भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 501, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 501

आभूत संप्लव वर्णन ] [ ८६

तेजसा तपसा बुद्ध्या बलश्रुतपराक्रमैः । त्रैलोक्ये यानि सत्त्वानि गतिमंति ध्रुवाणि च ॥११० सर्वशः स्वैर्गुणैस्तानि इन्द्रास्तोऽभिभवन्ति वै । भूतापवादिनो हृष्टा मध्यस्था भूतवादिनः ॥१११ भूताभिवादिनः शक्तास्त्रयो वेदाः प्रवादिनाम् । अग्नीध्रः काश्यपश्चैव पौलस्त्यो मागधश्च यः ॥११२

देवताओं के पाँच गण बताये गये हैं जो कि होंगे । चाक्षुष-पवित्र-कनिष्ठ तथा भ्राजित और वाचा वृद्ध—ये ही देवोंके पाँच गण कहे गये हैं। निषाद आदि सात स्वर हैं वैसे ही चाक्षुषों को भी सात समझ लो ।१०७। वृहद् आदिक साम हैं। उनको कनिष्ठ सात समझ लो । वे सात लोक पवित्र हैं वे भ्राजित सात सिन्धु हैं ।१०८। जो स्वाम्भुव मनु के ऋषि हैं उनको वाचा वृद्ध समझ लो । ये सभी तुल्य लक्षणों वाले मन्वन्तरों के इन्द्र जान लेने योग्य है ।१०६। तेज-तप-बुद्धि-बल-श्रुत पराक्रम के द्वारा इस त्रिभुवन में जो भी जीव गतिमान् और ध्रुव हैं ।११०। वे इन्द्र सभी प्रकार से अपने गुणों के द्वारा उनका अभिभव किया करते हैं। भूतापवादी दृष्ट-मध्य में स्थित और भूतवादी हैं ।१११। भूतों के अभिवादी प्रवादियों के लिए तीन वेद ही शक्ति वाले होते हैं । अग्नीध्र-काश्यप-पौलस्त्य और जो मागध है ।११२।

भार्गवो ह्यग्निबाहुश्च शुचिरांगिरसस्तथा । शुक्रश्चैव तु वासिष्ठः पौलहो मुक्त एव च ॥११३ आत्रेयः श्वाजितः प्रोक्तो मनुपुत्रानतः शृणु । उरुंगुरुश्च गंभीरो बुद्धः शुद्धः शुचिः कृती ॥११४ ऊर्जस्वी सुबलश्चैव भौत्यस्यैते मनोः सुताः । सावर्णा मनवो ह्येते चत्वारो ब्रह्मणः सुताः ॥११५ एको वैवस्वतश्चैव सावर्णो मनुरुच्यते । रौच्यो भौत्यश्च यो तौ तु मतौ पौलहभार्गवौ । भौत्यस्यैवाधिपत्ये तु तूर्णं कल्पस्तु पूर्यते ॥११६