संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआभूत संप्लव वर्णन ] [ १०७
का दिन कहा गया है वह दिव्य कोटी कही गयी है ।२२३। शतों के सहस्र दश ही से गुणित होते हैं नब्बे सहस्र और उसी भाँति जो अन्य हैं ।२२४।
एतच्छ्रुत्वा तु ऋषयो विस्मयं परमाद्भुतम् ।
संख्यासंभजनं ज्ञानमपृच्छन्सुतरां तदा ॥२२५
ऋषयु ऊचु-
संप्रकालनमानं तु मानुषेणैव सम्मतम् ।
मानेन श्रोतुमिच्छामः संक्षेपार्थपदाक्षरम् ॥२२६
तेषां श्रुत्वा स देवस्तु वायुर्लोकहिते रतः ।
संक्षेपाद्दिव्यचक्षुष्ट्वात्प्रोवाच वचनं प्रभुः ॥२२७
एते रात्र्यहनी पूर्वं कीर्तिते त्विह लौकिके ।
तासां संख्याथ वर्षाग्रं ब्राह्मं वक्ष्याम्यहः क्षये ॥२२८
कोटीशतानि चत्वारि वर्षाणि मानुषाणि तु ।
द्वात्रिंशच्च तथा कोट्यः संख्याताः संख्यया द्विजैः ॥२२९
तथा शतसहस्राणि एकोननवतिः पुनः ।
अशीतिश्च सहस्राणि एष कालः प्लवस्य तु ॥२३०
मानुषाख्येन संख्यातः कालो ह्याभूतसंप्लवः ।
सप्तसूर्यप्रदग्धेषु तदा लोकेषु तेषु वै ।
महाभूतेषु लीयंते प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ॥२३१
समस्त ऋषियों ने जब यह सुना तो उनको बहुत ही अधिक आश्चर्य हुआ था । उस समय में पुनः इस संख्या के संभजन के ज्ञान को पूछा था ।२२५। ऋषियों ने कहा—यह संप्रकालन का ज्ञान मनुष्यों के द्वारा ही सम्मत होता है । अब हम लोग मान के द्वारा संक्षेपार्थ पदाक्षर को श्रवण करने की इच्छा करते हैं ।२२६। उनके इस वचन को सुनकर लोगों के हित में रति रखने वाले वायु देव ने जो प्रभु दिव्य चक्षु वाले थे यह वचन बोले ।२२७। वे रात और दिन जो कि लौकिक होते हैं और यहां पर माने जाते हैं और यहाँ पर माने जाते हैं वे तो अपने पूर्व में ही वर्णन कर दिए हैं । उनकी सख्या और इसके पश्चात् वर्षाग्र ब्राह्म क्षय में बताऊँगा ।२२८।