संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआभूत संप्लव वर्णन ] [ १०३
तेषामपि च सिद्धानां निधनोत्पत्तिरुच्यते ॥१६८ यथा सूर्यस्य लोकेऽस्मिन्नुदयास्तमने स्मृते । तथा जन्मनिरोधश्च भूतानामिह दृश्यते ॥१६६ आभूतसंप्लवात्तस्माद्भवः संसार उच्यते । यथा सर्वाणि भूतानां जायन्ते वर्षणेष्विह ॥२०० स्थावरादीनि नियमात्कल्पे कल्पे तथा प्रजाः । यथार्त्तवृतुलिंगानि नानारूपाणि पर्यये ॥२०१ दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्रह्मद्युरात्रिषु । प्रत्याहारे विसर्गे च गतिमंति ध्रुवाणि च ॥२०२ निष्क्रमन्ते विशंते च प्रजाः काले प्रजापतिम् । ब्रह्माणं सर्वभूतानि महायोगं महेश्वरम् ॥२०३
जिस समय में यह महानिशा नष्ट हो जाती है तब अव्यक्त योनि वाले ब्रह्मा से वे सभी भूत पूर्ण रूप से फिर समुत्पन्न हो जाया करते हैं ।१६७। ऋषिगण-मनुगण-देवगण और सब चारों प्रकार की प्रजा और उन्हीं सिद्धों की निधनोत्पत्ति कही जाया करती हैं ।१६८। जिस प्रकार से इस लोक में सूर्यदेव के उदय और अस्तमन कहे गये हैं उसी तरह से इन समस्त प्राणियों का जन्म और निरोध भी हुआ करता है जो कि सबको दिखाई दिया करता है । आत्मा तो नित्य है, उसका शरीर से वियोग ही निधन और संयोग जन्म कहा जाया करता है ।१६६। उस समस्त प्राणियों की जल निमग्नता से उत्पन्न हो जाना ही संसार कहा जाया करता है । जैसे वर्षा होने पर यहाँ पर सब भूतों के साहित्य समुत्पन्न हुआ करते हैं ।२००। स्थावर आदि सब प्रत्येक कल्प में तथा समस्त प्रजा जैसे ऋतु काल में सभी ऋतु के चिह्न नाना रूप वाले हो जाया करते हैं और बदल जाते हैं वैसे ही सब समुत्पन्न होते हैं ।२०१। जिस तरह से ब्रह्मा के दिन और रात्रि में हैं वही सबके सब दिखलाई दिया करते हैं । जब प्रत्याहरण होता है और विसर्ग होता है । उस समय में सभी निश्चित रूप से गतिमान् हुआ करते हैं ।२०२। समय के समुपस्थित हो जाने पर अपने ही आप ये सब प्रजाजन प्रजापति में प्रवेश और निष्क्रमण किया करते हैं । समस्त भूत ब्रह्माजी में