भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 512

१०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सहस्रशीर्षा सुमनाः सहस्रपात्सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रवाक् सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिस्त्रयीमयो यः पुरुषो निरुच्यते ॥१८२

इनका सरण सर्वथा नही होता है और सब एक रूपता को प्राप्त हो जाया करती हैं जिसका नाम सलिल ही होता है। वह आगत और आग-तिक जो भी है वह सब सलिल ही कहा गया है। १७६। वह अर्णव नाम वाला जल इस समग्र पृथ्वी को प्रच्छादित कर लिया करता है। क्योंकि उसकी भाओं से वह आभास होता है। यहाँ भी शब्द व्याप्ति और दीप्ति में आया है। १७७। वह सब भस्म को अनुप्राप्त करके ही—हुआ है अतएव अम्भ कहा जाया करता है। नानात्व में और शीघ्र में अरधातु कही जाती है। १७८। उस समय में एकार्णव में कल है और शीघ्र नहीं है इसीलिए वे नरा हैं। उस एक सहस्र चारों की चौकड़ी के अन्त में ब्रह्माजी का एक दिन व्यतीत होने पर उसने काल पर्यन्त यह जगत् एकार्णव के रूप में रहता है। वह समय ऐसा होता है कि उसमें प्रजापति के सभी व्यापार अर्थात् कार्य-शीलता निवृत्त हो जाते हैं। १८०। उस समय में जब सभी स्थावर और जंगम विनष्ट हो जाया करते हैं और एकमात्र अर्णव हो रहता है तो एक ही ब्रह्माजी रहा करते हैं जो अनेक नेत्रों और चरणों वाले हैं। १८१। सहस्रों मस्तकों वाले—सुन्दर मन से सम्पन्न—अनेक चरणों सहस्रों चक्षुओं से युक्त और अनेकों वाणियों वाले एवं सहस्र बाहुओं से संयुत प्रथम प्रजापति त्रयीमय है जो पुरुष—इस नाम से कहा जाया करता है अर्थात वही परम पुरुष हैं। १८२।

आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता अपूर्व एकः प्रथमस्तुराषाट् । हिरण्यगर्भः पुरुषो महान्वै संपठ्यते वै रजसः परस्तात ॥१८३

चतुर्युगसहस्रान्ते सर्वतः सलिलाप्लुते । सुषुप्सुरप्रकाशेप्सुः स रात्रिं कुरुते प्रभुः ॥१८४

चतुर्विधा यदा शेते प्रजाः सर्वा लयं गताः । पश्यंति तं महात्मानं कालं सप्त महर्षयः ॥१८५

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