भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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अंबरीषमिवाभाति सर्वमप्यखिलं जगत् । सर्वमेव तदर्चिभिः पूर्णं जाज्वल्यतो घनः ॥१४८ भूतले यानि सत्त्वानि महोदधिगतानि च । ततस्तानि प्रलीयंतो भूमित्वमुपयांति च ॥१४६ द्वीपांश्च पर्वतांश्चैव वर्षाण्यथ महोदधिः । सर्वं तद्भस्मसाच्चक्रे सर्वात्मा पावकस्तु सः ॥१५० समुद्रेभ्यो नदीभ्यश्च पातालेभ्यश्च सर्वशः । पिबत्यपः समिद्धोऽग्निः पृथिवीमाश्रितो ज्वलन् ॥१५१ ततः संवर्द्धितः शैलानतिक्रम्य ग्रहांस्तथा । लोकान्संहरते दीप्तो घोरः संवर्त्तकोऽनलः ॥१५२ ततः स पृथिवीं भित्वा रसातलमाशोषयत् । निर्दह्यान्ते तु पातालं वायुलोकमथादहत् ॥१५३ अधस्तात्पृथिवीं दग्ध्वा तूर्ध्वं स दहतो दिवम् । योजनानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च ॥१५४

यह सब जगत् उस समय में अम्बरीष के ही समान आभास होता था । और यह सम्पूर्ण उस अग्नि की अर्चियों से पूर्ण घन प्रज्वलित हो रहा था ।१४८। इस भूतल में जितने भी प्राणी थे तथा महासागर में जो भी सत्त्व थे वे सबके सब प्रलीन हो जाते हैं और भूमि को मिट्टी में मिल जाया करते हैं ।१४६। समस्त द्वीप—पर्वत—वर्ष और महासागर इन सभी को उस सर्वात्मा पावक ने जलाकर भस्म के तुल्य ही बना दिया था ।१५०। इस भूमि में रहने वाला वह परमाधिक प्रदीप्त अग्नि जलता हुआ होकर समुद्रों से-नदियों से और पातालों से सभी जगह से जल का पान किया करता है। ।१५१। इसके अनन्तर वह परम घोर सम्वर्त्तक अनल अधिक सम्वर्धित होकर शैलों और ग्रहों का अतिक्रमण करके परम दीप्त होता हुआ समस्त लोकों का संहार किया करता है ।१५२। इसके पश्चात् वह भीषण अनल इस पृथ्वी का भेदन करके रसातल में पहुँच कर उसका भी शोषण कर देता है । अन्त में पाताल लोक को निर्दग्ध करके फिर वायु लोक को दग्ध कर दिया था ।१५३। नीचे पृथ्वी का दाह करके और ऊपर की ओर स्वर्ग लोक को

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