भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८६ ] [ कालिका पुराण

तुषिताद्यास्तु ये देवास्त्रययस्त्रिंशत्प्रकीर्तिताः । ते वै सुमनसो वेद्यान्निबोधत सुकर्मणः ॥८७ सुपर्वा वृषभः पृष्टा कपिद्युम्नविपश्चितः । विक्रमश्च क्रमश्चैव विभृतः कांत एव च ॥८८ एते देवाः सुकर्माणः सुतारांश्च निबोधत । वर्णो दिव्यस्तथांजिष्ठो वर्चस्वी द्युतिमान्कविः ॥८९ शुभो हविः कृतप्राप्तिर्व्यांपृतो दशमस्तथा । सुतारा नामतस्त्वेते देवा वै संप्रकीर्तिताः ॥९० तेषामिन्द्रस्तु विज्ञेयो ऋतधामा महायशाः । द्युतिर्वैविष्ठपुत्रस्तु आत्रेयः सुतपास्तथा ॥९१

ऊर्जा—स्वाहा—स्वधा—तारा ये दश हरित कहे गये हैं तप—ज्ञानी—मृति वर्त्ता—जो बन्धु कहा गया है ।८५। रज—राज—स्वर्णपाद—पुष्टि और विधि ये दश देव रोहित संज्ञा वाले कहे गये हैं ।८६। जो तुषित आदि देव हैं वे तैतीस बताये गए हैं । वे सुमनस जानने के योग्य होते हैं । अब सुकर्मण संज्ञा वालों को समझलो ।८७। सुपर्वा—वृषभ—पृष्टा—कपिद्युम्न—विपश्चित्—विक्रम—क्रम—विभृत—कान्त ।८८। ये देव सुकर्माण संज्ञा वाले हैं । अब जो सुतर संज्ञक है उनको जान लीजिए । वर्ण—अंजिष्ठ—वर्चस्वी—द्युतिमान् कवि—शुभ—हवि—कृत प्राप्ति—व्यापृत—दशम—ये सब सुतार नाम वाले देवगण हैं जिनको कीर्त्तित कर दिया गया है ।८९-९०। उनका इन्द्र ऋतधामा जान लेना चाहिए जो कि महान् यश वाला है । द्युति—वसिष्ठ पुत्र—आत्रेय—सुतपा ।९१।

तपोमूर्तिस्त्वांगिरसस्तपस्वी काश्यपस्तथा । तपोधनश्च पौलस्त्यः पौलहश्च तपोरतिः ॥९२ भार्गवः सप्तमस्तेषां विज्ञेयस्तु तपोधृतिः । एते सप्तर्षयः सिद्धा अंत्ये सावर्णिकेऽन्तररे ॥९३ देववानुपदेवश्च देवश्रेष्ठो विदूरथः । मित्रवान् मित्रसेनोऽथ चित्रसेनो ह्यमित्रहा ॥९४