संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
आभूत संप्लव वर्णन ] । ६३
भूय एव विवर्त्तन्तो व्याप्नुवंतोंबरं शनैः ।
भौमं काष्ठेंधनं तेजो भृशमद्भिस्तु दीप्यते ॥१३६
तस्मादुदकभृत्सूर्यस्तपतीति हि कथ्यते ।
नावृष्ट्या तपते सूर्य्यो नावृष्ट्या परिषिच्यते ॥१३७
नावृष्ट्या परिविश्येत वारिणा दीप्यते रविः ।
तस्मादपः पिबन्यो वै दीप्यते रविरंबरे ॥१३८
तस्य ते रश्मयः सप्त पिबंत्यंभो महार्णवात् ।
तेनाहारेण संदीप्ताः सूर्याः सप्त भवंत्युत ॥१३९
ततस्ते रश्मयः सप्त सूर्यभूताश्चतुर्दिशम् ।
चतुर्लोकमिमं सर्वं दहं ति शिखिनस्तदा ॥१४०
उस जलाभाव में वे ही जीव प्रलीन होकर भूमि में मिल जाया करते हैं। फिर सूर्यदेव सात रश्मियों वाले होकर अर्थात् सात गुने तेजस्वी होकर उदित हुआ करते हैं। १३४। उस समय में सूर्य भगवान् न सहन करने के योग्य किरणों वाले हो जाया करते हैं और वे अपनी किरणों से भूमि गत सम्पूर्ण जल को पी जाया करते हैं। उस सूर्य को संतति हरित रश्मियां दीप्यमान हो जाती हैं। १३५। फिर नभोमण्डल को व्याप्त करती हुई धीरे बढ़ती हैं। भूमि का काष्ठेन्धन बहुत ही तेज युक्त होकर दीप्त होता है जो जल के ही कारण से हो जाता है। १३६। इसी कारण से जल के भरने वाला सूर्य तपता है—यही कहा जाया करता है। सूर्य अवृष्टि से नहीं तपा करता है और अवृष्टि से सूर्य परिषिक्त भी नहीं होता है। १३७। अवृष्टि से सूर्य परिवृष्ट नहीं होता है प्रत्युत जल के ही द्वारा रवि दीप्त हुआ करता है। इसी कारण से जो जलों का पान करता रहता है वही रवि अम्बर में दीप्त हुआ करता है। १३८। उस सूर्य की सात रश्मियाँ (किरणें) महा सागर से जल का पान किया करती हैं। उसी आहार से सात सूर्य प्रदीप्त होते हैं। १३९। इसके अनन्तर वे रश्मियाँ चारों दिशाओं में सात सूर्यों के समान होती हुई उस समय में वे अग्नियां इन चारों लोकों को दग्ध किया करती हैं। १४०।
प्राप्नुवंति च ताभिस्तु ह्यूर्ध्वं चाधश्च रश्मिभिः ।
दीष्यंते भास्कराः सप्त युगांताग्निप्रतापिनः ॥१४१
६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ते वारिणा प्रदीप्ताश्च बहुसाहस्ररश्मयः । स्वं समावृत्य तिष्ठन्ति निर्दहन्तो वसुंधराम् ॥१४२ ततस्तेषां प्रतापेन दह्यमाना वसुन्धरा । साद्रिनद्यर्णवा पृथ्वी निस्नेहा समपद्यत ॥१४३ दीप्तिभिः संतताभिश्च चित्राभिश्च समंततः । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च संरुद्धा सूर्यरश्मिभिः ॥१४४ सूर्याग्नीनां प्रवृद्धानां संसृष्टानां परस्परम् । एकत्वमुपयातानामेकज्वाला भवत्युत ॥१४५ सर्वलोकप्रणाशश्च सोऽग्निर्भूत्वाऽनुमंडली । चतुर्लोकमिदं सर्वं निर्दहत्याशुतेजसा ॥१४६ ततः प्रलीने सर्वस्मिञ्जङ्गमे स्थावरे तथा । निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिः कूर्मपृष्ठसमा भवेत् ॥१४७
उन रश्मियों के द्वारा ऊपर की ओर तथा नीचे की ओर अग्नियां प्राप्त होती हैं युग के अन्त में प्रताप देने वाले सात सूर्य दीप्त हुआ करते हैं ।१४१। सहस्र रश्मियों की बाहुएं वारि के ही द्वारा ही प्रदीप्त होती हैं । वे आकाश को समावृत करके ही सम्पूर्ण वसुन्धरा का निर्दहन करती हुईं स्थिर रहा करती हैं ।१४२। इसके पश्चात् उनके परिताप से दहन को प्राप्त होती हुई सम्पूर्ण वसुन्धरा पर्वत-नदी और समुद्रों के सहित यह पृथ्वी स्नेह (द्रव जल) से रहित हो गयी थी ।१४३। निरन्तर विद्यमान रहने वाली-सुदीप्त और विचित्रता से चारों ओर युक्त सम्पूर्ण भूमि ऊपर-नीचे और तिरछी ओर सूर्य की किरणों से संरुद्ध हो गयी थीं ।१४४। प्रवृद्ध हुई और परस्पर में संसृष्ट हुई सूर्य की अग्नियां एक स्वरूप को प्राप्त होकर एक ही विशाल ज्वाला हो जाती है ।१४५। वह अग्नि अनुमण्डल वाली होकर समस्त लोकों का प्रणाश किया करता है और इन चारों लोकों का सबका बहुत ही शीघ्र तेज के द्वारा निर्दहन कर देती है ।१४६। इसके अनन्तर इस सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम के प्रलीन होने पर यह समग्र पृथ्वी वृक्षों से रहित बिना तृणों वाली कछुए की पीठ के ही समान यह जैसी हो गयी थी और उस पर कुछ भी शेष नहीं रह गया था ।१४७।
अंबरीषमिवाभाति सर्वमप्यखिलं जगत् । सर्वमेव तदर्चिभिः पूर्णं जाज्वल्यतो घनः ॥१४८ भूतले यानि सत्त्वानि महोदधिगतानि च । ततस्तानि प्रलीयंतो भूमित्वमुपयांति च ॥१४६ द्वीपांश्च पर्वतांश्चैव वर्षाण्यथ महोदधिः । सर्वं तद्भस्मसाच्चक्रे सर्वात्मा पावकस्तु सः ॥१५० समुद्रेभ्यो नदीभ्यश्च पातालेभ्यश्च सर्वशः । पिबत्यपः समिद्धोऽग्निः पृथिवीमाश्रितो ज्वलन् ॥१५१ ततः संवर्द्धितः शैलानतिक्रम्य ग्रहांस्तथा । लोकान्संहरते दीप्तो घोरः संवर्त्तकोऽनलः ॥१५२ ततः स पृथिवीं भित्वा रसातलमाशोषयत् । निर्दह्यान्ते तु पातालं वायुलोकमथादहत् ॥१५३ अधस्तात्पृथिवीं दग्ध्वा तूर्ध्वं स दहतो दिवम् । योजनानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥१५४
यह सब जगत् उस समय में अम्बरीष के ही समान आभास होता था । और यह सम्पूर्ण उस अग्नि की अर्चियों से पूर्ण घन प्रज्वलित हो रहा था ।१४८। इस भूतल में जितने भी प्राणी थे तथा महासागर में जो भी सत्त्व थे वे सबके सब प्रलीन हो जाते हैं और भूमि को मिट्टी में मिल जाया करते हैं ।१४६। समस्त द्वीप—पर्वत—वर्ष और महासागर इन सभी को उस सर्वात्मा पावक ने जलाकर भस्म के तुल्य ही बना दिया था ।१५०। इस भूमि में रहने वाला वह परमाधिक प्रदीप्त अग्नि जलता हुआ होकर समुद्रों से-नदियों से और पातालों से सभी जगह से जल का पान किया करता है। ।१५१। इसके अनन्तर वह परम घोर सम्वर्त्तक अनल अधिक सम्वर्धित होकर शैलों और ग्रहों का अतिक्रमण करके परम दीप्त होता हुआ समस्त लोकों का संहार किया करता है ।१५२। इसके पश्चात् वह भीषण अनल इस पृथ्वी का भेदन करके रसातल में पहुँच कर उसका भी शोषण कर देता है । अन्त में पाताल लोक को निर्दग्ध करके फिर वायु लोक को दग्ध कर दिया था ।१५३। नीचे पृथ्वी का दाह करके और ऊपर की ओर स्वर्ग लोक को
६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दग्ध कर दिया था। सहस्रों तथा प्रयुतों और अर्बुदों योजन पर्यन्त उस कालानल की ज्वालाएँ ऊँची उठ रही थीं ।१५४।
उदतिष्ठञ्छिखास्तस्य बह्व्यः संवर्त्तकस्य तु ।
गन्धर्वांश्च पिशाचांश्च समहोरगराक्षसान् ॥१५५
तदा दहति संदीप्तो गोलकं चैव सर्वशः ।
भूलोकं च भुवर्लोकं स्वर्लोकं च महस्तथा ॥१५६
घोरो दहति कालाग्निरेवं लोकचतुष्टयम् ।
व्याप्तेषु तेषु लोकेषु तिर्यगूर्ध्वमथाग्निना ॥१५७
तत्तेजः समनुप्राप्य कृत्स्नं जगदिदं शनैः ।
अयोगुडनिभं सर्वं तदा ह्येवं प्रकाशते ॥१५८
ततो गजकुलाकारास्तडिद्भिः समलंकृताः ।
उत्तिष्ठन्ति तदा घोरा व्योम्नि संवर्तका घनाः ॥१५६
केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसन्निभाः ।
केचिद्वैडूर्यसंकाशा इन्द्रनीलनिभाः परे ॥१६०
शंखकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यंजननिभास्तथा ।
धूम्रवर्णा घनाः केचित्केचित्पीताः पयोधराः ॥१६१
उस सम्वर्तक अनल की शिखाएं बहुत सी ऊपर की ओर उठ रही थीं और वे ज्वालाएं ऊपर में संस्थित गन्धर्वों—पिशाचों और महोरगों तथा राक्षसों को निर्दग्ध कर रही थीं ।१५५। उस समय में यह संदीप्त अनल सभी ओर से गोलक को दग्ध कर देता है। भूलोक-भुवर्लोक—स्वर्लोक और महर्लोक को भी जला देता है ।१५६। यह परम कालाग्नि इस रीति से चारों लोकों को निर्दग्ध कर दिया करता है। तिरछा और ऊपर की ओर इस प्रकार से उन समस्त लोकों में इसके व्याप्त हो जाने पर सभी को भस्मसात् कर देता है ।१५७। धीरे-धीरे यह तेज इस सम्पूर्ण जगत् में सम्प्राप्त हो जाता है। उस समय में यह सम्पूर्ण जगत् एक परमाधिक संतप्त लोहे के गोले के ही समान प्रकाशित हुआ करता है ।१५८। इसके उपरान्त उस समय में नभोमंडल में हाथियों के समूह के आकार वाले विद्युल्लता से समलङ्कृत परम घोर सम्वर्त्तक मेघ उमड़ कर उठते हैं ।१५६। उन मेघों
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ६७
में कुछ तो नील कमलों के सदृश आकार वाले होते हैं और कुछ कुमुदों के तुल्य हुआ करते हैं। कुछ वैडूर्यमणि के समान होते हैं तो दूसरे इन्द्रनील मणि के तुल्य हुआ करते हैं। १६०। कुछ शङ्ख और कुन्द पुष्प के सदृश श्वेत होते हैं तथा कुछ जाती और अञ्जन के समान हुआ करते हैं। कुछ मेघों का वर्ण धूम्र के समान होता है तथा कुछ पयोधर पीतवर्ण वाले होते हैं। १६१।
केचिद्रासभवर्णाभा लाक्षारसन्निभास्तथा । मनःशिलाभास्त्वपरे कपोताभास्तथांबुदाः ॥१६२ इन्द्रगोपनिभाः केचिद्धरितालनिभास्तथा । चाषपत्रनिभाः केचिदुत्तिष्ठंति घना दिवि ॥१६३ केचित्पुरवराकाराः केचिद्गजकुलोपमाः । केचित्पर्वतसंकाशाः केचित्स्थलनिभा घनाः ॥१६४ क्रीडागारनिभाः केचित्केचिन्मीनकुलोपमाः । बहुरूपा घोररूपा घोरस्वरनिनादिनः ॥१६५ तदा जलधराः सर्वे पूरयंति नभस्तलम् । ततस्ते जलदा घोरराविणो भास्करात्मकाः ॥१६६ सप्तधा संवृतात्मानस्तमग्निं शमयंत्युत । ततस्ते जलदा वर्षं मुंचंति च महौघवत् ॥१६७ सुघोरमशिवं सर्वं नाशयन्ति च पावकम् । प्रवृष्टैश्च तथात्यर्थं वारिणा पूर्यते जगत् ॥१६८
कुछ मेघों का वर्ण रासभ (गधा) के सदृश होता है तथा कुछ लाख के रस के सदृश हुआ करते हैं। दूसरे कुछ मैनसिल के सदृश एकदम सुर्ख होते हैं तथा कुछ कबूतरों के समान वर्णों वाले होते हैं। १६२। कुछ इन्द्र गोप के सदृश हैं तो कुछ हरिताल के समान रङ्ग वाले हुआ करते हैं। उस समय में अन्तरिक्ष में चाष के पत्रों के ही सदृश मेघ उमड़कर उठा करते हैं। १६३। कुछ घन श्रेष्ठ पुर के आकार वाले हैं तो कुछ द्विज (पक्षी) कुलों के सदृश हुआ करते हैं। कुछ घन तो उस समय में विशाल पर्वतों के समान आकार वाले होते हैं तथा कुछ ऐसे प्रतीत होते हैं मानों स्थल ही होवें । १६४। कुछ
६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
मेष क्रीड़ा गृहों के तुल्य होते हैं तो कुछ मीनों के समुद्यम के सदृश दिखलाई दिया करते हैं। उस समय में मेघों के अनेक स्वरूप दिखाई दिया करते हैं। उनका स्वरूप परमाधिक घोर होता है और वे भयङ्कर गर्जन किया करते हैं।१६५। उस समय जलधर आकर नभस्तल को एक साथ समाच्छादित कर देते हैं। इसके अनन्तर वे मेघ परम भीषण घोष किया करते हैं और भास्कर के ही स्वरूप वाले होते हैं।१६६। सात स्वरूपों में संवृत होने वाले वे मेघ उस परम घोर अग्नि का शमन कर दिया करते हैं। इसके उपरान्त वे मेघ महान् घोर मूसलाधार वर्षा किया करते हैं।१६७। परम घोर अशिव उस अग्नि का विनाश कर दिया करते हैं और अत्यधिक वर्षा के द्वारा जल से सम्पूर्ण जगत् को भर दिया करते हैं।१६८।
अद्भिस्तेजोभिभूतं च तदाग्निः प्रविशत्यपः । नष्टे चाग्नौ वर्षगते पयोदाः पावकोद्भवाः ॥१६६
प्लावयंतो जगत्सर्वं बृहज्जलपरिस्रवैः । धाराभिः पूरयंतीमं चोद्यमानाः स्वयंभुवा ॥१७०
अन्ये तु सलिलौघैस्तु वेलामभिभवन्त्यपि । सार्द्रद्वीपांतरं पीतं जलमन्येषु तिष्ठति ॥१७१
पुनः पतति भूमौ तत्पयोधस्तान्नभस्तले । संवैष्टयति घोरात्मा दिवि वायुः समंततः ॥१७२
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजंगमे । पूर्णे युगसहस्रे वै निःशेषः कल्प उच्यते ॥१७३
अथांभसाऽऽवृते लोके प्राहुरेकार्णवं बुधाः । अथ भूमिर्जलं खं च वायुश्चैकार्णवे तदा ॥१७४
नष्टेऽनलेऽन्धभूते तु प्राज्ञायत न किंचन । पार्थिवास्त्वथ सामुद्रा आपो दैव्याश्च सर्वशः ॥१७५
उस समय में तेज से समुद्भूत वह अग्नि जलों के द्वारा परिभूरित होकर फिर जल में प्रवेश कर जाया करती है। जब वर्षा से वह अग्नि विनष्ट हो जाती है तो यपोद भी पावकोद्भव हो जाया करते हैं।१६६। विशाल जलों उप्लवों से सम्पूर्ण जगत् प्लावित कर देते हैं और स्वयम्भू के
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द्वारा प्रेरित होते हुए अपनी धाराओं से इस जगत् को भर दिया करते हैं ।१७०। कुछ अन्य मेघ अपने जलों के समुदायों से बेला को भी अभिभूत कर दिया करते हैं । सातों द्वीपों के अन्दर जो भी जल था उसका पान कर लिया था और वह जल अन्यत्र स्थित था ।१७१। फिर वही जल आकाश से नीचे भूमि में गिर रहा था । उस काल में आकाश में परम घोर स्वरूप वाला वायु सभी ओर से ढक लिया करता है ।१७२। उस समय में केवल परम घोर एक समुद्र ही दिखाई दिया करता है तथा अन्य स्थावर और जंगम स्वरूप पूर्णतया विनष्ट हो जाता है। पूर्ण जब एक सहस्र युगों की चौकड़ी होती है तभी निःशेष कल्प कहा जाया करता है ।१७३। इसके अनन्तर जब जल के द्वारा यह लोक समावृत होजाता है तो बुध जन इसको एक मात्र सागर ही कहा करते हैं । इसके अनन्तर भूमि—जल—आकाश और वायु—इन सबका एक ही सागर हो जाता है ।१७४। अनल के नष्ट होने पर एकदम अन्धकार हो जाता है और उस समय में अन्य कुछ भी नहीं दिखाई देता है । पार्थिव—अर्थात् पृथ्वी के भाग तथा सामुद्र अर्थात् समुद्र के भाग ये सभी ओर से दैव्य जल ही जल दिखाई दिया करते हैं ।१७५।
असरन्त्यो व्रजंत्यैक्यं सलिलाख्यां भजन्त्युत ।
आगतागतिके चैव तदा तत्सलिलं स्मृतम् ॥१७६
प्रच्छादयति महीमेतामर्णवाख्यं तु तज्जलम् ।
आभाति यस्मात्तद्भाभिर्भा शब्दो व्याप्तिदीप्तिषु ॥१७७
भस्म सर्वमनुप्राप्य तस्मादंभो निरुच्यते ।
नानात्वे चैव शीघ्रे च धातुर्वै अर उच्यते ॥१७८
एकार्णवे तदा ह्यो वै न शीघ्रस्तेन ता नराः ।
तस्मिन्युगसहस्रांते दिवसे ब्रह्मणो गते ॥१७९
तावंतं कालमेवं तु भवत्येकार्णवं जगत् ।
तदा तु सर्वे व्यापारा निवत्र्त्तंते प्रजापतेः ॥१८०
एकमेकार्णवे तस्मिन्नष्टे स्थावरजंगमे ।
तदा स भवति ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥१८१
१०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सहस्रशीर्षा सुमनाः सहस्रपात्सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रवाक् सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिस्त्रयीमयो यः पुरुषो निरुच्यते ॥१८२
इनका सरण सर्वथा नही होता है और सब एक रूपता को प्राप्त हो जाया करती हैं जिसका नाम सलिल ही होता है। वह आगत और आग-तिक जो भी है वह सब सलिल ही कहा गया है। १७६। वह अर्णव नाम वाला जल इस समग्र पृथ्वी को प्रच्छादित कर लिया करता है। क्योंकि उसकी भाओं से वह आभास होता है। यहाँ भी शब्द व्याप्ति और दीप्ति में आया है। १७७। वह सब भस्म को अनुप्राप्त करके ही—हुआ है अतएव अम्भ कहा जाया करता है। नानात्व में और शीघ्र में अरधातु कही जाती है। १७८। उस समय में एकार्णव में कल है और शीघ्र नहीं है इसीलिए वे नरा हैं। उस एक सहस्र चारों की चौकड़ी के अन्त में ब्रह्माजी का एक दिन व्यतीत होने पर उसने काल पर्यन्त यह जगत् एकार्णव के रूप में रहता है। वह समय ऐसा होता है कि उसमें प्रजापति के सभी व्यापार अर्थात् कार्य-शीलता निवृत्त हो जाते हैं। १८०। उस समय में जब सभी स्थावर और जंगम विनष्ट हो जाया करते हैं और एकमात्र अर्णव हो रहता है तो एक ही ब्रह्माजी रहा करते हैं जो अनेक नेत्रों और चरणों वाले हैं। १८१। सहस्रों मस्तकों वाले—सुन्दर मन से सम्पन्न—अनेक चरणों सहस्रों चक्षुओं से युक्त और अनेकों वाणियों वाले एवं सहस्र बाहुओं से संयुत प्रथम प्रजापति त्रयीमय है जो पुरुष—इस नाम से कहा जाया करता है अर्थात वही परम पुरुष हैं। १८२।
आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता अपूर्व एकः प्रथमस्तुराषाट् । हिरण्यगर्भः पुरुषो महान्वै संपठ्यते वै रजसः परस्तात ॥१८३
चतुर्युगसहस्रान्ते सर्वतः सलिलाप्लुते । सुषुप्सुरप्रकाशेप्सुः स रात्रिं कुरुते प्रभुः ॥१८४
चतुर्विधा यदा शेते प्रजाः सर्वा लयं गताः । पश्यंति तं महात्मानं कालं सप्त महर्षयः ॥१८५
१०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एवं स लोके निवृत्त उपशांते प्रजापतौ ।
ब्राह्मे नैमित्तिके तस्मिन्कल्पिते वै प्रसंयमे ॥१६२
देहैर्वियोगः सत्त्वानां तस्मिन्वै कृत्स्नशः स्मृतः ।
ततो दग्धेषु भूतेषु सर्वेष्वादित्यरश्मिभिः ॥१६३
देवर्षिमनुवर्येषु तस्मिन्नंबुप्लवे तदा ।
गंधर्वादीनि सत्त्वानि पिशाचांतानि सर्वशः ॥१६४
कल्पादावप्रतप्तानि जनमेवाश्रयंति वै ।
तिर्यग्योनीनि नरके यानि यानि गतान्यपि ॥१६५
तदा तान्यपि दग्धानि धूतपापानि सर्वशः ।
जले तान्युपपद्यंते यावत्संप्लवते जगत् ॥१६६
इसके अनन्तर सबकी रचना करने वाले महान तेजस्वी ने सब कुछ को अपनी ही आत्मा में रखकर फिर रात्रि में ही उस एकार्णव स्वरूप जल में निवास किया करता है ।१६०। फिर उस रात्रि का क्षय प्राप्त हो जाने पर प्रजापति जागते हैं और सृष्टि के सृजन करने की इच्छा से संयुत करने के लिए मन किया करते हैं ।१६१। इसी रीति से वह लोक निवृत्त होता है जबकि प्रजापति उपशान्त हो जाया करते हैं । वह प्रसंयम ब्राह्म और नैमित्तिक कल्पित होता है ।१६२। उसमें जीवों का अपने देहों से पूर्णतया वियोग कहा गया है । फिर सूर्य देव की परमाधिक संतप्त रश्मियों के द्वारा समस्त प्राणियों के दग्ध हो जाने पर सरंक्षय हो जाता है ।१६३। उस जल प्लावन में उस समय में देव-ऋषि-मनुष्य-गन्धर्व-पिशाच आदि जीव सभी यहाँ से जनलोक में निवास किया करते हैं तथा नरकगामी हैं उन सबका भी विनाश हो जाया करता है ।१६४-१६५। उस समय में वे भी पापों से रहित होकर सब निर्दग्ध हो जाया करते हैं और वे सभी जब तक यह सम्पूर्ण जगत जलमय रहता है जल में ही निमग्न हो जाया करते हैं अर्थात् जल ही के रूप में रहते हैं ।१६६।
व्युष्टायां च रजन्यां तु ब्रह्मणोऽव्यक्तयोनितः ।
जायन्ते हि पुनस्तानि सर्वभूतानि कृत्स्नशः ॥१६७
ऋषयो मनवो देवाः प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ।
आभूत संप्लव वर्णन ] [ १०३
तेषामपि च सिद्धानां निधनोत्पत्तिरुच्यते ॥१६८ यथा सूर्यस्य लोकेऽस्मिन्नुदयास्तमने स्मृते । तथा जन्मनिरोधश्च भूतानामिह दृश्यते ॥१६६ आभूतसंप्लवात्तस्माद्भवः संसार उच्यते । यथा सर्वाणि भूतानां जायन्ते वर्षणेष्विह ॥२०० स्थावरादीनि नियमात्कल्पे कल्पे तथा प्रजाः । यथार्त्तवृतुलिंगानि नानारूपाणि पर्यये ॥२०१ दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्रह्मद्युरात्रिषु । प्रत्याहारे विसर्गे च गतिमंति ध्रुवाणि च ॥२०२ निष्क्रमन्ते विशंते च प्रजाः काले प्रजापतिम् । ब्रह्माणं सर्वभूतानि महायोगं महेश्वरम् ॥२०३
जिस समय में यह महानिशा नष्ट हो जाती है तब अव्यक्त योनि वाले ब्रह्मा से वे सभी भूत पूर्ण रूप से फिर समुत्पन्न हो जाया करते हैं ।१६७। ऋषिगण-मनुगण-देवगण और सब चारों प्रकार की प्रजा और उन्हीं सिद्धों की निधनोत्पत्ति कही जाया करती हैं ।१६८। जिस प्रकार से इस लोक में सूर्यदेव के उदय और अस्तमन कहे गये हैं उसी तरह से इन समस्त प्राणियों का जन्म और निरोध भी हुआ करता है जो कि सबको दिखाई दिया करता है । आत्मा तो नित्य है, उसका शरीर से वियोग ही निधन और संयोग जन्म कहा जाया करता है ।१६६। उस समस्त प्राणियों की जल निमग्नता से उत्पन्न हो जाना ही संसार कहा जाया करता है । जैसे वर्षा होने पर यहाँ पर सब भूतों के साहित्य समुत्पन्न हुआ करते हैं ।२००। स्थावर आदि सब प्रत्येक कल्प में तथा समस्त प्रजा जैसे ऋतु काल में सभी ऋतु के चिह्न नाना रूप वाले हो जाया करते हैं और बदल जाते हैं वैसे ही सब समुत्पन्न होते हैं ।२०१। जिस तरह से ब्रह्मा के दिन और रात्रि में हैं वही सबके सब दिखलाई दिया करते हैं । जब प्रत्याहरण होता है और विसर्ग होता है । उस समय में सभी निश्चित रूप से गतिमान् हुआ करते हैं ।२०२। समय के समुपस्थित हो जाने पर अपने ही आप ये सब प्रजाजन प्रजापति में प्रवेश और निष्क्रमण किया करते हैं । समस्त भूत ब्रह्माजी में
१०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तथा महेश्वर में महायोग किया करते हैं अर्थात् सृजन काल में ब्रह्माजी में तथा संहरण काल में महेश्वर में इन सबका महान योग होता है ॥२०३।
स सृष्टा सर्वभूतानां कल्पादिषु पुनः पुनः । व्यक्तोऽव्यक्तो महादेवस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥२०४ येनैव सृष्टाः प्रथमं प्रयाता आपो हि मार्गेण महीतलेऽस्मिन् । पूर्वं प्रयातेन यथात्वथापस्तेनैव तेनैव तु स्वर्व्रजंति ॥२०५ यथा शुभेन त्वशुभेन चैव तत्रैव विवर्त्तमानाः । मर्त्यास्तु देहांतराभावितत्वाद्रवेर्वशादूर्ध्वमधश्चरंति ॥२०६ ये चापि देवा मनवः प्रजेशा अन्येऽपि ये स्वर्गगताश्च सिद्धाः । तद्भाविताः ख्यातिवशाच्च धर्म्याः पुनर्विसर्गेण भवन्ति सत्त्वाः ॥२०७ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि कालमाभूतसंप्लवम् । मन्वन्तराणि यानि स्युर्व्याख्यातानि मया द्विजाः ॥२०८ सह प्रजानिसर्गेण सह देवैश्चतुर्दश । सा युगाख्या सहस्रं तु सर्वाण्येवांतराणि वै ॥२०९ अस्याः सहस्रे द्वे पूर्णे विशेषः कल्प उच्यते । एतद्ब्राह्ममहर्ज्ञेयं तस्य संख्यां निबोधतः ॥२१०
कल्पों के आदि काल में बार-बार समस्त प्राणियों का वही सृजन करने वाला हुआ करता है। महादेव का स्वरूप व्यक्त और अव्यक्त है और उसी का यह सम्पूर्ण जगत हुआ करता है ।२०४। जिसके ही द्वारा ये सर्व प्रथम सृष्ट हुए हैं वे जल समग्र इसी महीतल में मार्ग के द्वारा चले गये हैं। जैसे पूर्व में यह गमन कर गये हैं उसी मार्ग से फिर भी स्वर्ग में चले जाते हैं ।२०५। जो भी उनका कर्म शुभ अथवा अशुभ होता है उसी के अनुसार वे वहाँ-वहाँ अन्य देहों में स्थित रहते हुए सूर्य के वंश में रहकर ऊर्ध्व में अर्थात् देवलोक में और अधोभाग में अर्थात् नरकों में सञ्चरण किया करते हैं ।२०६। और जो भी देवगण और मनुगण हैं--प्रजेश और अन्य भी जो स्वर्ग में गये हुए सिद्ध हैं वे सब उसी से होने वाले तथा ख्याति के वश होने से धर्म से युक्त होते हुए प्राणी फिर विसर्ग के द्वारा हुआ
आभूत संप्लव वर्णन ] [ १०५
करते हैं ।२०७। इसके आगे आभूत संप्लव अर्थात् समस्त प्राणियों को जल-मग्न हो जाना मैं उस काल के विषय में वर्णन करूँगा । हे द्विजो ! जो-जो भी मन्वन्तर होते हैं । उन सबको मैंने बतला ही दिया है ।२०८। प्रजाओं के निसर्ग और देवों के साथ चतुर्दश होते हैं । वह सहस्र युगाख्या है उसी में सभी अन्तर होते हैं ।२०६। इस युगाख्या के जब पूर्ण हो सहस्र होते हैं तब विशेष कल्प कहा जाया करता है । यही ब्रह्माजी का दिन समझना चाहिए । उसकी संख्या को भी समझ लो ।२१०।
निमेषतुल्यमात्रा हि कृता लब्धक्षणेन तु । मानुषाक्षिनिमेषास्तु काष्ठा पंचदश स्मृताः ॥२११ नव क्षणस्तु पंचैव विंशत्काष्ठा तु ते त्रयः । प्रस्था सप्तोदकाश्चैव साधिकास्तु लवः स्मृतः ॥२१२ लवास्त्रिंशत्कला ज्ञेया मुहूर्त्तस्त्रिंशतः कलाः । मुहूर्त्तस्तु पुनस्त्रिंशदहोरात्रमिति स्थितिः ॥२१३ अहोरात्रं कलानां तु अधिकानि शतानि षट् । ताश्चैव संख्यया ज्ञेयाश्चंद्रादित्यगतिर्यथा ॥२१४ निमेषा दश पंचैवं काष्ठास्तास्त्रिंशतः कला । त्रिंशत्कला मुहूर्त्तं तु दशभागं कला स्मृतम् ॥२१५ चत्वारिंशत्कलाः पंच मुहूर्त्त इति संज्ञितः । मुहूर्त्ताश्च लवाश्चापि प्रमाणज्ञैः प्रकल्पिताः ॥२१६ तथानेनांभसञ्चापि पलान्यथ त्रयोदश । मागधेनैव मानेन जलप्रस्थो विधीयते ॥२१७
क्षण के लाभ से निमेष की मात्रा होती है । मनुष्य की आँखों की पलकें जो चलती हैं उसी काल को निमेष कहा जाता है । ऐसे पन्द्रह निमेषों की एक काष्ठा होती है । नौ और पांच क्षण ही बीस काष्ठा है । वे तीन तथा साधिक सात प्रस्थोदक लव कहा गया है ।२११-२१२। तीस लव की एक कला होती है और तीस कला का—एक मुहूत्तं होता है । यही स्थिति हुआ करती है ।२१३। कलाओं का अहोरात्र साधिक शत और छै है । वे ही संख्या से जैसी चन्द्र और सूर्य की गति होती है जान लेनी
१०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चाहिए। २१४। पन्द्रह निमेष काष्ठा है और तीस काष्ठाओं की कला होती है। तीस कला का मुहूर्त्त होता है। दशभाग ही कला कहा गया है। २१५। चालीस कलाओं के पाँच मुहूर्त्त संज्ञा होती है। ये मुहूर्त्त और लव प्रमाणों के ज्ञाताओं के द्वारा कल्पित किये हैं। उसी भाँति से इसके द्वारा जल के भी तरह पल होते हैं। मागध मान से भी जल प्रस्थ किया जाता है। २१६-२१७।
एते वाराप्लुतप्रस्थाश्चत्वारो नालिकोच्चयः । हेममाषैः कृतच्छिद्रश्चतुर्भिश्चतुरंगुलैः ॥२१८ समाहनि च रात्रौ च मुहूर्त्ता वै द्विनालिकाः । रवेर्गतिविशेषेण सर्वेष्वेतेषु नित्यशः ॥२१९ अधिकं षट्शतं यच्च कलानां प्रविधीयते । तदहर्मानुषं ज्ञेयं नाक्षत्रं तु दशाधिकम् ॥२२० सावनेन तु मानेन अब्दोऽयं मानुषः स्मृत । एतद्दिव्यमहोरात्रमिति शास्त्रविनिश्चयः ॥२२१ अह्नानेन तु या संख्या मासर्त्वयनवार्षिकी । तदा बद्धमिदं ज्ञानं संज्ञया ह्युपलक्षितम् ॥२२२ कलानां तु परीमाणं कला इत्यभिधीयते । यदहो ब्रह्मणः प्रोक्तः दिव्या कोटी तु सा स्मृतः ॥२२३ शतानां च सहस्राणि दशद्विगुणितानि च । नवति च सहस्राणि तथैवान्यानि यानि तु ॥२२४
ये धारा प्लुत प्रस्थ नालिकोच्चय चार हैं। चार अंगुल चार हेम- माषों से कृतच्छिद्र है। २१८। सम दिन में ओर रात्रि में द्विनालि का मुहूर्त्त होते हैं। नित्य ही इन सबों में रवि की गति विशेष से होते हैं। २१९। और अधिक छे सौ कलाओं का प्रविधान किया जाता है। वह मनुष्यों का दिन समझना चाहिए और जो नक्षत्र है वह दशाधिक होता है। २२०। इस दिन से जो संख्या होती है वह मास-ऋतु-अयन और वर्ष की होती है। उस समय में यह बद्धज्ञान संज्ञा के द्वारा उपलक्षित होता है। २२२। कलाओं का जो परिमाण है वह कला—इस नाम से कहा जाया करता है। जो ब्रह्माजी
आभूत संप्लव वर्णन ] [ १०७
का दिन कहा गया है वह दिव्य कोटी कही गयी है ।२२३। शतों के सहस्र दश ही से गुणित होते हैं नब्बे सहस्र और उसी भाँति जो अन्य हैं ।२२४।
एतच्छ्रुत्वा तु ऋषयो विस्मयं परमाद्भुतम् ।
संख्यासंभजनं ज्ञानमपृच्छन्सुतरां तदा ॥२२५
ऋषयु ऊचु-
संप्रकालनमानं तु मानुषेणैव सम्मतम् ।
मानेन श्रोतुमिच्छामः संक्षेपार्थपदाक्षरम् ॥२२६
तेषां श्रुत्वा स देवस्तु वायुर्लोकहिते रतः ।
संक्षेपाद्दिव्यचक्षुष्ट्वात्प्रोवाच वचनं प्रभुः ॥२२७
एते रात्र्यहनी पूर्वं कीर्तिते त्विह लौकिके ।
तासां संख्याथ वर्षाग्रं ब्राह्मं वक्ष्याम्यहः क्षये ॥२२८
कोटीशतानि चत्वारि वर्षाणि मानुषाणि तु ।
द्वात्रिंशच्च तथा कोट्यः संख्याताः संख्यया द्विजैः ॥२२९
तथा शतसहस्राणि एकोननवतिः पुनः ।
अशीतिश्च सहस्राणि एष कालः प्लवस्य तु ॥२३०
मानुषाख्येन संख्यातः कालो ह्याभूतसंप्लवः ।
सप्तसूर्यप्रदग्धेषु तदा लोकेषु तेषु वै ।
महाभूतेषु लीयंते प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ॥२३१
समस्त ऋषियों ने जब यह सुना तो उनको बहुत ही अधिक आश्चर्य हुआ था । उस समय में पुनः इस संख्या के संभजन के ज्ञान को पूछा था ।२२५। ऋषियों ने कहा—यह संप्रकालन का ज्ञान मनुष्यों के द्वारा ही सम्मत होता है । अब हम लोग मान के द्वारा संक्षेपार्थ पदाक्षर को श्रवण करने की इच्छा करते हैं ।२२६। उनके इस वचन को सुनकर लोगों के हित में रति रखने वाले वायु देव ने जो प्रभु दिव्य चक्षु वाले थे यह वचन बोले ।२२७। वे रात और दिन जो कि लौकिक होते हैं और यहां पर माने जाते हैं और यहाँ पर माने जाते हैं वे तो अपने पूर्व में ही वर्णन कर दिए हैं । उनकी सख्या और इसके पश्चात् वर्षाग्र ब्राह्म क्षय में बताऊँगा ।२२८।
१०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चार सौ करोड़ मानवों के वर्ष तथा बत्तीस करोड़ द्विजों के द्वारा संख्या से संख्यात हैं ।२२६। उसी भाँति एक सौ सहस्र और फिर उन्यासी अस्सी सहस्र यह उस महान् प्लव का काल होता है ।२३०। यह आभूत संप्लव का काल मानुष नामक संख्या से गिनकर बताया गया है । जिसमें समस्त प्राणियों का संक्षय होकर सर्वत्र जल ही जल हो जाता है उसी को आभूत संप्लव कहा जाया करता है । सात सूर्यों के द्वारा उस समय में उन लोकों के प्रदग्ध होने पर चारों प्रकार की सम्पूर्ण प्रजा महाभूतों में लीन हो जाया करती है । जरायुज—स्वेदज—अण्डज और उद्भिज—ये प्रजा के चार प्रकार होते हैं ।२३१।
सलिलेनाप्लुते लोके नष्टे स्थावरजंगमे ॥२३२
विनिवृत्ते च संहारे उपशान्ते प्रजापतौ ।
निरालोके प्रदग्धे तु नैशेन तमसा वृते ॥२३३
ईश्वराधिष्ठिते त्वस्मिंस्तदा ह्येकार्णवे किल ।
तावदेकार्णवे ज्ञेयं यावदासीदहः प्रभोः ॥२३४
रात्रिस्तु सलिलावस्था निवृतौ वाप्यहः स्मृतम् ।
अहोरात्रस्तथैवास्य क्रमेण परिवर्तते ॥२३५
आभूतसंप्लवो ह्येष अहोरात्रः स्मृतः प्रभोः ।
त्रैलोक्ये यानि सत्वानि गतिमंति ध्रुवाणि च ॥२३६
आभूतेभ्यः प्रलीयन्ते तस्मादाभूतसंप्लवः ।
अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताः प्रजाः ॥२३७
दिव्यसंख्या प्रसंख्याता अपरार्धगुणीकृताः ।
परार्द्धं द्विगुणं चापि परमायुः प्रकीर्तितम् ॥२३८
उस समय में सम्पूर्ण लोक जल से समाप्लुत होकर नष्ट हो जाया करता है और सभी स्थावर तथा जङ्गम विनष्ट हो जाया करते हैं ।२३२। समग्र संहार के समीप हो जाने पर और प्रजापति के उपशान्त होने पर तथा सर्वत्र प्रकाश से रहित एवं दग्ध तथा रात्रि के अन्धकार से आवृत होने पर ।२३३। उस समय में यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर के द्वारा ही अधिष्ठित था और सर्वत्र एक ही अर्णव था । यह तब तक एकार्णव का स्वरूप था जब
उसी को दिन कहा गया है । इसी रीति से इनका अहोरात्र क्रम से परिव- र्तित हुआ करता है ।२३५। यह आभूत संप्लव प्रभु का अहोरात्र कहा गया है । इन तीनों लोकों में जो भी प्राणी हैं वे सभी गतिमान् और ध्रुव हैं ।२३६। जितने भी भूत हैं वे सभी प्रलीन होते हैं इसी कारण से इसका नाम आभूत संप्लव होता है । जो व्यतीत हो चुके हैं—जो भी वर्त्तमान हैं और जो प्रजा अनागत हैं और परार्ध से गुणी वृत हैं । परार्ध द्विगुण है और यही परम आयु कीर्तित की गयी है ।२३७-२३८।
एतावान्स्थितिकालस्तु ह्यजस्येह प्रजापतेः । स्थित्यंतं प्रतिसर्गंश्च ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥२३६
यथा वायुप्रगेन दीपार्चिरुपशाम्यति । तथैव प्रतिसर्गेण ब्रह्मा समुपशाम्यति ॥२४०
तथा स्वप्रतिसंसृष्टे महादादौ महेश्वरे । महत्प्रलीयते व्यक्तो गुणसाम्यं ततो भवेत् ॥२४१
इत्येष वः समाख्यातो मया ह्याभूतसंप्लवः । ब्रह्मनैमित्तिको हष संप्रक्षालनसंयमः । समासेन समाख्यातो भूयः किं वर्णयामि वः ॥२४२
य इदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः । कीर्त्तयेद्वर्णयेष्टापि महतीं सिद्धिमाप्नुयात् ॥२४३
उस अजन्मा प्रजापति का इतना ही स्थिति का काल होता है । उस परमेष्ठी ब्रह्माजी का स्थिति का अन्त और प्रति सर्ग होता है ।२३६। जिस प्रकार से वायु के प्रवेग से दीप की शिखा उपशान्त हो जाया करते हैं ।२४० उसी भाँति महदादि महेश्वर के अपने प्रति संसृष्ट होने पर महिमा है । जो भी कोई इसको नित्य धारण किया करता है अथवा इसका बारम्बार श्रवण किया करता है अथवा इसका कीर्त्तन किया करता है या वर्णन करता है वह मानव बड़ी भारी सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ।२४३।
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११० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
॥ प्रतिसर्ग वर्णन ॥
सूत उवाच- प्रत्याहारं प्रवक्ष्यामि परस्यान्ते स्वयंभुवः । ब्रह्मणः स्थितिकाले तु क्षीणे तस्मिंस्तदा प्रभोः ॥१ यथेदं कुरुते व्यक्तं सुसूक्ष्मं विश्वमीश्वरः । अव्यक्तं ग्रसते व्यक्तं प्रत्याहारे च कृत्स्नशः ॥२ पुरांतद्व्यणुकाद्यानां संपूर्णे कल्पसंक्षये । उपस्थिते महाघोरे ह्यप्रत्यक्षे तु कस्याचित् ॥३ अन्ते द्रुमस्य संप्राप्ते पश्चिमस्य मनोस्तदा । अंते कलियुगे तस्मिन्क्षीणे संहार उच्यते ॥४ सम्प्राप्ते तदा वृत्ते प्रत्याहारे ह्युपस्थिते । प्रत्याहारे तदा तस्मिन्भूततन्मात्रसंक्षये ॥५ महदादिविकारस्य विशेषांतस्य संक्षये । स्वभावकारिते तस्मिन्प्रवृत्ते संचरे ॥६ आपो ग्रसन्ति वै पूर्वं भूमेर्गन्धात्मकं गुणम् । आत्तगंधा ततो भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते ॥७
श्री सूतजी ने कहा—पर के अन्त में स्वयंभू का प्रत्याहार मैं कहूँगा। प्रभु ब्रह्मा के स्थिति के काल में और उस समय में उसके क्षीण हो जाने पर ।१। जैसे ईश्वर इस सुसूक्ष्म व्यक्त विश्व की रचना करता है। प्रत्याहार के समय में इस अव्यक्त को व्यक्त ग्रस लिया करता है और पूर्णतया यह ग्रस्त हो जाता है ।२। पुरान्त द्वयणुक आदि का सम्पूर्ण कल्प संक्षय होने पर ।३। अन्त में उस समय में पश्चिम द्रुम मनु के सम्प्राप्त होने पर अन्त में उस कलियुग के क्षीण हो जाने पर संहार कहा जाता है ।४। उस समय में वृत्त के संक्षाल होने पर और प्रत्याहार के उपस्थित होने पर उस काल में प्रत्याहार में भूतों और तन्मात्राओं का संक्षय हो जाता है ।५। महत् तत्त्व आदि जो प्रकृति के विकार हैं विशेषान्त पर्यन्त सबका संक्षय हो जाता है। यह सभी कुछ स्वभाव से ही किया जाता है तब वह प्रति सञ्चर
[ प्रतिसर्ग वर्णन ] । १११
प्रवृत होता है ।६। सर्व प्रथम जल भूमि का जो विशेष गुण गन्ध है उसको ग्रस लिया करते हैं । इसके अनन्तर गन्ध हीन भूमि प्रलय को ही प्राप्त हो जाया करती है ।७।
प्रणष्टे गंधतन्मात्रे तोयावस्था धरा भवेत् ।
आपस्तदा प्रविष्टास्तु वेगवत्यो महास्वनाः ॥८
सर्वमापूरयित्वेदं तिष्ठंति विचरंति च ।
अपामपि गुणो यस्तु ज्योतिः ष्वालीयते रसः ॥६
नश्यंत्यापस्तदा तत्र रसतन्मात्रसंक्षयात् ।
तीव्रतेजोहतरसा ज्योतिष्ट्वं प्राप्नुवंत्युत ॥१०
ग्रस्ते च सलिले तेजः सर्वतोमुखमीक्षते ।
अथाग्निः सर्वतो व्याप्त आदत्ते तज्जलं तदा ॥११
सर्वमापूर्यतेऽर्चिभिस्तदा जगदिदं शनैः ।
अर्चिभिः संततो तस्मिस्तिर्यगूर्ध्वमधस्ततः ॥१२
ज्योतिषोऽपि गुणं रूपं वायुरत्ति प्रकाशकम् ।
प्रलीयते तदा तस्मिन्दीपार्चिरिव मारुते ॥१३
प्रणष्टे रूपतन्मात्रे हतरूपो विभावसुः ।
उपशाम्यति तेजो हि वायुराधूयते महान् ॥१४
गन्ध की तन्मात्रा जब प्रणष्ट हो जाती है तो यह समस्त पृथ्वी जल की ही अवस्था वाली हो जाया करती है और भूमि का अस्तित्व ही सर्वथा लुप्त हो जाता है । उस समय में यह जल बड़े भीषण घोष और वेग से समन्वित होकर प्रविष्ट हो जाया करते हैं ।८। ये जल सबको आपूरित करके ही स्थित हो जाया करते हैं तथा विचरण किया करते हैं । फिर जल का जो विशेष गुण रस है वह तेज में लीन हो जाता है ।६। जब रस की तन्मात्रा का विनाश हो जाता करता है । तेज की तीव्रता से जल के रस के अपहृत हो जाने पर वह जल तेज के ही स्वरूप को प्राप्त हो जाया करता है ।१०। तेज के द्वारा जल के ग्रस्त हो जाने पर वही तेज सभी ओर दिखाई दिया करता है । इसके पश्चात् सभी ओर व्याप्त हुआ अग्नि उस समय में
११२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उस जल को अपने ही स्वरूप ले लेता है ।११। धीरे-धीरे यह सब जगत् अग्नि (तेज) की ज्वालाओं से सम्पूरित हो जाता है । वे सब अर्चियाँ ऊपर-नीचे और तिरछी और सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं ।१२। इस तेज का विशेष गुण रूप होता है जो कि इसका प्रकाश करने वाला है । इस रूप को वायु भक्षण कर जाता है । उस समय में वह तेज की ज्वालाओं वायु में दीप की शिखा के ही समान प्रलीन हो जाया करती है । जब रूप की तन्मात्रा विनष्ट हो जाती है तो वह अग्नि रूप से रहित हो जाता है । तेज तो फिर उपशान्त हो जाता है और केवल वायु ही महान् स्वरूप को धारण करके धूम धाम से सर्वत्र वहन किया करता है ।१३-१४।
निरालोके तदा लोके वायुभूते च तेजसि । ततस्तु मूलमासाद्य वायुः संबंधमात्मनः ।।१५ ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश । वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते च तत् ।।१६ प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु निष्ट्यनावृतम् । अरूपमरसस्पर्शमगन्धं न च मूर्तिमत् ।।१७ सर्वमापूरयञ्छब्दैः सुमहत्तत्प्रकाशते । तस्मिँल्लीने तदा शिष्टमाकाशं शब्दलक्षणम् ।।१८ शब्दमात्रं तदाऽकाशं सर्वमावृत्य तिष्ठति । तत्र शब्दं गुणं तस्य भूतादिर्ग्रसते पुनः ।।१६ भूतेंद्रियेषु युगपद्भूतादौ संस्थितेषु वै । अभिमानात्मको ह्येष भूतादिस्तामसः स्मृतः ।।२० भूतादिग्रंसते चापि महान्वै बुद्धिलक्षणः । महानात्मा तु विज्ञेयः संकल्पो व्यवसायकः ।।२१
तेज को जब वायु ने ग्रस लिया था तो प्रकाशक रूप के अभाव होने से लोक में आलोक सर्वथा नहीं रहा था क्योंकि तेज तो वायु के ही रूप में लीन हो गया था । इसके पश्चात् वायु अपने सम्बन्ध भूत को प्राप्त करके ।१५। वह वायु ऊपर नीचे और इधर-उधर सर्वत्र दश दिशाओं में प्रकम्पित किया करता है । इस वायु का विशेष गुण स्पर्श होता है उस स्पर्श को
प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११३
आकाश ग्रस लिया करता है ।१६। उस समय में वायु भी अस्तित्व खोकर प्रशान्त हो जाता है और केवल आकाश ही अनावृत होकर स्थित रहा करता है । न तो इसके रूप है और न रस-स्पर्श-गन्ध तथा मूर्त्ति हैं । ऐसा आकाश रहा करता है ।१७। आकाश का विशेष गुण शब्द है । वह इसी से सबको पूरित करके बहुत विशाल दिखाई देता है । तात्पर्य यही है कि इसी का अस्तित्व होता है । वायु में भी लीन होने पर केवल अवशिष्ट आकाश ही होता है जिसका लक्षण ही शब्द होता है ।१८। उस समय में केवल शब्द ही जिसमें शेष रह गया था ऐसा आकाश सबको ढककर स्थित था । वहाँ पर जो उसका गुण शब्द था उसको भूतादि ग्रस लेते हैं ।१९। भूतेन्द्रियों में एक साथ भूतादि के संस्थित होने पर यह अभिमान के ही स्वरूप वाला भूतादि तमस कहा गया है ।२०। बुद्धि के लक्षण वाला यह महान् भूतादि का ग्रसन कर लेता है, महान् के स्वरूप वाला यह व्यवसाय करने वाला सङ्कल्प ही समझ लेना चाहिए ।२१।
बुद्धिर्मनश्च लिंगं च महानक्षर एव च । पर्यायवाचकैः शब्दैस्तमाहुस्तत्त्वचिंतकाः ॥२२ संप्रलीनेषु भूतेषु गुणसाम्ये ततो महान् । लीयते गुणसाम्यं तु स्वात्मन्येवावतिष्ठते ॥२३ लीयन्ते सर्वभूतानां कारणानि प्रसंगमे । इत्येष संयमश्चैव तत्त्वानां कारणैः सह ॥२४ तत्त्वप्रसंयमो ह्येष स्मृतो ह्यावर्तको द्विजाः । धर्माधर्मौ तपो ज्ञानं शुभं सत्यानृते तथा ॥२५ ऊर्ध्वभावो ह्यधोभावः सुखदुःखे प्रियाप्रिये । सर्वमेतत्प्रपंचस्थं गुणमात्रात्मकं स्मृतम् ॥२६ निरिन्द्रियाणां च तदा ज्ञानिनां तच्छुभाशुभम् । प्रकृत्यां चैव तत्सर्वं पुण्यं पापं प्रतिष्ठति ॥२७ यात्यवस्था तु स चैव देहिनां तु निरुच्यते । जंतूना पापपुण्यं तु प्रकृतौ यत्प्रतिष्ठितम् ॥२८