संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआभूत संप्लव वर्णन ] [ ६७
में कुछ तो नील कमलों के सदृश आकार वाले होते हैं और कुछ कुमुदों के तुल्य हुआ करते हैं। कुछ वैडूर्यमणि के समान होते हैं तो दूसरे इन्द्रनील मणि के तुल्य हुआ करते हैं। १६०। कुछ शङ्ख और कुन्द पुष्प के सदृश श्वेत होते हैं तथा कुछ जाती और अञ्जन के समान हुआ करते हैं। कुछ मेघों का वर्ण धूम्र के समान होता है तथा कुछ पयोधर पीतवर्ण वाले होते हैं। १६१।
केचिद्रासभवर्णाभा लाक्षारसन्निभास्तथा । मनःशिलाभास्त्वपरे कपोताभास्तथांबुदाः ॥१६२ इन्द्रगोपनिभाः केचिद्धरितालनिभास्तथा । चाषपत्रनिभाः केचिदुत्तिष्ठंति घना दिवि ॥१६३ केचित्पुरवराकाराः केचिद्गजकुलोपमाः । केचित्पर्वतसंकाशाः केचित्स्थलनिभा घनाः ॥१६४ क्रीडागारनिभाः केचित्केचिन्मीनकुलोपमाः । बहुरूपा घोररूपा घोरस्वरनिनादिनः ॥१६५ तदा जलधराः सर्वे पूरयंति नभस्तलम् । ततस्ते जलदा घोरराविणो भास्करात्मकाः ॥१६६ सप्तधा संवृतात्मानस्तमग्निं शमयंत्युत । ततस्ते जलदा वर्षं मुंचंति च महौघवत् ॥१६७ सुघोरमशिवं सर्वं नाशयन्ति च पावकम् । प्रवृष्टैश्च तथात्यर्थं वारिणा पूर्यते जगत् ॥१६८
कुछ मेघों का वर्ण रासभ (गधा) के सदृश होता है तथा कुछ लाख के रस के सदृश हुआ करते हैं। दूसरे कुछ मैनसिल के सदृश एकदम सुर्ख होते हैं तथा कुछ कबूतरों के समान वर्णों वाले होते हैं। १६२। कुछ इन्द्र गोप के सदृश हैं तो कुछ हरिताल के समान रङ्ग वाले हुआ करते हैं। उस समय में अन्तरिक्ष में चाष के पत्रों के ही सदृश मेघ उमड़कर उठा करते हैं। १६३। कुछ घन श्रेष्ठ पुर के आकार वाले हैं तो कुछ द्विज (पक्षी) कुलों के सदृश हुआ करते हैं। कुछ घन तो उस समय में विशाल पर्वतों के समान आकार वाले होते हैं तथा कुछ ऐसे प्रतीत होते हैं मानों स्थल ही होवें । १६४। कुछ