भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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शून्येषु लोकस्थानेषु महांतेषु भुवादिषु । देवेषु च गतेषूर्ध्वं सायुज्यं कल्पवासिनाम् ॥१२५ संहृत्य तांस्ततो ब्रह्मा देवर्षिपितृदानवान् । संस्थापयति वै सर्गमहर्दृष्ट्वा युगक्षये ॥१२६ चतुर्युगसहस्रांतमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः । रात्रिं युगसहस्रांतां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥१२७

तब यह सम्पूर्ण त्रैलोक्य आधार से रहित होता है। फिर जो भी स्थानीयोँ के परम शुभ्र स्थान हैं वे सभी नष्ट भ्रष्ट हो जाते हैं। १२०। ये सभी तारे और नक्षत्र तथा ग्रहों द्वारा विमुक्त होते हुए विनष्ट हो जाया करते हैं। फिर जब ये सभी व्यतीत हो जाया करते हैं जो इन तीनों लोकों के स्वामी तथा संचलक होते हैं। १२१। जिसमें जो भी कल्पवासी अर्थात् पूरे कल्पों तक रहने वाले हैं वे सभी महर्लोक में चले जाया करते हैं। जहाँ पर अजित आदि गण हैं और ये चौदह आयुष्मान् हैं। १२२। सभी मन्वन्तरों में देवता ये चौदह ही होते हैं। वे ऐसे सुने जाया करते हैं कि सब अपने अनुयायियों के साथ ही में शरीरों के सहित जनलोक में निवास किया करते हैं ।१२३। इस तरह से महर्लोक से जनलोक की ओर सभी देवों के व्यतीत हो जाने पर और स्थावरों के अन्त पर्यन्त सब भूतादि के अवशिष्ट होने पर ।१२४। भूलोक से लेकर महर्लोक तक जितने भी लोक स्थान हैं वे सब शून्य हो जाते हैं। सभी वेद भी कल्पवासियों के समीप में ऊपर की ओर चले जाया करते हैं। १२५। इसके अनन्तर ब्रह्माजी उन सबका देव-ऋषि-पितृ-और दानवों का संहार करके युग क्षय में दिन को देखकर फिर सर्ग को संस्थापित किया करते हैं। १२६। एक सहस्र चारों युगों की चौकड़ी का जब अन्त हो जाता है तब ब्रह्माजी का दिन हुआ करता है और इसी रीति से एक सहस्र चारों युगों की चौकड़ी का जब अन्त होता है तब ब्रह्माजी की एक रात्रि हुआ करती है। ऐसे पितामह का अहोरात्र होता है। १२७।

नैमित्तिकः प्राकृतिको यश्चैवात्यंतिकोऽर्थतः । त्रिविधः सर्वभूतानामित्येष प्रतिसंचरः ॥१२८ ब्राह्मो नैमित्तिकस्तस्य कल्पदाहः प्रसंयमः । प्रतिसर्गो तु भूतानां प्राकृतः करणक्षयः ॥१२६