संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तथा महेश्वर में महायोग किया करते हैं अर्थात् सृजन काल में ब्रह्माजी में तथा संहरण काल में महेश्वर में इन सबका महान योग होता है ॥२०३।
स सृष्टा सर्वभूतानां कल्पादिषु पुनः पुनः । व्यक्तोऽव्यक्तो महादेवस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥२०४ येनैव सृष्टाः प्रथमं प्रयाता आपो हि मार्गेण महीतलेऽस्मिन् । पूर्वं प्रयातेन यथात्वथापस्तेनैव तेनैव तु स्वर्व्रजंति ॥२०५ यथा शुभेन त्वशुभेन चैव तत्रैव विवर्त्तमानाः । मर्त्यास्तु देहांतराभावितत्वाद्रवेर्वशादूर्ध्वमधश्चरंति ॥२०६ ये चापि देवा मनवः प्रजेशा अन्येऽपि ये स्वर्गगताश्च सिद्धाः । तद्भाविताः ख्यातिवशाच्च धर्म्याः पुनर्विसर्गेण भवन्ति सत्त्वाः ॥२०७ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि कालमाभूतसंप्लवम् । मन्वन्तराणि यानि स्युर्व्याख्यातानि मया द्विजाः ॥२०८ सह प्रजानिसर्गेण सह देवैश्चतुर्दश । सा युगाख्या सहस्रं तु सर्वाण्येवांतराणि वै ॥२०९ अस्याः सहस्रे द्वे पूर्णे विशेषः कल्प उच्यते । एतद्ब्राह्ममहर्ज्ञेयं तस्य संख्यां निबोधतः ॥२१०
कल्पों के आदि काल में बार-बार समस्त प्राणियों का वही सृजन करने वाला हुआ करता है। महादेव का स्वरूप व्यक्त और अव्यक्त है और उसी का यह सम्पूर्ण जगत हुआ करता है ।२०४। जिसके ही द्वारा ये सर्व प्रथम सृष्ट हुए हैं वे जल समग्र इसी महीतल में मार्ग के द्वारा चले गये हैं। जैसे पूर्व में यह गमन कर गये हैं उसी मार्ग से फिर भी स्वर्ग में चले जाते हैं ।२०५। जो भी उनका कर्म शुभ अथवा अशुभ होता है उसी के अनुसार वे वहाँ-वहाँ अन्य देहों में स्थित रहते हुए सूर्य के वंश में रहकर ऊर्ध्व में अर्थात् देवलोक में और अधोभाग में अर्थात् नरकों में सञ्चरण किया करते हैं ।२०६। और जो भी देवगण और मनुगण हैं--प्रजेश और अन्य भी जो स्वर्ग में गये हुए सिद्ध हैं वे सब उसी से होने वाले तथा ख्याति के वश होने से धर्म से युक्त होते हुए प्राणी फिर विसर्ग के द्वारा हुआ