संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआभूत संप्लव वर्णन ] । ६३
भूय एव विवर्त्तन्तो व्याप्नुवंतोंबरं शनैः ।
भौमं काष्ठेंधनं तेजो भृशमद्भिस्तु दीप्यते ॥१३६
तस्मादुदकभृत्सूर्यस्तपतीति हि कथ्यते ।
नावृष्ट्या तपते सूर्य्यो नावृष्ट्या परिषिच्यते ॥१३७
नावृष्ट्या परिविश्येत वारिणा दीप्यते रविः ।
तस्मादपः पिबन्यो वै दीप्यते रविरंबरे ॥१३८
तस्य ते रश्मयः सप्त पिबंत्यंभो महार्णवात् ।
तेनाहारेण संदीप्ताः सूर्याः सप्त भवंत्युत ॥१३९
ततस्ते रश्मयः सप्त सूर्यभूताश्चतुर्दिशम् ।
चतुर्लोकमिमं सर्वं दहं ति शिखिनस्तदा ॥१४०
उस जलाभाव में वे ही जीव प्रलीन होकर भूमि में मिल जाया करते हैं। फिर सूर्यदेव सात रश्मियों वाले होकर अर्थात् सात गुने तेजस्वी होकर उदित हुआ करते हैं। १३४। उस समय में सूर्य भगवान् न सहन करने के योग्य किरणों वाले हो जाया करते हैं और वे अपनी किरणों से भूमि गत सम्पूर्ण जल को पी जाया करते हैं। उस सूर्य को संतति हरित रश्मियां दीप्यमान हो जाती हैं। १३५। फिर नभोमण्डल को व्याप्त करती हुई धीरे बढ़ती हैं। भूमि का काष्ठेन्धन बहुत ही तेज युक्त होकर दीप्त होता है जो जल के ही कारण से हो जाता है। १३६। इसी कारण से जल के भरने वाला सूर्य तपता है—यही कहा जाया करता है। सूर्य अवृष्टि से नहीं तपा करता है और अवृष्टि से सूर्य परिषिक्त भी नहीं होता है। १३७। अवृष्टि से सूर्य परिवृष्ट नहीं होता है प्रत्युत जल के ही द्वारा रवि दीप्त हुआ करता है। इसी कारण से जो जलों का पान करता रहता है वही रवि अम्बर में दीप्त हुआ करता है। १३८। उस सूर्य की सात रश्मियाँ (किरणें) महा सागर से जल का पान किया करती हैं। उसी आहार से सात सूर्य प्रदीप्त होते हैं। १३९। इसके अनन्तर वे रश्मियाँ चारों दिशाओं में सात सूर्यों के समान होती हुई उस समय में वे अग्नियां इन चारों लोकों को दग्ध किया करती हैं। १४०।
प्राप्नुवंति च ताभिस्तु ह्यूर्ध्वं चाधश्च रश्मिभिः ।
दीष्यंते भास्कराः सप्त युगांताग्निप्रतापिनः ॥१४१