भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 510

६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

मेष क्रीड़ा गृहों के तुल्य होते हैं तो कुछ मीनों के समुद्यम के सदृश दिखलाई दिया करते हैं। उस समय में मेघों के अनेक स्वरूप दिखाई दिया करते हैं। उनका स्वरूप परमाधिक घोर होता है और वे भयङ्कर गर्जन किया करते हैं।१६५। उस समय जलधर आकर नभस्तल को एक साथ समाच्छादित कर देते हैं। इसके अनन्तर वे मेघ परम भीषण घोष किया करते हैं और भास्कर के ही स्वरूप वाले होते हैं।१६६। सात स्वरूपों में संवृत होने वाले वे मेघ उस परम घोर अग्नि का शमन कर दिया करते हैं। इसके उपरान्त वे मेघ महान् घोर मूसलाधार वर्षा किया करते हैं।१६७। परम घोर अशिव उस अग्नि का विनाश कर दिया करते हैं और अत्यधिक वर्षा के द्वारा जल से सम्पूर्ण जगत् को भर दिया करते हैं।१६८।

अद्भिस्तेजोभिभूतं च तदाग्निः प्रविशत्यपः । नष्टे चाग्नौ वर्षगते पयोदाः पावकोद्भवाः ॥१६६

प्लावयंतो जगत्सर्वं बृहज्जलपरिस्रवैः । धाराभिः पूरयंतीमं चोद्यमानाः स्वयंभुवा ॥१७०

अन्ये तु सलिलौघैस्तु वेलामभिभवन्त्यपि । सार्द्रद्वीपांतरं पीतं जलमन्येषु तिष्ठति ॥१७१

पुनः पतति भूमौ तत्पयोधस्तान्नभस्तले । संवैष्टयति घोरात्मा दिवि वायुः समंततः ॥१७२

तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजंगमे । पूर्णे युगसहस्रे वै निःशेषः कल्प उच्यते ॥१७३

अथांभसाऽऽवृते लोके प्राहुरेकार्णवं बुधाः । अथ भूमिर्जलं खं च वायुश्चैकार्णवे तदा ॥१७४

नष्टेऽनलेऽन्धभूते तु प्राज्ञायत न किंचन । पार्थिवास्त्वथ सामुद्रा आपो दैव्याश्च सर्वशः ॥१७५

उस समय में तेज से समुद्भूत वह अग्नि जलों के द्वारा परिभूरित होकर फिर जल में प्रवेश कर जाया करती है। जब वर्षा से वह अग्नि विनष्ट हो जाती है तो यपोद भी पावकोद्भव हो जाया करते हैं।१६६। विशाल जलों उप्लवों से सम्पूर्ण जगत् प्लावित कर देते हैं और स्वयम्भू के