संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
मन्वन्तर था । वे सब मनु भविष्य अनागत अन्तर में समुत्पन्न हुए थे ।२६। जो मनुगण प्राचेतस दक्ष के दौहित्र थे । ये नाम से पाँच तो सावर्णे थे और चार परमर्षि से समुत्पन्न हुए थे ।२७। संज्ञा का पुत्र एक सावर्णि तथा वैव- स्वत था । सबसे बड़ा संज्ञा का पुत्र प्रभु वैवस्वत मनु था ।२८।
वैवस्वतेंऽतरे प्राप्ते समुत्पत्तिस्तयोः शुभा ।
चतुर्दशैते मनवः कीर्तिताः कीर्तिवर्द्धनाः ।।२६
वेदे स्मृतौ पुराणे च सर्वे ते प्रभविष्णवः ।
प्रजानां पतयः सर्वे भूतानां पतयः स्थिताः ।।३०
तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना ।
पूर्णं युगसहस्रं वै परिपाल्या नरेश्वरैः ।।३१
प्रजाभिस्तपसा चैव विस्तरस्तेषु वक्ष्यते ।
चतुर्दशैते विज्ञेयाः सर्गाः स्वायंभुवादयः ।।३२
मन्वंतराधिकारेषु वर्त्तन्तेऽत्र सकृत्सकृत् ।
विनिवृत्ताधिकारास्ते महर्लोकं समाश्रिताः ।।३३
समतीतास्तु ये तेषामष्टौ षट् च तथाऽपरे ।
पूर्वेषु सांप्रतश्चायं शास्ति वैवस्वतः प्रभुः ।।३४
ये शिष्टास्तान्प्रवक्ष्यामि सह देवर्षिदानवैः ।
सह प्रजानिसर्गेण सर्वांस्तेऽनागतान्द्विजः ।।३५
वैवस्वत मनु के अन्तर प्राप्त हो जाने पर उन दोनों की समुत्पत्ति परम शुभ हुई थी । हमने ये चौदह मनुओं का वर्णन कर दिया है जो कि परमाधिक कीर्ति का वर्धन करने वाले हुए हैं ।२६। वेद में—स्मृति में और पुराण में वे सभी बहुत ही होनहार बताये गये हैं । ये सभी प्रजाओं के तथा प्राणियों के स्वामी हुए हैं ।३०। उन्हीं नरेश्वरों के द्वारा पूरे सहस्र युगों तक यह सम्पूर्ण पृथिवी सातों द्वीपों से समन्वित और बड़े-बड़े विशाल नगरों से युक्त परिपालन करने के योग्य है ।३१। प्रजाओं के द्वारा तथा तप से जो उनका विस्तार है वह सब भी बताया जा रहा है । ये चौदह सर्ग स्वायम्भुव आदि के हैं सभा जान लेने के योग्य हैं ।३२। यहाँ पर मन्वन्तरों के अधिकारों में एक-एक बार यह होता है । जब अधिकार विनिवृत्त हो जाता है
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ७६
तो वे सब जाकर महर्लोक में समाश्रय वाले हो जाते हैं ।३३। उनमें जो आठ थे वे व्यतीत हो चुके थे और छै दूसरे थे। पूर्व में होने वालों में यह वर्त्तमान में होने वाला यह वैवस्वत प्रभु शासन कर रहे हैं ।३४। जो भी शिष्ट रहे हैं उनको देव-ऋषि और दानवों के ही साथ अब बतलाऊँगा । हे द्विज ! सम्पूर्ण प्रजा की सृष्टि के साथ ही उन सभी अनागतों को बतलाया जायगा अर्थात् आगे होने वाले हैं उनको कहेंगे ।३५।
वैवस्वत निसर्गेण तेषां ज्ञेयस्तु विस्तरः ।
अनूना नातिरिक्तास्ते यस्मात्सर्वे विवस्वतः ॥३६
पुनरुक्तबहुत्वात्तु न वक्ष्ये तेषु विस्तरम् ।
मन्वन्तरेषु भव्येषु भूतेष्वपि तथैव च ॥३७
कुले कुले निसर्गास्तु तस्माज्ज्ञेया विभागशः ।
तेषामेव हि सिद्धयर्थं विस्तरेणक्रमेण च ॥३८
दक्षस्य कन्या धर्मिष्ठा सुव्रता नाम विश्रुता ।
सर्वकन्यावरिष्ठा तु ज्येष्ठा या वीरिणीसुता ॥३६
गृहीत्वा ता पिता कन्यां जगाम ब्रह्मणोऽन्तिके ।
वैराजस्थमुपासीनं धर्मेण च भवेन च ॥४०
भवधर्मसमीपस्थं दक्षं ब्रह्माऽभ्यभाषत ।
दक्ष कन्या तवेयं वै जनयिष्यति सुव्रता ॥४१
चतुरो वै मनून्पुत्रांश्चातुर्वर्ण्यकराञ्छुभान् ।
ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा दक्षो धर्मो भवस्तदा ॥४२
वैवस्वत मनु के विसर्ग से उनका भी विस्तार जान लेना चाहिए । कारण यह है कि वे सब वैवस्वत मनुसेन तो अन्यून हैं और न उससे अति-रिक्त ही हैं ।३६। वे बहुत हैं इसलिए और उनका दूसरी बार कथन होने से उनके विषय में विस्तार नहीं कहूँगा । जो भी पहिले हो गये हैं तथा जो भविष्य में होने वाले हैं उन सभी के विषय में अधिक विस्तार नहीं कहा जायगा ।३७। इस कारण से कुल-कुल में विभाग से ही निसर्ग समझ लेने चाहिए । उन्हीं की सिद्धि के लिए विस्तार से और क्रम से कहता हूँ ।३८। प्रजापति दक्ष की कन्या बड़ी ही धम्मिष्ठा थी तथा उसका नाम सुव्रता
८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रसिद्ध था । समस्त कन्याओं में बहुत श्रेष्ठ ज्येष्ठा थी जो वैरिणी का सुता थी ।३९। पिता उस कन्या को लेकर ब्रह्माजी के समीप में गया था । ब्रह्मा- जी वैराज मे समवस्थित थे और धर्म तथा मन के द्वारा उपासीन थे ।४०। जब दक्ष भव और धर्म के समीप में स्थित थे तब उनसे ब्रह्माजी ने कहा था--हे दक्ष ! आपकी यह सुव्रत कन्य चार मनुओं को जन्म देगी जो इसके पुत्र चारों वर्णों के करने वाले परम शुभ होंगे । ब्रह्माजी के इस वचन को सुनकर दक्ष-धर्म ओर भव उस समय मे यह किया था ।४१-४२।
तां कन्यां मनसा जग्मुस्त्रयस्ते ब्रह्मणा सह । सत्याभिध्यायिनां तेषां सद्यः कन्या व्यजायत ॥४३ सदृशानूपतस्तेषां चतुरो वै कुमारकान् । संसिद्धाः कार्यकरणे संभूतास्ते श्रियान्विताः ॥४४ उपभोगासमर्थैश्च सद्योजातैः शरीरकैः । ते दृष्ट्वा तान्स्वयंभूतान्ब्रह्मव्याहारिणस्तदा ॥४५ संरब्धा वै व्यकर्षंत मम पुत्रो ममेत्युत । अभिध्यायात्मनोत्पन्नानूचुर्वे ते परस्परम् ॥४६ यो अस्य वपुषा तुल्यो भजतां सततं सुतम् । यस्य यः सदृशश्चापि रूपे वीर्ये च मानतः ॥४७ तं गृह्णातु स भद्रं वो वर्णतो यस्य यः समः । ध्रुवं रूपं पितुः पुत्रः सोऽनुरुध्यति सर्वदा ॥४८ तस्मादात्मसमः पुत्रः पितुर्मातुश्च वीर्यतः । एवं ते समयं कृत्वा सर्वेषां जगृहुः सुतान् ॥४९
उस समय ब्रह्माजी के साथ ही मन से उन तीनों ने उस कन्या को गमन किया था । सत्याभि धायी उनकी कन्या के तुरन्त ही समुत्पन्न किया था । अर्थात् रूप से उन्हीं के सदृश चार कुमारों को जन्म दिया था वे कार्यों के करने में संसिद्ध थे तथा श्री से समन्वित हुए थे ।४५। उनके तुरन्त ही समुत्पन्न शरीर सभी उपभोगों के लिए समर्थ थे । स्वयं ही समुत्पन्न उन कुमारों को देखकर वे जो उस समय ब्रह्म के व्यापारी थे आपस में बहुत ही संरम्भ वाले होकर खींचातानी करने लगे कि यह मेरा पुत्र है—
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ८१
यह मेरा पुत्र है—ऐसा ही कह रहे थे । फिर उन्होंने आपस में कहा था कि ये अभिध्यान से आत्मा से ही समुत्पन्न हैं ।४५-४६। अतएव जो भी जिसके शरीर के तुल्य हो वह उसी को अपना सुत मान लेवे । जो भी जिसके रूप-वीर्य और मात में सदृश होवे अथवा वर्ण से जो जिसके समान हो उसी को वह ग्रहण कर लेवे—इसी में आप का कल्याण है । यह तो निश्चित ही है कि पुत्र पिता के रूप को सर्वदा ग्रहण किया करता है ।४७-४८। इसलिए पिता और माता के वीर्य से पुत्र सदा आत्मा के ही समान हुआ करता है । उस प्रकार से उन्होंने समझौता करके सब सुतों का ग्रहण किया था ।४९।
चाक्षुषस्यांतरेऽतीते प्राप्ते वैवस्वतस्य ह । रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रौच्यो नामाभवत्सुतः ॥५० भूत्यामुत्पादितो यस्तु भौत्यो नाम कवेः सुतः । वैवस्वतेऽन्तरे जातो द्वौ मनू तु विवस्वतः ॥५१ वैवस्वतो मनुर्यश्च सावर्णो यश्च वै श्रुतः । ज्ञेयः संज्ञासुतो विद्वान्मनुर्वैवस्वतः प्रभुः ॥५२ सवर्णयाः सुतश्चान्यः स्मृतो वैवस्वतो मनुः । सावर्णमनवो ये च चत्वारस्तु महर्षिजाः ॥५३ तपसा संभृतात्मानः स्वेषु मन्वन्तरेषु वै । भविष्येषु भविष्यन्ति सर्वकार्यार्थसाधकाः ॥५४ प्रथमे मेरुसावर्णेर्दक्षपुत्रस्य वै मनोः । परामरीचिगर्भाश्च सुधर्माणश्च ते वयः । संभूताश्च महात्मानः सर्वे वैवस्वतेऽन्तरे ॥५५ दक्षपुत्रस्य पुत्रास्ते रोहितस्य प्रजापतेः । भविष्यन्ति भविष्यास्तु एकैको द्वादशो गणः ॥५६
चाक्षुष मन्वन्तर के व्यतीत हो जाने पर और वैवस्त मन्वन्तर के सम्प्राप्त होने पर प्रजापति का रुचि से एक पुत्र उत्पन्न हुआ था जिसका नाम रौच्य हुआ था ।५०। जो भूति के गर्भ से उत्पन्न किया गया था उस पुत्र का नाम भौत्य हुआ था और यह कवि का पुत्र था । वैवस्वत मन्वन्तर
८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
में विवस्वत के दो मनु उत्पन्न हुए थे ।५१। और जो वैवस्वत मन था और जो सावर्ण नाम से विश्रुत था । प्रभु वैवस्वत मनु संज्ञा का ही पुत्र जानना चाहिए । यह पर विद्वान् थे ।५२। सवर्णा का अन्य सुत था वैवस्वत मनु कहा गया है । और जो सावर्ण मनु हैं वे चार महर्षियों से जन्म ग्रहण वाले हैं ।५३। वे निश्चित रूप से तपश्चर्या से सम्भृत आत्माओं वाले हुए थे और अपने मन्वन्तरों में ही हुए थे । आगे होने वालों में सभी कार्यों के अर्थों का साधन करने वाले होंगे ।५४। प्रथम मेरु सावर्ण में दक्ष प्रजापति के पुत्र मनु के मश मरीचि गर्भ और सुधर्माण ये तीन थे । वे सब महान् आत्माओं वाले वैवस्वत मन्वन्तर में समुत्पन्न हुए थे ।५५। वे दक्ष के पुत्र प्रजापति रोहित के पुत्र थे । जो आगे होने वाले हैं वे होंगे । एक-एक द्वादश गण हैं ।५६।
ऐश्वरश्च ग्रहो राहुर्वाकुर्वंशस्तथैव च ।
पारा द्वादश विज्ञेया उत्तरांस्तु निबोधत ॥५७
वाजिपो वाजिजिच्चैव प्रभृतिश्च ककुद्यथ ।
दधिकावा विषक्वश्च प्रणीतो विजतो मधुः ॥५८
उतथ्योत्तमकौ द्वौ तु द्वादशैते मरीचयः ।
सुधर्माणस्तु वक्ष्यामि नामतस्तान्निबोधत ॥५९
वणस्तथाथगविश्च भुरण्यो ब्रजनोऽमितः ।
अमितो द्रवकेतुश्च जंभोऽथाजस्तु शक्रकः ॥६०
मुनेमिद्युतयश्चैव सुधर्माणः प्रकीर्तिताः ।
तेषामिन्द्रस्तदा भव्यो ह्यद्भुतो नाम नामतः ॥६१
स्कन्दोऽसौ पार्वतीयो वै कार्तिकेयस्तु पावकिः ।
मेधातिथिश्च पौलस्त्यो वसुः काश्यप एव च ॥६२
ज्योतिष्मान्भागंवश्चैव द्युतिमानंगिरास्तथा ।
वसिष्ठश्चैव वासिष्ठ आत्रेयो हव्यवाहनः ॥६३
ऐश्वर-ग्रह-राहु-वाकु-वंश- ये पारा बारह हैं जो जान लेने चाहिए । अब उत्तर जो हैं उनको भी जान लो ।५७। वाजिप-वाजिजित्-प्रभूति- ककुदी-दधिकावा-प्रणीत-विजय-मधु-उतथ्य-उत्तमक ये दो हैं—ये द्वादश
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ८३
मरीचि हैं। सुधर्माण को बतलाऊंगा। उनको नाम से समझ लो ।६८-६६। वर्ण अवगन्धी-भूरण्य-व्रजन-अभित-द्रवकेतु-जम्भ-आज-शक्रक-सुनेमि-द्युतय— ये सब सुधर्माण कीत्तित किये गये हैं। उस समय में उनका जो होने वाला इन्द्र है उसका नाम अद्भुत है ।६०-६१। स्कन्द-पार्वतीय-कार्तिकेय-पावकि- मेधातिथि-पौलस्त्य-वसु-काश्यप।६२। ज्योतिष्मान्-भार्गव-द्युतिमान्-अङ्गिरा वसिन-वासिष्ठ-आत्रेय-हव्य वाहन ।६३।
सुतपाः पौलहश्चैव सप्तैते रोहितेतरे । धृतिकेतुर्दीप्तिकेतुः झापहस्तनिरामयाः ॥६४ पृथुश्रवास्तथाऽनीको भूरिद्युम्नो बृहद्यशः । प्रथमस्य तु सावर्णैनैव पुत्राः प्रकीर्तिताः ॥६५ दशमे त्वथ पर्याये धर्मपुत्रस्य वै मनोः । द्वितीयस्य तु सावर्णैर्भाविष्यस्यांतरे मनोः ॥६६ सुधमानो विरुद्धाश्च द्वावेव तु गणौ स्मृतौ । दीप्तिमन्तश्च ते सर्वे शतसंख्याश्च ते समाः ॥६७ प्राणानां यच्छतं प्रोक्तं ऋषिभिः पुरुषेति वै । देवास्ते वै भविष्यन्ति धर्मपुत्रस्य वै मनोः ॥६८ तेषामिन्द्रस्तथा विद्वान्भविष्यः शांतिरुच्यते । हविष्मान्पौलहः श्रीमान्सुकीर्तिश्चाथ भार्गवः ॥६६ आपोमूर्तिस्तथात्रेयो वसिष्ठश्चापवः स्मृतः । पौलस्त्योऽप्रतिमश्चापि नाभागश्चैव काश्यपः ॥७०
सुतपा-पौलह—ये सात रोहितेतर हैं। धृतिकेतु-दीप्तिकेतु-ज्ञाप-हस्त निरामय ।६४। पृथुश्रवा-अनीक-भूरिद्युम्न-बृहद्यश—ये प्रथम सावर्णि के नौ पुत्र बताये गये हैं ।६५। इसके अनन्तर दशम पर्याय में धर्म के पुत्र द्वितीय सावर्णि मनु के जो आगे होने वाला है उस मनु के अन्तर में ।६५। सुधामान और विरुद्ध—ये दो ही गण कहे गये हैं। वे सभी दीप्तिमान् थे और वे सम शत संख्या वाले थे ।६७। ऋषियों ने प्राणों के शत को पुरुष—यह कहा है। वे धर्म के पुत्र मनु के देवगण होंगे ।६८। उनका इन्द्र भविष्य विद्वान् हैं और
८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शास्ति नाम वाला कहा जाता है। हविष्मान्-पौलह-श्रीमान्-सुकीर्ति-भार्गव- आयोमूर्त्ति-आग्नेय-वसिष्ठ-अपव-पौलस्त्य-अप्रति म-गाभाग-काश्यप।६६-७०। अभिमन्युश्चांगिरसः सप्तैते परमर्षयः । सुक्षेत्रश्चोत्तमो जाश्चाश्च वीर्य्यवान् ॥७१ शतानीको निरामित्रो वृषसेनो जयद्रथः । भूरिद्युम्नः सुवर्चाश्च दशैते मानवाः स्मृताः ॥७२ एकादशे तु पर्याये सावर्णे वै तृतीयके । निर्वाणरतयो देवाः कामगा वै मनोजवाः ॥७३ गणास्त्वेते त्रयः ख्याता देवतानां महात्मनाम् । एकैकस्त्रिंशतस्तेषां गणस्तु त्रिदिवौकसाम् ॥७४ मासस्याहानि त्रिंशत्तु यानि वै कवयो विदुः । निर्वाणरतयो देवा रात्रयस्तु विहंगमा ॥७५ गणस्तृतीयो यः प्रोक्तो देवतानां भविष्यति । मनोजवा मुहूर्त्तास्तु इति देवाः प्रकीर्तिताः ॥७६ एते हि ब्रह्मण पुत्रा भविष्या मानवाः स्मृताः । तेषामिन्द्रो वृषा नाम भविष्यः सुरराट् ततः ॥७७
अभिमन्यु—आङ्गिरस—ये सात परम ऋषि अर्थात् सर्वोत्तम सात ऋषि हैं। सुक्षेत्र—उत्तमो जा—भूरिसेन—वीर्यवान्—शतानीक—निरामित्र—वृषसेन—जयद्रथ—भूरिसेन—सुवर्चा—ये दश मानव कहे गये हैं ।७१-७२। एकादश पर्याय में तीसरे सावर्ण में निर्माण रति वाले देवगण हैं जो स्वेच्छा से गमन करने वाले हैं और मन के ही तुल्य वेग से समन्वित हैं ।७३। महान् आत्माओं वाले देवताओं वाले देवताओं के ये तीन गण विख्यात हैं। उन स्वर्गवासियों एक-एक तीन सौ गण हैं।७४। एक मास के तीस होते हैं जिनको कविगण जानते हैं। निर्माण (मोक्ष) में रति अर्थात् अनुराग रखने वाले हैं और रात्रियां तो विहङ्गम (पक्षी) हैं।७५। तीसरा गण जो कहा गया है वह देवताओं का होगा। मन के वेग और मुहूर्त्त—ये देव कीर्तित किये गये हैं ।७६। ये सब ब्रह्माजी के पुत्र होने वाले हैं जो कि मानव कहे गये हैं। फिर उनका इन्द्र वृषा नाम वाला सुरराट् होने वाला है ।७७।
हविष्मान्काश्यपश्चापि वपुष्मांश्चैव भार्गवः ॥७८ आरुणिश् च तथात्रेयो वसिष्ठो नग एव च । पुष्टिरांगिरसो ज्ञेयः पौलस्त्यो निश्चरस्तथा ॥७९ पौलहो ह्यतितेजाश्च देवा ह्येकादशेतरे । सर्ववेगः सुधर्मा च देवानीकः पुरोवहः-॥८० क्षेमधर्मा ग्रहेषुश्च आदर्शः पौंड्रको मरुः । सावर्णस्य तु ते पुत्राः प्राजापत्यस्य वै नव ॥८१ द्वादशे त्वथ पर्याये रुद्रपुत्रस्य वै मनोः । चतुर्थो रुद्रसावर्णी देवांस्तस्यांतरे शृणु ॥८२ पंचैव तु गणाः प्रोक्ता देवतानामनागशाः । हरिता रोहिताश्चैव देवाः सुमनसस्तथा ॥८३ सुकर्माणः सुतारश्च विद्वांश्चैव सहस्रदः । पर्वतोऽनुचरश्चैव अपांशुश्च मनोजवः ॥८४
उनके जो सप्त ऋषिगण होंगे वे भी बतलाये जा रहे हैं। उनको भली भांति समझ लो। हविष्मान्-काश्यप-वपुष्मान्-भार्गव-आरुणि-आत्रेय-वसिष्ठ-नग पुष्टि-आङ्गिरस-पौलस्त्य-निश्चर-पौलह-अतितेजा-ये सब प्राजापत्य सावर्ण के नौ पुत्र हैं ।८१। अब बारह वें पर्याय में रुद्र के पुत्र मनु के चतुर्थ रुद्र सावर्णि है। उसके अन्तर में जो देवगण हैं उनका भी आप लोग श्रवण कर लेवे ।८२। जो अभी नहीं आगत हुए हैं वे देवताओं के पाँच ही गण कहे गये हैं। देव हारित-रोहित तथा सुमनस होते हैं ।८३। सुकर्माण-सुतार-विद्वान्-सहस्रद-पर्वत-अनुचर-अपांशु-मनोजव ।८४।
ऊर्जा स्वाहा स्वाधा तारा दशैते हरिताः स्मृताः । तपो ज्ञानी मृतिश्चैव वर्चा वंघ्रश्च यः स्मृतः ॥८५ रजश्चैव तु राजश्च स्वर्णपादस्तथैव च । पुष्टिर्विधिश्च वै देवा दशैते रोहिताः स्मृताः ॥८६
८६ ] [ कालिका पुराण
तुषिताद्यास्तु ये देवास्त्रययस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः । ते वै सुमनसो वेद्यान्निबोधत सुकर्मणः ॥८७ सुपर्वा वृषभः पृष्टा कपिद्युम्नविपश्चितः । विक्रमश्च क्रमश्चैव विभृतः कांत एव च ॥८८ एते देवाः सुकर्माणः सुतारांश्च निबोधत । वर्णो दिव्यस्तथांजिष्ठो वर्चस्वी द्युतिमान्कविः ॥८९ शुभो हविः कृतप्राप्तिर्व्यांपृतो दशमस्तथा । सुतारा नामतस्त्वेते देवा वै संप्रकीर्तिताः ॥९० तेषामिन्द्रस्तु विज्ञेयो ऋतधामा महायशाः । द्युतिर्वैविष्ठपुत्रस्तु आत्रेयः सुतपास्तथा ॥९१
ऊर्जा—स्वाहा—स्वधा—तारा ये दश हरित कहे गये हैं तप—ज्ञानी—मृति वर्त्ता—जो बन्धु कहा गया है ।८५। रज—राज—स्वर्णपाद—पुष्टि और विधि ये दश देव रोहित संज्ञा वाले कहे गये हैं ।८६। जो तुषित आदि देव हैं वे तैतीस बताये गए हैं । वे सुमनस जानने के योग्य होते हैं । अब सुकर्मण संज्ञा वालों को समझलो ।८७। सुपर्वा—वृषभ—पृष्टा—कपिद्युम्न—विपश्चित्—विक्रम—क्रम—विभृत—कान्त ।८८। ये देव सुकर्माण संज्ञा वाले हैं । अब जो सुतर संज्ञक है उनको जान लीजिए । वर्ण—अंजिष्ठ—वर्चस्वी—द्युतिमान् कवि—शुभ—हवि—कृत प्राप्ति—व्यापृत—दशम—ये सब सुतार नाम वाले देवगण हैं जिनको कीर्त्तित कर दिया गया है ।८९-९०। उनका इन्द्र ऋतधामा जान लेना चाहिए जो कि महान् यश वाला है । द्युति—वसिष्ठ पुत्र—आत्रेय—सुतपा ।९१।
तपोमूर्तिस्त्वांगिरसस्तपस्वी काश्यपस्तथा । तपोधनश्च पौलस्त्यः पौलहश्च तपोरतिः ॥९२ भार्गवः सप्तमस्तेषां विज्ञेयस्तु तपोधृतिः । एते सप्तर्षयः सिद्धा अंत्ये सावर्णिकेऽन्तररे ॥९३ देववानुपदेवश्च देवश्रेष्ठो विदूरथः । मित्रवान् मित्रसेनोऽथ चित्रसेनो ह्यमित्रहा ॥९४
८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
निष्प्रकंप्यस्तथाऽत्रेयो निर्मोहः काश्यपस्तथा ।
सुतपाश्चैव वासिष्ठः सप्तते तु त्रयोदश ॥१०३
चित्रसेनो विचित्रश्च नयो धर्मो धृतो भवः ।
अनेकः क्षत्रविद्वश्च सुरसो निर्भयो दश ॥१०४
रौच्यस्यैते मनोः पुत्रा ह्यंतरे तु त्रयोदशे ।
चतुर्दशे तु पर्याये भौत्यस्याप्यंतरे मनोः ॥१०५
जो तैतीस देव हैं उनको पृथक रूप से समझ लो । सुत्रामाण प्रकृष्ट रूप से यजन के योग्य होते हैं क्योंकि वे इस समय में आज्य (घृत) की आशा वाले होते हैं ।६६। सुकर्माण जो देवता हैं वे पश्चात् यजन करने वाले नामों के हैं क्योंकि वे पृषदाज्य के अशन करने वाले होते हैं । सुकर्माण देव उपयाज्य होते हैं । इस प्रकार से देवगण कीर्त्तित किए गए हैं ।१०१। उनका महान् सत्व वाला दिवस्पति इन्द्र होगा । वे पुलह के आत्मज रुचि के सुत जानने चाहिए ।१०१। अङ्गिरा ही धृति के धारण करने वाला है और वह पौलस्त्य भी अव्यय है । पौलह तत्वों का देखने वाला है तथा भार्गव उत्सुकता से रहित है ।१०२। निष्प्रकम्प्य तथा आत्रेय-निर्मोह-काश्यप-सुतपा और वसिष्ठ—ये सात हैं । ऐसे कुल तेरह हैं ।१०३। चित्रसेन-विचित्र-नय धर्म-धृत-भव-अनेक क्षत्रविद्ध-सुरस और निर्भय—ये दश हैं ।१०४। ये सब रौच्य के पुत्र हैं । जो तेरहवें अन्तर में मनु हैं । चौदहवें पर्याय में जो कि भौत्य मनु का अन्तर है ।१०५।
देवतानां गणाः पंच प्रोक्ता ये तु भविष्यति ।
चाक्षुषाश्च पवित्राश्च कनिष्ठा भ्राजितास्तथा ॥१०६
वाचावृद्धाश्च इत्येते पंच देवगणाः स्मृताः ।
निषादाद्याः स्वराः सप्त सप्त तान्विद्धि चाक्षुषान् ॥१०७
बृहदाद्यानि सामानि कनिष्ठान्सप्त तान्विदुः ।
सप्त लोकाः पवित्रास्ते भ्राजिताः सप्तसिंधवः ॥१०८
वाचावृद्धानृषीन्विद्धि मनोः स्वायंभुवस्य ये ।
सर्वे मन्वंतरेंद्राश्च विज्ञेयास्तुल्यलक्षणाः ॥१०६
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ८६
तेजसा तपसा बुद्ध्या बलश्रुतपराक्रमैः । त्रैलोक्ये यानि सत्त्वानि गतिमंति ध्रुवाणि च ॥११० सर्वशः स्वैर्गुणैस्तानि इन्द्रास्तोऽभिभवन्ति वै । भूतापवादिनो हृष्टा मध्यस्था भूतवादिनः ॥१११ भूताभिवादिनः शक्तास्त्रयो वेदाः प्रवादिनाम् । अग्नीध्रः काश्यपश्चैव पौलस्त्यो मागधश्च यः ॥११२
देवताओं के पाँच गण बताये गये हैं जो कि होंगे । चाक्षुष-पवित्र-कनिष्ठ तथा भ्राजित और वाचा वृद्ध—ये ही देवोंके पाँच गण कहे गये हैं। निषाद आदि सात स्वर हैं वैसे ही चाक्षुषों को भी सात समझ लो ।१०७। वृहद् आदिक साम हैं। उनको कनिष्ठ सात समझ लो । वे सात लोक पवित्र हैं वे भ्राजित सात सिन्धु हैं ।१०८। जो स्वाम्भुव मनु के ऋषि हैं उनको वाचा वृद्ध समझ लो । ये सभी तुल्य लक्षणों वाले मन्वन्तरों के इन्द्र जान लेने योग्य है ।१०६। तेज-तप-बुद्धि-बल-श्रुत पराक्रम के द्वारा इस त्रिभुवन में जो भी जीव गतिमान् और ध्रुव हैं ।११०। वे इन्द्र सभी प्रकार से अपने गुणों के द्वारा उनका अभिभव किया करते हैं। भूतापवादी दृष्ट-मध्य में स्थित और भूतवादी हैं ।१११। भूतों के अभिवादी प्रवादियों के लिए तीन वेद ही शक्ति वाले होते हैं । अग्नीध्र-काश्यप-पौलस्त्य और जो मागध है ।११२।
भार्गवो ह्यग्निबाहुश्च शुचिरांगिरसस्तथा । शुक्रश्चैव तु वासिष्ठः पौलहो मुक्त एव च ॥११३ आत्रेयः श्वाजितः प्रोक्तो मनुपुत्रानतः शृणु । उरुंगुरुश्च गंभीरो बुद्धः शुद्धः शुचिः कृती ॥११४ ऊर्जस्वी सुबलश्चैव भौत्यस्यैते मनोः सुताः । सावर्णा मनवो ह्येते चत्वारो ब्रह्मणः सुताः ॥११५ एको वैवस्वतश्चैव सावर्णो मनुरुच्यते । रौच्यो भौत्यश्च यो तौ तु मतौ पौलहभार्गवौ । भौत्यस्यैवाधिपत्ये तु तूर्णं कल्पस्तु पूर्यते ॥११६
६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सूत उवाच— निःशेषेषु तु सर्वेषु तदा मन्वंतरेष्विह ।।११७ अंतेऽनेकयुगे तस्मिन्क्षीणे संहार उच्यते । सप्तैते भार्गवा देवा अंते मन्वंतरे तदा ।।११८ भुक्त्वा त्रैलोक्यमध्यस्था युगाख्या ह्येकसप्ततिः । पितृभिर्मनुभिः सार्द्धं क्षीणे मन्वंतरे तदा ।।११९
भार्गव-अग्निबाहु-शुचि-आङ्गिरस-शुक्र-वासिष्ठ पौलह-मुक्त-आत्रेय-श्वाजित कहे गये हैं। इसके बाद में जो मनु के पुत्र हैं उसका श्रवण करो। उरु-गुरु-गम्भीर-बुद्ध-शुद्ध-शुचि-कृती-ऊर्जस्वी-सुबल-ये सब भौम्य मनु के पुत्र हैं। ये सावर्ण मनु हैं और चारों ब्रह्माजी के पुत्र हैं।११३-११५। एक वैवस्वत ही सावर्ण मनु कहा जाता है। रोच्य और भौत्य जो ये दो हैं वे पौलह और भार्गव माने गए हैं। भौत्य के ही आधिपत्य में तूर्ण कल्प पूर्ण हो जाता है।११६। श्री सूतजी ने कहा—यहाँ पर जब सभी मन्वन्तर निःशेष हो जाते हैं।११७। तब अनेक युगों के क्षीण हो जाने पर अन्त में संहार कहा जाया करता है। उस समय के अन्त में मन्वन्तर में ये सात भार्गव देव होते हैं।११८। ये त्रैलोक्य के मध्य में संस्थित हुए भोग करते हैं। युगों की आख्या एकहत्तर होती है। उस समय में पितरों और मनुओं के साथ मन्वन्तर क्षीण हो जाता है।११९।
अनाधारमिदं सर्वं त्रैलोक्यं वै भविष्यति । ततः स्थानानि शुभ्राणि स्थानिनां तानि वै तदा ।।१२० प्रभ्रश्यंते विमुक्तानि तारा ऋक्षग्रहैस्तथा । ततस्तेषु व्यतीतेषु त्रैलोक्यस्येश्वरेष्विह ।।१२१ संप्राप्तेषु महर्लोकं यस्मिंस्ते कल्पवासिनः । अजिताद्या गणा यत्र आयुष्मंतश्चतुर्दश ।।१२२ मन्वंतरेषु सर्वेषु देवास्ते वै चतुर्दश । सशरीराश्च श्रूयंते जनलोके सहानुगाः ।।१२३ एवं देवेष्वतीतेषु महर्लोकाज्जनं प्रति । भूतादिष्ववशिष्टेषु स्थावरा तेषु तेषु वै ।।१२४
शून्येषु लोकस्थानेषु महांतेषु भुवादिषु । देवेषु च गतेषूर्ध्वं सायुज्यं कल्पवासिनाम् ॥१२५ संहृत्य तांस्ततो ब्रह्मा देवर्षिपितृदानवान् । संस्थापयति वै सर्गमहर्दृष्ट्वा युगक्षये ॥१२६ चतुर्युगसहस्रांतमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रांतां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥१२७
तब यह सम्पूर्ण त्रैलोक्य आधार से रहित होता है। फिर जो भी स्थानीयोँ के परम शुभ्र स्थान हैं वे सभी नष्ट भ्रष्ट हो जाते हैं। १२०। ये सभी तारे और नक्षत्र तथा ग्रहों द्वारा विमुक्त होते हुए विनष्ट हो जाया करते हैं। फिर जब ये सभी व्यतीत हो जाया करते हैं जो इन तीनों लोकों के स्वामी तथा संचलक होते हैं। १२१। जिसमें जो भी कल्पवासी अर्थात् पूरे कल्पों तक रहने वाले हैं वे सभी महर्लोक में चले जाया करते हैं। जहाँ पर अजित आदि गण हैं और ये चौदह आयुष्मान् हैं। १२२। सभी मन्वन्तरों में देवता ये चौदह ही होते हैं। वे ऐसे सुने जाया करते हैं कि सब अपने अनुयायियों के साथ ही में शरीरों के सहित जनलोक में निवास किया करते हैं ।१२३। इस तरह से महर्लोक से जनलोक की ओर सभी देवों के व्यतीत हो जाने पर और स्थावरों के अन्त पर्यन्त सब भूतादि के अवशिष्ट होने पर ।१२४। भूलोक से लेकर महर्लोक तक जितने भी लोक स्थान हैं वे सब शून्य हो जाते हैं। सभी वेद भी कल्पवासियों के समीप में ऊपर की ओर चले जाया करते हैं। १२५। इसके अनन्तर ब्रह्माजी उन सबका देव-ऋषि-पितृ-और दानवों का संहार करके युग क्षय में दिन को देखकर फिर सर्ग को संस्थापित किया करते हैं। १२६। एक सहस्र चारों युगों की चौकड़ी का जब अन्त हो जाता है तब ब्रह्माजी का दिन हुआ करता है और इसी रीति से एक सहस्र चारों युगों की चौकड़ी का जब अन्त होता है तब ब्रह्माजी की एक रात्रि हुआ करती है। ऐसे पितामह का अहोरात्र होता है। १२७।
नैमित्तिकः प्राकृतिको यश्चैवात्यंतिकोऽर्थतः । त्रिविधः सर्वभूतानामित्येष प्रतिसंचरः ॥१२८ ब्राह्मो नैमित्तिकस्तस्य कल्पदाहः प्रसंयमः । प्रतिसर्गो तु भूतानां प्राकृतः करणक्षयः ॥१२६
६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ज्ञानाच्चात्यंतिकः प्रोक्तः कारणानामसंभवः । ततः संहृत्य तान्ब्रह्मा देवांस्त्रैलोक्यवासिनः ॥१३० प्रहरांते प्रकुरुते सर्गस्य प्रलयं पुनः । सुषुप्सुर्भगवान्ब्रह्मा प्रजाः संहरते तदा ॥१३१ ततो युगसहस्रांते संप्राप्ते च युगक्षये । तत्रात्मस्थाः प्रजाः कर्तुं प्रपेदे स प्रजापतिः ॥१३२ तदा भवत्यनावृष्टिः संतता शतवार्षिकी । तया यान्यल्पसाराणि सत्त्वानि पृथिवीतले ॥१३३
यह समस्त प्राणियों का सञ्चर तीन प्रकार का हुआ करता है—अर्थानुसार एक नैमित्तिक होता है—दूसरा प्राकृतिक है और तीसरा आत्यान्तिक होता है ।१२८। ब्रह्माजी का जो नैमित्तिक है वह प्रसंयम कल्पदाह है । प्रत्येक भूतों के सर्ग में प्राकृत करना क्षय होता है ।१२९। ज्ञान से अत्यधिक कहा गया है जहाँ पर कारणों की कोई सम्भवता नहीं होती है । इसके अनन्तर ब्रह्माजो उन समस्त त्रैलोक्य के निवासी देवों का संहार किया करते हैं ।१३०। फिर प्रहर के अन्त में सर्ग का प्रलय किया करते हैं । भगवान् ब्रह्माजी जब शयन करने की इच्छा वाले होते हैं उसी समय में समस्त प्रजाओं का संहार किया करते हैं ।१३१। फिर चारों युगों की एक सहस्र चोकड़ी का अन्त हो जाता है और युगों का क्षय प्राप्त होता है उस काल में वही प्रजापति समस्त प्रजाओं को अपनी ही आत्मा में स्थित करने के लिए समुद्यत हो जाया करते हैं । उस समय में जो महान् प्रजाओं का संहार होता है उसका आरम्भ इस तरह से हुआ करता है कि सबसे पूर्व तो वर्षा का एकदम निरन्तर रहने वाला अभाव सौ वर्षों तक होता है । उस समय में जल के एकदम सर्वथा न रहने दो जो बहुत अल्प सार वाले जीव हैं और इस पृथ्वी तल में निवास करते हैं वे सभी नष्ट हो जाया करते हैं ।१३२-१३३।
तान्येवात्र प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयांति च । सप्तरश्मिरथो भूत्वा उदतिष्ठद्विभावसुः ॥१३४ असह्यरश्मिर्भगवान्पिबत्यंभो गभस्तिभिः । हरिता रश्मयस्तस्य दीप्यमानास्तु सप्ततिः ॥१३५
आभूत संप्लव वर्णन ] । ६३
भूय एव विवर्त्तन्तो व्याप्नुवंतोंबरं शनैः ।
भौमं काष्ठेंधनं तेजो भृशमद्भिस्तु दीप्यते ॥१३६
तस्मादुदकभृत्सूर्यस्तपतीति हि कथ्यते ।
नावृष्ट्या तपते सूर्य्यो नावृष्ट्या परिषिच्यते ॥१३७
नावृष्ट्या परिविश्येत वारिणा दीप्यते रविः ।
तस्मादपः पिबन्यो वै दीप्यते रविरंबरे ॥१३८
तस्य ते रश्मयः सप्त पिबंत्यंभो महार्णवात् ।
तेनाहारेण संदीप्ताः सूर्याः सप्त भवंत्युत ॥१३९
ततस्ते रश्मयः सप्त सूर्यभूताश्चतुर्दिशम् ।
चतुर्लोकमिमं सर्वं दहं ति शिखिनस्तदा ॥१४०
उस जलाभाव में वे ही जीव प्रलीन होकर भूमि में मिल जाया करते हैं। फिर सूर्यदेव सात रश्मियों वाले होकर अर्थात् सात गुने तेजस्वी होकर उदित हुआ करते हैं। १३४। उस समय में सूर्य भगवान् न सहन करने के योग्य किरणों वाले हो जाया करते हैं और वे अपनी किरणों से भूमि गत सम्पूर्ण जल को पी जाया करते हैं। उस सूर्य को संतति हरित रश्मियां दीप्यमान हो जाती हैं। १३५। फिर नभोमण्डल को व्याप्त करती हुई धीरे बढ़ती हैं। भूमि का काष्ठेन्धन बहुत ही तेज युक्त होकर दीप्त होता है जो जल के ही कारण से हो जाता है। १३६। इसी कारण से जल के भरने वाला सूर्य तपता है—यही कहा जाया करता है। सूर्य अवृष्टि से नहीं तपा करता है और अवृष्टि से सूर्य परिषिक्त भी नहीं होता है। १३७। अवृष्टि से सूर्य परिवृष्ट नहीं होता है प्रत्युत जल के ही द्वारा रवि दीप्त हुआ करता है। इसी कारण से जो जलों का पान करता रहता है वही रवि अम्बर में दीप्त हुआ करता है। १३८। उस सूर्य की सात रश्मियाँ (किरणें) महा सागर से जल का पान किया करती हैं। उसी आहार से सात सूर्य प्रदीप्त होते हैं। १३९। इसके अनन्तर वे रश्मियाँ चारों दिशाओं में सात सूर्यों के समान होती हुई उस समय में वे अग्नियां इन चारों लोकों को दग्ध किया करती हैं। १४०।
प्राप्नुवंति च ताभिस्तु ह्यूर्ध्वं चाधश्च रश्मिभिः ।
दीष्यंते भास्कराः सप्त युगांताग्निप्रतापिनः ॥१४१
६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ते वारिणा प्रदीप्ताश्च बहुसाहस्ररश्मयः । स्वं समावृत्य तिष्ठन्ति निर्दहन्तो वसुंधराम् ॥१४२ ततस्तेषां प्रतापेन दह्यमाना वसुन्धरा । साद्रिनद्यर्णवा पृथ्वी निस्नेहा समपद्यत ॥१४३ दीप्तिभिः संतताभिश्च चित्राभिश्च समंततः । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च संरुद्धा सूर्यरश्मिभिः ॥१४४ सूर्याग्नीनां प्रवृद्धानां संसृष्टानां परस्परम् । एकत्वमुपयातानामेकज्वाला भवत्युत ॥१४५ सर्वलोकप्रणाशश्च सोऽग्निर्भूत्वाऽनुमंडली । चतुर्लोकमिदं सर्वं निर्दहत्याशुतेजसा ॥१४६ ततः प्रलीने सर्वस्मिञ्जङ्गमे स्थावरे तथा । निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिः कूर्मपृष्ठसमा भवेत् ॥१४७
उन रश्मियों के द्वारा ऊपर की ओर तथा नीचे की ओर अग्नियां प्राप्त होती हैं युग के अन्त में प्रताप देने वाले सात सूर्य दीप्त हुआ करते हैं ।१४१। सहस्र रश्मियों की बाहुएं वारि के ही द्वारा ही प्रदीप्त होती हैं । वे आकाश को समावृत करके ही सम्पूर्ण वसुन्धरा का निर्दहन करती हुईं स्थिर रहा करती हैं ।१४२। इसके पश्चात् उनके परिताप से दहन को प्राप्त होती हुई सम्पूर्ण वसुन्धरा पर्वत-नदी और समुद्रों के सहित यह पृथ्वी स्नेह (द्रव जल) से रहित हो गयी थी ।१४३। निरन्तर विद्यमान रहने वाली-सुदीप्त और विचित्रता से चारों ओर युक्त सम्पूर्ण भूमि ऊपर-नीचे और तिरछी ओर सूर्य की किरणों से संरुद्ध हो गयी थीं ।१४४। प्रवृद्ध हुई और परस्पर में संसृष्ट हुई सूर्य की अग्नियां एक स्वरूप को प्राप्त होकर एक ही विशाल ज्वाला हो जाती है ।१४५। वह अग्नि अनुमण्डल वाली होकर समस्त लोकों का प्रणाश किया करता है और इन चारों लोकों का सबका बहुत ही शीघ्र तेज के द्वारा निर्दहन कर देती है ।१४६। इसके अनन्तर इस सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम के प्रलीन होने पर यह समग्र पृथ्वी वृक्षों से रहित बिना तृणों वाली कछुए की पीठ के ही समान यह जैसी हो गयी थी और उस पर कुछ भी शेष नहीं रह गया था ।१४७।
अंबरीषमिवाभाति सर्वमप्यखिलं जगत् । सर्वमेव तदर्चिभिः पूर्णं जाज्वल्यतो घनः ॥१४८ भूतले यानि सत्त्वानि महोदधिगतानि च । ततस्तानि प्रलीयंतो भूमित्वमुपयांति च ॥१४६ द्वीपांश्च पर्वतांश्चैव वर्षाण्यथ महोदधिः । सर्वं तद्भस्मसाच्चक्रे सर्वात्मा पावकस्तु सः ॥१५० समुद्रेभ्यो नदीभ्यश्च पातालेभ्यश्च सर्वशः । पिबत्यपः समिद्धोऽग्निः पृथिवीमाश्रितो ज्वलन् ॥१५१ ततः संवर्द्धितः शैलानतिक्रम्य ग्रहांस्तथा । लोकान्संहरते दीप्तो घोरः संवर्त्तकोऽनलः ॥१५२ ततः स पृथिवीं भित्वा रसातलमाशोषयत् । निर्दह्यान्ते तु पातालं वायुलोकमथादहत् ॥१५३ अधस्तात्पृथिवीं दग्ध्वा तूर्ध्वं स दहतो दिवम् । योजनानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥१५४
यह सब जगत् उस समय में अम्बरीष के ही समान आभास होता था । और यह सम्पूर्ण उस अग्नि की अर्चियों से पूर्ण घन प्रज्वलित हो रहा था ।१४८। इस भूतल में जितने भी प्राणी थे तथा महासागर में जो भी सत्त्व थे वे सबके सब प्रलीन हो जाते हैं और भूमि को मिट्टी में मिल जाया करते हैं ।१४६। समस्त द्वीप—पर्वत—वर्ष और महासागर इन सभी को उस सर्वात्मा पावक ने जलाकर भस्म के तुल्य ही बना दिया था ।१५०। इस भूमि में रहने वाला वह परमाधिक प्रदीप्त अग्नि जलता हुआ होकर समुद्रों से-नदियों से और पातालों से सभी जगह से जल का पान किया करता है। ।१५१। इसके अनन्तर वह परम घोर सम्वर्त्तक अनल अधिक सम्वर्धित होकर शैलों और ग्रहों का अतिक्रमण करके परम दीप्त होता हुआ समस्त लोकों का संहार किया करता है ।१५२। इसके पश्चात् वह भीषण अनल इस पृथ्वी का भेदन करके रसातल में पहुँच कर उसका भी शोषण कर देता है । अन्त में पाताल लोक को निर्दग्ध करके फिर वायु लोक को दग्ध कर दिया था ।१५३। नीचे पृथ्वी का दाह करके और ऊपर की ओर स्वर्ग लोक को
६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दग्ध कर दिया था। सहस्रों तथा प्रयुतों और अर्बुदों योजन पर्यन्त उस कालानल की ज्वालाएँ ऊँची उठ रही थीं ।१५४।
उदतिष्ठञ्छिखास्तस्य बह्व्यः संवर्त्तकस्य तु ।
गन्धर्वांश्च पिशाचांश्च समहोरगराक्षसान् ॥१५५
तदा दहति संदीप्तो गोलकं चैव सर्वशः ।
भूलोकं च भुवर्लोकं स्वर्लोकं च महस्तथा ॥१५६
घोरो दहति कालाग्निरेवं लोकचतुष्टयम् ।
व्याप्तेषु तेषु लोकेषु तिर्यगूर्ध्वमथाग्निना ॥१५७
तत्तेजः समनुप्राप्य कृत्स्नं जगदिदं शनैः ।
अयोगुडनिभं सर्वं तदा ह्येवं प्रकाशते ॥१५८
ततो गजकुलाकारास्तडिद्भिः समलंकृताः ।
उत्तिष्ठन्ति तदा घोरा व्योम्नि संवर्तका घनाः ॥१५६
केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसन्निभाः ।
केचिद्वैडूर्यसंकाशा इन्द्रनीलनिभाः परे ॥१६०
शंखकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यंजननिभास्तथा ।
धूम्रवर्णा घनाः केचित्केचित्पीताः पयोधराः ॥१६१
उस सम्वर्तक अनल की शिखाएं बहुत सी ऊपर की ओर उठ रही थीं और वे ज्वालाएं ऊपर में संस्थित गन्धर्वों—पिशाचों और महोरगों तथा राक्षसों को निर्दग्ध कर रही थीं ।१५५। उस समय में यह संदीप्त अनल सभी ओर से गोलक को दग्ध कर देता है। भूलोक-भुवर्लोक—स्वर्लोक और महर्लोक को भी जला देता है ।१५६। यह परम कालाग्नि इस रीति से चारों लोकों को निर्दग्ध कर दिया करता है। तिरछा और ऊपर की ओर इस प्रकार से उन समस्त लोकों में इसके व्याप्त हो जाने पर सभी को भस्मसात् कर देता है ।१५७। धीरे-धीरे यह तेज इस सम्पूर्ण जगत् में सम्प्राप्त हो जाता है। उस समय में यह सम्पूर्ण जगत् एक परमाधिक संतप्त लोहे के गोले के ही समान प्रकाशित हुआ करता है ।१५८। इसके उपरान्त उस समय में नभोमंडल में हाथियों के समूह के आकार वाले विद्युल्लता से समलङ्कृत परम घोर सम्वर्त्तक मेघ उमड़ कर उठते हैं ।१५६। उन मेघों
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ६७
में कुछ तो नील कमलों के सदृश आकार वाले होते हैं और कुछ कुमुदों के तुल्य हुआ करते हैं। कुछ वैडूर्यमणि के समान होते हैं तो दूसरे इन्द्रनील मणि के तुल्य हुआ करते हैं। १६०। कुछ शङ्ख और कुन्द पुष्प के सदृश श्वेत होते हैं तथा कुछ जाती और अञ्जन के समान हुआ करते हैं। कुछ मेघों का वर्ण धूम्र के समान होता है तथा कुछ पयोधर पीतवर्ण वाले होते हैं। १६१।
केचिद्रासभवर्णाभा लाक्षारसन्निभास्तथा । मनःशिलाभास्त्वपरे कपोताभास्तथांबुदाः ॥१६२ इन्द्रगोपनिभाः केचिद्धरितालनिभास्तथा । चाषपत्रनिभाः केचिदुत्तिष्ठंति घना दिवि ॥१६३ केचित्पुरवराकाराः केचिद्गजकुलोपमाः । केचित्पर्वतसंकाशाः केचित्स्थलनिभा घनाः ॥१६४ क्रीडागारनिभाः केचित्केचिन्मीनकुलोपमाः । बहुरूपा घोररूपा घोरस्वरनिनादिनः ॥१६५ तदा जलधराः सर्वे पूरयंति नभस्तलम् । ततस्ते जलदा घोरराविणो भास्करात्मकाः ॥१६६ सप्तधा संवृतात्मानस्तमग्निं शमयंत्युत । ततस्ते जलदा वर्षं मुंचंति च महौघवत् ॥१६७ सुघोरमशिवं सर्वं नाशयन्ति च पावकम् । प्रवृष्टैश्च तथात्यर्थं वारिणा पूर्यते जगत् ॥१६८
कुछ मेघों का वर्ण रासभ (गधा) के सदृश होता है तथा कुछ लाख के रस के सदृश हुआ करते हैं। दूसरे कुछ मैनसिल के सदृश एकदम सुर्ख होते हैं तथा कुछ कबूतरों के समान वर्णों वाले होते हैं। १६२। कुछ इन्द्र गोप के सदृश हैं तो कुछ हरिताल के समान रङ्ग वाले हुआ करते हैं। उस समय में अन्तरिक्ष में चाष के पत्रों के ही सदृश मेघ उमड़कर उठा करते हैं। १६३। कुछ घन श्रेष्ठ पुर के आकार वाले हैं तो कुछ द्विज (पक्षी) कुलों के सदृश हुआ करते हैं। कुछ घन तो उस समय में विशाल पर्वतों के समान आकार वाले होते हैं तथा कुछ ऐसे प्रतीत होते हैं मानों स्थल ही होवें । १६४। कुछ
६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
मेष क्रीड़ा गृहों के तुल्य होते हैं तो कुछ मीनों के समुद्यम के सदृश दिखलाई दिया करते हैं। उस समय में मेघों के अनेक स्वरूप दिखाई दिया करते हैं। उनका स्वरूप परमाधिक घोर होता है और वे भयङ्कर गर्जन किया करते हैं।१६५। उस समय जलधर आकर नभस्तल को एक साथ समाच्छादित कर देते हैं। इसके अनन्तर वे मेघ परम भीषण घोष किया करते हैं और भास्कर के ही स्वरूप वाले होते हैं।१६६। सात स्वरूपों में संवृत होने वाले वे मेघ उस परम घोर अग्नि का शमन कर दिया करते हैं। इसके उपरान्त वे मेघ महान् घोर मूसलाधार वर्षा किया करते हैं।१६७। परम घोर अशिव उस अग्नि का विनाश कर दिया करते हैं और अत्यधिक वर्षा के द्वारा जल से सम्पूर्ण जगत् को भर दिया करते हैं।१६८।
अद्भिस्तेजोभिभूतं च तदाग्निः प्रविशत्यपः । नष्टे चाग्नौ वर्षगते पयोदाः पावकोद्भवाः ॥१६६
प्लावयंतो जगत्सर्वं बृहज्जलपरिस्रवैः । धाराभिः पूरयंतीमं चोद्यमानाः स्वयंभुवा ॥१७०
अन्ये तु सलिलौघैस्तु वेलामभिभवन्त्यपि । सार्द्रद्वीपांतरं पीतं जलमन्येषु तिष्ठति ॥१७१
पुनः पतति भूमौ तत्पयोधस्तान्नभस्तले । संवैष्टयति घोरात्मा दिवि वायुः समंततः ॥१७२
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजंगमे । पूर्णे युगसहस्रे वै निःशेषः कल्प उच्यते ॥१७३
अथांभसाऽऽवृते लोके प्राहुरेकार्णवं बुधाः । अथ भूमिर्जलं खं च वायुश्चैकार्णवे तदा ॥१७४
नष्टेऽनलेऽन्धभूते तु प्राज्ञायत न किंचन । पार्थिवास्त्वथ सामुद्रा आपो दैव्याश्च सर्वशः ॥१७५
उस समय में तेज से समुद्भूत वह अग्नि जलों के द्वारा परिभूरित होकर फिर जल में प्रवेश कर जाया करती है। जब वर्षा से वह अग्नि विनष्ट हो जाती है तो यपोद भी पावकोद्भव हो जाया करते हैं।१६६। विशाल जलों उप्लवों से सम्पूर्ण जगत् प्लावित कर देते हैं और स्वयम्भू के