भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

चाहिए। २१४। पन्द्रह निमेष काष्ठा है और तीस काष्ठाओं की कला होती है। तीस कला का मुहूर्त्त होता है। दशभाग ही कला कहा गया है। २१५। चालीस कलाओं के पाँच मुहूर्त्त संज्ञा होती है। ये मुहूर्त्त और लव प्रमाणों के ज्ञाताओं के द्वारा कल्पित किये हैं। उसी भाँति से इसके द्वारा जल के भी तरह पल होते हैं। मागध मान से भी जल प्रस्थ किया जाता है। २१६-२१७।

एते वाराप्लुतप्रस्थाश्चत्वारो नालिकोच्चयः । हेममाषैः कृतच्छिद्रश्चतुर्भिश्चतुरंगुलैः ॥२१८ समाहनि च रात्रौ च मुहूर्त्ता वै द्विनालिकाः । रवेर्गतिविशेषेण सर्वेष्वेतेषु नित्यशः ॥२१९ अधिकं षट्शतं यच्च कलानां प्रविधीयते । तदहर्मानुषं ज्ञेयं नाक्षत्रं तु दशाधिकम् ॥२२० सावनेन तु मानेन अब्दोऽयं मानुषः स्मृत । एतद्दिव्यमहोरात्रमिति शास्त्रविनिश्चयः ॥२२१ अह्नानेन तु या संख्या मासर्त्वयनवार्षिकी । तदा बद्धमिदं ज्ञानं संज्ञया ह्युपलक्षितम् ॥२२२ कलानां तु परीमाणं कला इत्यभिधीयते । यदहो ब्रह्मणः प्रोक्तः दिव्या कोटी तु सा स्मृतः ॥२२३ शतानां च सहस्राणि दशद्विगुणितानि च । नवति च सहस्राणि तथैवान्यानि यानि तु ॥२२४

ये धारा प्लुत प्रस्थ नालिकोच्चय चार हैं। चार अंगुल चार हेम- माषों से कृतच्छिद्र है। २१८। सम दिन में ओर रात्रि में द्विनालि का मुहूर्त्त होते हैं। नित्य ही इन सबों में रवि की गति विशेष से होते हैं। २१९। और अधिक छे सौ कलाओं का प्रविधान किया जाता है। वह मनुष्यों का दिन समझना चाहिए और जो नक्षत्र है वह दशाधिक होता है। २२०। इस दिन से जो संख्या होती है वह मास-ऋतु-अयन और वर्ष की होती है। उस समय में यह बद्धज्ञान संज्ञा के द्वारा उपलक्षित होता है। २२२। कलाओं का जो परिमाण है वह कला—इस नाम से कहा जाया करता है। जो ब्रह्माजी