संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ते वारिणा प्रदीप्ताश्च बहुसाहस्ररश्मयः । स्वं समावृत्य तिष्ठन्ति निर्दहन्तो वसुंधराम् ॥१४२ ततस्तेषां प्रतापेन दह्यमाना वसुन्धरा । साद्रिनद्यर्णवा पृथ्वी निस्नेहा समपद्यत ॥१४३ दीप्तिभिः संतताभिश्च चित्राभिश्च समंततः । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक् च संरुद्धा सूर्यरश्मिभिः ॥१४४ सूर्याग्नीनां प्रवृद्धानां संसृष्टानां परस्परम् । एकत्वमुपयातानामेकज्वाला भवत्युत ॥१४५ सर्वलोकप्रणाशश्च सोऽग्निर्भूत्वाऽनुमंडली । चतुर्लोकमिदं सर्वं निर्दहत्याशुतेजसा ॥१४६ ततः प्रलीने सर्वस्मिञ्जङ्गमे स्थावरे तथा । निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिः कूर्मपृष्ठसमा भवेत् ॥१४७
उन रश्मियों के द्वारा ऊपर की ओर तथा नीचे की ओर अग्नियां प्राप्त होती हैं युग के अन्त में प्रताप देने वाले सात सूर्य दीप्त हुआ करते हैं ।१४१। सहस्र रश्मियों की बाहुएं वारि के ही द्वारा ही प्रदीप्त होती हैं । वे आकाश को समावृत करके ही सम्पूर्ण वसुन्धरा का निर्दहन करती हुईं स्थिर रहा करती हैं ।१४२। इसके पश्चात् उनके परिताप से दहन को प्राप्त होती हुई सम्पूर्ण वसुन्धरा पर्वत-नदी और समुद्रों के सहित यह पृथ्वी स्नेह (द्रव जल) से रहित हो गयी थी ।१४३। निरन्तर विद्यमान रहने वाली-सुदीप्त और विचित्रता से चारों ओर युक्त सम्पूर्ण भूमि ऊपर-नीचे और तिरछी ओर सूर्य की किरणों से संरुद्ध हो गयी थीं ।१४४। प्रवृद्ध हुई और परस्पर में संसृष्ट हुई सूर्य की अग्नियां एक स्वरूप को प्राप्त होकर एक ही विशाल ज्वाला हो जाती है ।१४५। वह अग्नि अनुमण्डल वाली होकर समस्त लोकों का प्रणाश किया करता है और इन चारों लोकों का सबका बहुत ही शीघ्र तेज के द्वारा निर्दहन कर देती है ।१४६। इसके अनन्तर इस सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम के प्रलीन होने पर यह समग्र पृथ्वी वृक्षों से रहित बिना तृणों वाली कछुए की पीठ के ही समान यह जैसी हो गयी थी और उस पर कुछ भी शेष नहीं रह गया था ।१४७।