भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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आभूत संप्लव वर्णन ] [ ६६

द्वारा प्रेरित होते हुए अपनी धाराओं से इस जगत् को भर दिया करते हैं ।१७०। कुछ अन्य मेघ अपने जलों के समुदायों से बेला को भी अभिभूत कर दिया करते हैं । सातों द्वीपों के अन्दर जो भी जल था उसका पान कर लिया था और वह जल अन्यत्र स्थित था ।१७१। फिर वही जल आकाश से नीचे भूमि में गिर रहा था । उस काल में आकाश में परम घोर स्वरूप वाला वायु सभी ओर से ढक लिया करता है ।१७२। उस समय में केवल परम घोर एक समुद्र ही दिखाई दिया करता है तथा अन्य स्थावर और जंगम स्वरूप पूर्णतया विनष्ट हो जाता है। पूर्ण जब एक सहस्र युगों की चौकड़ी होती है तभी निःशेष कल्प कहा जाया करता है ।१७३। इसके अनन्तर जब जल के द्वारा यह लोक समावृत होजाता है तो बुध जन इसको एक मात्र सागर ही कहा करते हैं । इसके अनन्तर भूमि—जल—आकाश और वायु—इन सबका एक ही सागर हो जाता है ।१७४। अनल के नष्ट होने पर एकदम अन्धकार हो जाता है और उस समय में अन्य कुछ भी नहीं दिखाई देता है । पार्थिव—अर्थात् पृथ्वी के भाग तथा सामुद्र अर्थात् समुद्र के भाग ये सभी ओर से दैव्य जल ही जल दिखाई दिया करते हैं ।१७५।

असरन्त्यो व्रजंत्यैक्यं सलिलाख्यां भजन्त्युत ।
आगतागतिके चैव तदा तत्सलिलं स्मृतम् ॥१७६
प्रच्छादयति महीमेतामर्णवाख्यं तु तज्जलम् ।
आभाति यस्मात्तद्भाभिर्भा शब्दो व्याप्तिदीप्तिषु ॥१७७
भस्म सर्वमनुप्राप्य तस्मादंभो निरुच्यते ।
नानात्वे चैव शीघ्रे च धातुर्वै अर उच्यते ॥१७८
एकार्णवे तदा ह्यो वै न शीघ्रस्तेन ता नराः ।
तस्मिन्युगसहस्रांते दिवसे ब्रह्मणो गते ॥१७९
तावंतं कालमेवं तु भवत्येकार्णवं जगत् ।
तदा तु सर्वे व्यापारा निवत्र्त्तंते प्रजापतेः ॥१८०
एकमेकार्णवे तस्मिन्नष्टे स्थावरजंगमे ।
तदा स भवति ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥१८१