संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
निष्प्रकंप्यस्तथाऽत्रेयो निर्मोहः काश्यपस्तथा ।
सुतपाश्चैव वासिष्ठः सप्तते तु त्रयोदश ॥१०३
चित्रसेनो विचित्रश्च नयो धर्मो धृतो भवः ।
अनेकः क्षत्रविद्वश्च सुरसो निर्भयो दश ॥१०४
रौच्यस्यैते मनोः पुत्रा ह्यंतरे तु त्रयोदशे ।
चतुर्दशे तु पर्याये भौत्यस्याप्यंतरे मनोः ॥१०५
जो तैतीस देव हैं उनको पृथक रूप से समझ लो । सुत्रामाण प्रकृष्ट रूप से यजन के योग्य होते हैं क्योंकि वे इस समय में आज्य (घृत) की आशा वाले होते हैं ।६६। सुकर्माण जो देवता हैं वे पश्चात् यजन करने वाले नामों के हैं क्योंकि वे पृषदाज्य के अशन करने वाले होते हैं । सुकर्माण देव उपयाज्य होते हैं । इस प्रकार से देवगण कीर्त्तित किए गए हैं ।१०१। उनका महान् सत्व वाला दिवस्पति इन्द्र होगा । वे पुलह के आत्मज रुचि के सुत जानने चाहिए ।१०१। अङ्गिरा ही धृति के धारण करने वाला है और वह पौलस्त्य भी अव्यय है । पौलह तत्वों का देखने वाला है तथा भार्गव उत्सुकता से रहित है ।१०२। निष्प्रकम्प्य तथा आत्रेय-निर्मोह-काश्यप-सुतपा और वसिष्ठ—ये सात हैं । ऐसे कुल तेरह हैं ।१०३। चित्रसेन-विचित्र-नय धर्म-धृत-भव-अनेक क्षत्रविद्ध-सुरस और निर्भय—ये दश हैं ।१०४। ये सब रौच्य के पुत्र हैं । जो तेरहवें अन्तर में मनु हैं । चौदहवें पर्याय में जो कि भौत्य मनु का अन्तर है ।१०५।
देवतानां गणाः पंच प्रोक्ता ये तु भविष्यति ।
चाक्षुषाश्च पवित्राश्च कनिष्ठा भ्राजितास्तथा ॥१०६
वाचावृद्धाश्च इत्येते पंच देवगणाः स्मृताः ।
निषादाद्याः स्वराः सप्त सप्त तान्विद्धि चाक्षुषान् ॥१०७
बृहदाद्यानि सामानि कनिष्ठान्सप्त तान्विदुः ।
सप्त लोकाः पवित्रास्ते भ्राजिताः सप्तसिंधवः ॥१०८
वाचावृद्धानृषीन्विद्धि मनोः स्वायंभुवस्य ये ।
सर्वे मन्वंतरेंद्राश्च विज्ञेयास्तुल्यलक्षणाः ॥१०६