संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआभूत संप्लव वर्णन ] [ १०५
करते हैं ।२०७। इसके आगे आभूत संप्लव अर्थात् समस्त प्राणियों को जल-मग्न हो जाना मैं उस काल के विषय में वर्णन करूँगा । हे द्विजो ! जो-जो भी मन्वन्तर होते हैं । उन सबको मैंने बतला ही दिया है ।२०८। प्रजाओं के निसर्ग और देवों के साथ चतुर्दश होते हैं । वह सहस्र युगाख्या है उसी में सभी अन्तर होते हैं ।२०६। इस युगाख्या के जब पूर्ण हो सहस्र होते हैं तब विशेष कल्प कहा जाया करता है । यही ब्रह्माजी का दिन समझना चाहिए । उसकी संख्या को भी समझ लो ।२१०।
निमेषतुल्यमात्रा हि कृता लब्धक्षणेन तु । मानुषाक्षिनिमेषास्तु काष्ठा पंचदश स्मृताः ॥२११ नव क्षणस्तु पंचैव विंशत्काष्ठा तु ते त्रयः । प्रस्था सप्तोदकाश्चैव साधिकास्तु लवः स्मृतः ॥२१२ लवास्त्रिंशत्कला ज्ञेया मुहूर्त्तस्त्रिंशतः कलाः । मुहूर्त्तस्तु पुनस्त्रिंशदहोरात्रमिति स्थितिः ॥२१३ अहोरात्रं कलानां तु अधिकानि शतानि षट् । ताश्चैव संख्यया ज्ञेयाश्चंद्रादित्यगतिर्यथा ॥२१४ निमेषा दश पंचैवं काष्ठास्तास्त्रिंशतः कला । त्रिंशत्कला मुहूर्त्तं तु दशभागं कला स्मृतम् ॥२१५ चत्वारिंशत्कलाः पंच मुहूर्त्त इति संज्ञितः । मुहूर्त्ताश्च लवाश्चापि प्रमाणज्ञैः प्रकल्पिताः ॥२१६ तथानेनांभसञ्चापि पलान्यथ त्रयोदश । मागधेनैव मानेन जलप्रस्थो विधीयते ॥२१७
क्षण के लाभ से निमेष की मात्रा होती है । मनुष्य की आँखों की पलकें जो चलती हैं उसी काल को निमेष कहा जाता है । ऐसे पन्द्रह निमेषों की एक काष्ठा होती है । नौ और पांच क्षण ही बीस काष्ठा है । वे तीन तथा साधिक सात प्रस्थोदक लव कहा गया है ।२११-२१२। तीस लव की एक कला होती है और तीस कला का—एक मुहूत्तं होता है । यही स्थिति हुआ करती है ।२१३। कलाओं का अहोरात्र साधिक शत और छै है । वे ही संख्या से जैसी चन्द्र और सूर्य की गति होती है जान लेनी