भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गान्धर्व मूर्छना लक्षण ] [ ६५

मध्यमग्रामिकाख्याता षड्जग्रामा निबोधत ।
उत्तरं मंद्रा रजनी तथा वाचोन्नरायताः ॥३३
मध्यषड्जा तथा चैव तथान्या चाभिमुद्गणा ।
गांधारग्रामिका श्यामा कीर्तिमाना निबोधत ॥३४
अग्निष्टोमं तु माद्यं तु द्वितीयं वाजपेयिकम् ।
यवरातसूयस्तु षष्ठवत्तु सुवर्णकम् ॥३५

सात तो स्वर होते हैं-तीन ग्राम हैं और इक्कीस मूर्च्छनाएं होती हैं। और तान उनचास हैं—यह सम्पूर्ण स्वर मण्डल होता है ।२६। सात स्वरों के नाम बताये जाते हैं—षड्ज-ऋषभ-गान्धार मध्यम-धैवत और निषाद ये सात स्वर हैं ।३०। सौवीरा-मध्यमा और हरिणा—ये तीन ग्राम हैं ।३१। उसके कालायनोपेता चतुर्था शुद्ध मध्यमा है। हे देव ! क्रमानुसार नग्न-घोषा और कांच ये देखकर होती हैं ।३२। ये मध्य ग्रामिका कही गयी हैं। अब षड्ज ग्रामा को समझ लीजिए। उत्तर-मन्द्रा-रजनी और वाचोन्नारायता है ।३४। तथा मध्यषड्जा है और अन्य अभिमुद्रणा होती है। गान्धारग्रामिका-श्यामा अब कीर्त्तिमाना होती है उसको समझलो ।३४। अग्निष्टोम-माद्य-द्वितीय वाजयिक-यवरातसूया-षष्ठवत्-सुवर्णक है ।३५।

सप्त गोसवना नाम महावृष्टिक्राष्टमाम् ।
ब्रह्मदानं च नवमं प्राजापत्यमनंतरम् ।
नागयक्षाश्रयं विद्वान् तद्गोत्तरस्तथैव च ॥३६
पदक्रांतमृगक्रांतं विष्णुक्रांतमनोहरा ।
सूर्यकांतधरेण्यैव संतकोकिलविश्रुतः ॥३७
तेनवानित्यपवशपिशाचातीवनह्यपि ।
सावित्रमर्धसावित्रं सर्वतोभद्रमेव च ॥३८
मनोहरमधात्र्यं च गन्धर्वानुपतश्च यः ।
अलंबुषेमथो विष्णुर्वणवरावुभौ ॥३९
सागराविजयं चैव सर्वभूतमनोहरः ।
हतोत्सृष्टो विजानीत स्कंधं तु प्रियमेव च ॥४०