भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एवं स लोके निवृत्त उपशांते प्रजापतौ ।
ब्राह्मे नैमित्तिके तस्मिन्कल्पिते वै प्रसंयमे ॥१६२
देहैर्वियोगः सत्त्वानां तस्मिन्वै कृत्स्नशः स्मृतः ।
ततो दग्धेषु भूतेषु सर्वेष्वादित्यरश्मिभिः ॥१६३
देवर्षिमनुवर्येषु तस्मिन्नंबुप्लवे तदा ।
गंधर्वादीनि सत्त्वानि पिशाचांतानि सर्वशः ॥१६४
कल्पादावप्रतप्तानि जनमेवाश्रयंति वै ।
तिर्यग्योनीनि नरके यानि यानि गतान्यपि ॥१६५
तदा तान्यपि दग्धानि धूतपापानि सर्वशः ।
जले तान्युपपद्यंते यावत्संप्लवते जगत् ॥१६६

इसके अनन्तर सबकी रचना करने वाले महान तेजस्वी ने सब कुछ को अपनी ही आत्मा में रखकर फिर रात्रि में ही उस एकार्णव स्वरूप जल में निवास किया करता है ।१६०। फिर उस रात्रि का क्षय प्राप्त हो जाने पर प्रजापति जागते हैं और सृष्टि के सृजन करने की इच्छा से संयुत करने के लिए मन किया करते हैं ।१६१। इसी रीति से वह लोक निवृत्त होता है जबकि प्रजापति उपशान्त हो जाया करते हैं । वह प्रसंयम ब्राह्म और नैमित्तिक कल्पित होता है ।१६२। उसमें जीवों का अपने देहों से पूर्णतया वियोग कहा गया है । फिर सूर्य देव की परमाधिक संतप्त रश्मियों के द्वारा समस्त प्राणियों के दग्ध हो जाने पर सरंक्षय हो जाता है ।१६३। उस जल प्लावन में उस समय में देव-ऋषि-मनुष्य-गन्धर्व-पिशाच आदि जीव सभी यहाँ से जनलोक में निवास किया करते हैं तथा नरकगामी हैं उन सबका भी विनाश हो जाया करता है ।१६४-१६५। उस समय में वे भी पापों से रहित होकर सब निर्दग्ध हो जाया करते हैं और वे सभी जब तक यह सम्पूर्ण जगत जलमय रहता है जल में ही निमग्न हो जाया करते हैं अर्थात् जल ही के रूप में रहते हैं ।१६६।

व्युष्टायां च रजन्यां तु ब्रह्मणोऽव्यक्तयोनितः ।
जायन्ते हि पुनस्तानि सर्वभूतानि कृत्स्नशः ॥१६७
ऋषयो मनवो देवाः प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ।