संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 502, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सूत उवाच— निःशेषेषु तु सर्वेषु तदा मन्वंतरेष्विह ।।११७ अंतेऽनेकयुगे तस्मिन्क्षीणे संहार उच्यते । सप्तैते भार्गवा देवा अंते मन्वंतरे तदा ।।११८ भुक्त्वा त्रैलोक्यमध्यस्था युगाख्या ह्येकसप्ततिः । पितृभिर्मनुभिः सार्द्धं क्षीणे मन्वंतरे तदा ।।११९
भार्गव-अग्निबाहु-शुचि-आङ्गिरस-शुक्र-वासिष्ठ पौलह-मुक्त-आत्रेय-श्वाजित कहे गये हैं। इसके बाद में जो मनु के पुत्र हैं उसका श्रवण करो। उरु-गुरु-गम्भीर-बुद्ध-शुद्ध-शुचि-कृती-ऊर्जस्वी-सुबल-ये सब भौम्य मनु के पुत्र हैं। ये सावर्ण मनु हैं और चारों ब्रह्माजी के पुत्र हैं।११३-११५। एक वैवस्वत ही सावर्ण मनु कहा जाता है। रोच्य और भौत्य जो ये दो हैं वे पौलह और भार्गव माने गए हैं। भौत्य के ही आधिपत्य में तूर्ण कल्प पूर्ण हो जाता है।११६। श्री सूतजी ने कहा—यहाँ पर जब सभी मन्वन्तर निःशेष हो जाते हैं।११७। तब अनेक युगों के क्षीण हो जाने पर अन्त में संहार कहा जाया करता है। उस समय के अन्त में मन्वन्तर में ये सात भार्गव देव होते हैं।११८। ये त्रैलोक्य के मध्य में संस्थित हुए भोग करते हैं। युगों की आख्या एकहत्तर होती है। उस समय में पितरों और मनुओं के साथ मन्वन्तर क्षीण हो जाता है।११९।
अनाधारमिदं सर्वं त्रैलोक्यं वै भविष्यति । ततः स्थानानि शुभ्राणि स्थानिनां तानि वै तदा ।।१२० प्रभ्रश्यंते विमुक्तानि तारा ऋक्षग्रहैस्तथा । ततस्तेषु व्यतीतेषु त्रैलोक्यस्येश्वरेष्विह ।।१२१ संप्राप्तेषु महर्लोकं यस्मिंस्ते कल्पवासिनः । अजिताद्या गणा यत्र आयुष्मंतश्चतुर्दश ।।१२२ मन्वंतरेषु सर्वेषु देवास्ते वै चतुर्दश । सशरीराश्च श्रूयंते जनलोके सहानुगाः ।।१२३ एवं देवेष्वतीतेषु महर्लोकाज्जनं प्रति । भूतादिष्ववशिष्टेषु स्थावरा तेषु तेषु वै ।।१२४