संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दग्ध कर दिया था। सहस्रों तथा प्रयुतों और अर्बुदों योजन पर्यन्त उस कालानल की ज्वालाएँ ऊँची उठ रही थीं ।१५४।
उदतिष्ठञ्छिखास्तस्य बह्व्यः संवर्त्तकस्य तु ।
गन्धर्वांश्च पिशाचांश्च समहोरगराक्षसान् ॥१५५
तदा दहति संदीप्तो गोलकं चैव सर्वशः ।
भूलोकं च भुवर्लोकं स्वर्लोकं च महस्तथा ॥१५६
घोरो दहति कालाग्निरेवं लोकचतुष्टयम् ।
व्याप्तेषु तेषु लोकेषु तिर्यगूर्ध्वमथाग्निना ॥१५७
तत्तेजः समनुप्राप्य कृत्स्नं जगदिदं शनैः ।
अयोगुडनिभं सर्वं तदा ह्येवं प्रकाशते ॥१५८
ततो गजकुलाकारास्तडिद्भिः समलंकृताः ।
उत्तिष्ठन्ति तदा घोरा व्योम्नि संवर्तका घनाः ॥१५६
केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसन्निभाः ।
केचिद्वैडूर्यसंकाशा इन्द्रनीलनिभाः परे ॥१६०
शंखकुन्दनिभाश्चान्ये जात्यंजननिभास्तथा ।
धूम्रवर्णा घनाः केचित्केचित्पीताः पयोधराः ॥१६१
उस सम्वर्तक अनल की शिखाएं बहुत सी ऊपर की ओर उठ रही थीं और वे ज्वालाएं ऊपर में संस्थित गन्धर्वों—पिशाचों और महोरगों तथा राक्षसों को निर्दग्ध कर रही थीं ।१५५। उस समय में यह संदीप्त अनल सभी ओर से गोलक को दग्ध कर देता है। भूलोक-भुवर्लोक—स्वर्लोक और महर्लोक को भी जला देता है ।१५६। यह परम कालाग्नि इस रीति से चारों लोकों को निर्दग्ध कर दिया करता है। तिरछा और ऊपर की ओर इस प्रकार से उन समस्त लोकों में इसके व्याप्त हो जाने पर सभी को भस्मसात् कर देता है ।१५७। धीरे-धीरे यह तेज इस सम्पूर्ण जगत् में सम्प्राप्त हो जाता है। उस समय में यह सम्पूर्ण जगत् एक परमाधिक संतप्त लोहे के गोले के ही समान प्रकाशित हुआ करता है ।१५८। इसके उपरान्त उस समय में नभोमंडल में हाथियों के समूह के आकार वाले विद्युल्लता से समलङ्कृत परम घोर सम्वर्त्तक मेघ उमड़ कर उठते हैं ।१५६। उन मेघों