषय ऊचुः-

कथं बहुयुगे काले समतीते महामते।
न जरा रेवतीं प्राप्ता रैवतं वा ककुद्मिनम् ।
एतच्छुश्रूषमाणान्नो गान्धर्वं वद चैव हि ॥२६

सूत उवाच-

न जरा क्षुत्पिपासे वा न च मृत्युभय ततः ।
न च रोगः प्रभवति ब्रह्मलोकं गतस्य ह ॥२७