संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहविष्मान्काश्यपश्चापि वपुष्मांश्चैव भार्गवः ॥७८ आरुणिश् च तथात्रेयो वसिष्ठो नग एव च । पुष्टिरांगिरसो ज्ञेयः पौलस्त्यो निश्चरस्तथा ॥७९ पौलहो ह्यतितेजाश्च देवा ह्येकादशेतरे । सर्ववेगः सुधर्मा च देवानीकः पुरोवहः-॥८० क्षेमधर्मा ग्रहेषुश्च आदर्शः पौंड्रको मरुः । सावर्णस्य तु ते पुत्राः प्राजापत्यस्य वै नव ॥८१ द्वादशे त्वथ पर्याये रुद्रपुत्रस्य वै मनोः । चतुर्थो रुद्रसावर्णी देवांस्तस्यांतरे शृणु ॥८२ पंचैव तु गणाः प्रोक्ता देवतानामनागशाः । हरिता रोहिताश्चैव देवाः सुमनसस्तथा ॥८३ सुकर्माणः सुतारश्च विद्वांश्चैव सहस्रदः । पर्वतोऽनुचरश्चैव अपांशुश्च मनोजवः ॥८४
उनके जो सप्त ऋषिगण होंगे वे भी बतलाये जा रहे हैं। उनको भली भांति समझ लो। हविष्मान्-काश्यप-वपुष्मान्-भार्गव-आरुणि-आत्रेय-वसिष्ठ-नग पुष्टि-आङ्गिरस-पौलस्त्य-निश्चर-पौलह-अतितेजा-ये सब प्राजापत्य सावर्ण के नौ पुत्र हैं ।८१। अब बारह वें पर्याय में रुद्र के पुत्र मनु के चतुर्थ रुद्र सावर्णि है। उसके अन्तर में जो देवगण हैं उनका भी आप लोग श्रवण कर लेवे ।८२। जो अभी नहीं आगत हुए हैं वे देवताओं के पाँच ही गण कहे गये हैं। देव हारित-रोहित तथा सुमनस होते हैं ।८३। सुकर्माण-सुतार-विद्वान्-सहस्रद-पर्वत-अनुचर-अपांशु-मनोजव ।८४।
ऊर्जा स्वाहा स्वाधा तारा दशैते हरिताः स्मृताः । तपो ज्ञानी मृतिश्चैव वर्चा वंघ्रश्च यः स्मृतः ॥८५ रजश्चैव तु राजश्च स्वर्णपादस्तथैव च । पुष्टिर्विधिश्च वै देवा दशैते रोहिताः स्मृताः ॥८६