भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ज्ञानाच्चात्यंतिकः प्रोक्तः कारणानामसंभवः । ततः संहृत्य तान्ब्रह्मा देवांस्त्रैलोक्यवासिनः ॥१३० प्रहरांते प्रकुरुते सर्गस्य प्रलयं पुनः । सुषुप्सुर्भगवान्ब्रह्मा प्रजाः संहरते तदा ॥१३१ ततो युगसहस्रांते संप्राप्ते च युगक्षये । तत्रात्मस्थाः प्रजाः कर्तुं प्रपेदे स प्रजापतिः ॥१३२ तदा भवत्यनावृष्टिः संतता शतवार्षिकी । तया यान्यल्पसाराणि सत्त्वानि पृथिवीतले ॥१३३

यह समस्त प्राणियों का सञ्चर तीन प्रकार का हुआ करता है—अर्थानुसार एक नैमित्तिक होता है—दूसरा प्राकृतिक है और तीसरा आत्यान्तिक होता है ।१२८। ब्रह्माजी का जो नैमित्तिक है वह प्रसंयम कल्पदाह है । प्रत्येक भूतों के सर्ग में प्राकृत करना क्षय होता है ।१२९। ज्ञान से अत्यधिक कहा गया है जहाँ पर कारणों की कोई सम्भवता नहीं होती है । इसके अनन्तर ब्रह्माजो उन समस्त त्रैलोक्य के निवासी देवों का संहार किया करते हैं ।१३०। फिर प्रहर के अन्त में सर्ग का प्रलय किया करते हैं । भगवान् ब्रह्माजी जब शयन करने की इच्छा वाले होते हैं उसी समय में समस्त प्रजाओं का संहार किया करते हैं ।१३१। फिर चारों युगों की एक सहस्र चोकड़ी का अन्त हो जाता है और युगों का क्षय प्राप्त होता है उस काल में वही प्रजापति समस्त प्रजाओं को अपनी ही आत्मा में स्थित करने के लिए समुद्यत हो जाया करते हैं । उस समय में जो महान् प्रजाओं का संहार होता है उसका आरम्भ इस तरह से हुआ करता है कि सबसे पूर्व तो वर्षा का एकदम निरन्तर रहने वाला अभाव सौ वर्षों तक होता है । उस समय में जल के एकदम सर्वथा न रहने दो जो बहुत अल्प सार वाले जीव हैं और इस पृथ्वी तल में निवास करते हैं वे सभी नष्ट हो जाया करते हैं ।१३२-१३३।

तान्येवात्र प्रलीयन्ते भूमित्वमुपयांति च । सप्तरश्मिरथो भूत्वा उदतिष्ठद्विभावसुः ॥१३४ असह्यरश्मिर्भगवान्पिबत्यंभो गभस्तिभिः । हरिता रश्मयस्तस्य दीप्यमानास्तु सप्ततिः ॥१३५