संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
आभूत संप्लव वर्णन ] [ ६६
द्वारा प्रेरित होते हुए अपनी धाराओं से इस जगत् को भर दिया करते हैं ।१७०। कुछ अन्य मेघ अपने जलों के समुदायों से बेला को भी अभिभूत कर दिया करते हैं । सातों द्वीपों के अन्दर जो भी जल था उसका पान कर लिया था और वह जल अन्यत्र स्थित था ।१७१। फिर वही जल आकाश से नीचे भूमि में गिर रहा था । उस काल में आकाश में परम घोर स्वरूप वाला वायु सभी ओर से ढक लिया करता है ।१७२। उस समय में केवल परम घोर एक समुद्र ही दिखाई दिया करता है तथा अन्य स्थावर और जंगम स्वरूप पूर्णतया विनष्ट हो जाता है। पूर्ण जब एक सहस्र युगों की चौकड़ी होती है तभी निःशेष कल्प कहा जाया करता है ।१७३। इसके अनन्तर जब जल के द्वारा यह लोक समावृत होजाता है तो बुध जन इसको एक मात्र सागर ही कहा करते हैं । इसके अनन्तर भूमि—जल—आकाश और वायु—इन सबका एक ही सागर हो जाता है ।१७४। अनल के नष्ट होने पर एकदम अन्धकार हो जाता है और उस समय में अन्य कुछ भी नहीं दिखाई देता है । पार्थिव—अर्थात् पृथ्वी के भाग तथा सामुद्र अर्थात् समुद्र के भाग ये सभी ओर से दैव्य जल ही जल दिखाई दिया करते हैं ।१७५।
असरन्त्यो व्रजंत्यैक्यं सलिलाख्यां भजन्त्युत ।
आगतागतिके चैव तदा तत्सलिलं स्मृतम् ॥१७६
प्रच्छादयति महीमेतामर्णवाख्यं तु तज्जलम् ।
आभाति यस्मात्तद्भाभिर्भा शब्दो व्याप्तिदीप्तिषु ॥१७७
भस्म सर्वमनुप्राप्य तस्मादंभो निरुच्यते ।
नानात्वे चैव शीघ्रे च धातुर्वै अर उच्यते ॥१७८
एकार्णवे तदा ह्यो वै न शीघ्रस्तेन ता नराः ।
तस्मिन्युगसहस्रांते दिवसे ब्रह्मणो गते ॥१७९
तावंतं कालमेवं तु भवत्येकार्णवं जगत् ।
तदा तु सर्वे व्यापारा निवत्र्त्तंते प्रजापतेः ॥१८०
एकमेकार्णवे तस्मिन्नष्टे स्थावरजंगमे ।
तदा स भवति ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥१८१
१०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सहस्रशीर्षा सुमनाः सहस्रपात्सहस्रचक्षुर्वदनः सहस्रवाक् सहस्रबाहुः प्रथमः प्रजापतिस्त्रयीमयो यः पुरुषो निरुच्यते ॥१८२
इनका सरण सर्वथा नही होता है और सब एक रूपता को प्राप्त हो जाया करती हैं जिसका नाम सलिल ही होता है। वह आगत और आग-तिक जो भी है वह सब सलिल ही कहा गया है। १७६। वह अर्णव नाम वाला जल इस समग्र पृथ्वी को प्रच्छादित कर लिया करता है। क्योंकि उसकी भाओं से वह आभास होता है। यहाँ भी शब्द व्याप्ति और दीप्ति में आया है। १७७। वह सब भस्म को अनुप्राप्त करके ही—हुआ है अतएव अम्भ कहा जाया करता है। नानात्व में और शीघ्र में अरधातु कही जाती है। १७८। उस समय में एकार्णव में कल है और शीघ्र नहीं है इसीलिए वे नरा हैं। उस एक सहस्र चारों की चौकड़ी के अन्त में ब्रह्माजी का एक दिन व्यतीत होने पर उसने काल पर्यन्त यह जगत् एकार्णव के रूप में रहता है। वह समय ऐसा होता है कि उसमें प्रजापति के सभी व्यापार अर्थात् कार्य-शीलता निवृत्त हो जाते हैं। १८०। उस समय में जब सभी स्थावर और जंगम विनष्ट हो जाया करते हैं और एकमात्र अर्णव हो रहता है तो एक ही ब्रह्माजी रहा करते हैं जो अनेक नेत्रों और चरणों वाले हैं। १८१। सहस्रों मस्तकों वाले—सुन्दर मन से सम्पन्न—अनेक चरणों सहस्रों चक्षुओं से युक्त और अनेकों वाणियों वाले एवं सहस्र बाहुओं से संयुत प्रथम प्रजापति त्रयीमय है जो पुरुष—इस नाम से कहा जाया करता है अर्थात वही परम पुरुष हैं। १८२।
आदित्यवर्णो भुवनस्य गोप्ता अपूर्व एकः प्रथमस्तुराषाट् । हिरण्यगर्भः पुरुषो महान्वै संपठ्यते वै रजसः परस्तात ॥१८३
चतुर्युगसहस्रान्ते सर्वतः सलिलाप्लुते । सुषुप्सुरप्रकाशेप्सुः स रात्रिं कुरुते प्रभुः ॥१८४
चतुर्विधा यदा शेते प्रजाः सर्वा लयं गताः । पश्यंति तं महात्मानं कालं सप्त महर्षयः ॥१८५
१०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
एवं स लोके निवृत्त उपशांते प्रजापतौ ।
ब्राह्मे नैमित्तिके तस्मिन्कल्पिते वै प्रसंयमे ॥१६२
देहैर्वियोगः सत्त्वानां तस्मिन्वै कृत्स्नशः स्मृतः ।
ततो दग्धेषु भूतेषु सर्वेष्वादित्यरश्मिभिः ॥१६३
देवर्षिमनुवर्येषु तस्मिन्नंबुप्लवे तदा ।
गंधर्वादीनि सत्त्वानि पिशाचांतानि सर्वशः ॥१६४
कल्पादावप्रतप्तानि जनमेवाश्रयंति वै ।
तिर्यग्योनीनि नरके यानि यानि गतान्यपि ॥१६५
तदा तान्यपि दग्धानि धूतपापानि सर्वशः ।
जले तान्युपपद्यंते यावत्संप्लवते जगत् ॥१६६
इसके अनन्तर सबकी रचना करने वाले महान तेजस्वी ने सब कुछ को अपनी ही आत्मा में रखकर फिर रात्रि में ही उस एकार्णव स्वरूप जल में निवास किया करता है ।१६०। फिर उस रात्रि का क्षय प्राप्त हो जाने पर प्रजापति जागते हैं और सृष्टि के सृजन करने की इच्छा से संयुत करने के लिए मन किया करते हैं ।१६१। इसी रीति से वह लोक निवृत्त होता है जबकि प्रजापति उपशान्त हो जाया करते हैं । वह प्रसंयम ब्राह्म और नैमित्तिक कल्पित होता है ।१६२। उसमें जीवों का अपने देहों से पूर्णतया वियोग कहा गया है । फिर सूर्य देव की परमाधिक संतप्त रश्मियों के द्वारा समस्त प्राणियों के दग्ध हो जाने पर सरंक्षय हो जाता है ।१६३। उस जल प्लावन में उस समय में देव-ऋषि-मनुष्य-गन्धर्व-पिशाच आदि जीव सभी यहाँ से जनलोक में निवास किया करते हैं तथा नरकगामी हैं उन सबका भी विनाश हो जाया करता है ।१६४-१६५। उस समय में वे भी पापों से रहित होकर सब निर्दग्ध हो जाया करते हैं और वे सभी जब तक यह सम्पूर्ण जगत जलमय रहता है जल में ही निमग्न हो जाया करते हैं अर्थात् जल ही के रूप में रहते हैं ।१६६।
व्युष्टायां च रजन्यां तु ब्रह्मणोऽव्यक्तयोनितः ।
जायन्ते हि पुनस्तानि सर्वभूतानि कृत्स्नशः ॥१६७
ऋषयो मनवो देवाः प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ।
आभूत संप्लव वर्णन ] [ १०३
तेषामपि च सिद्धानां निधनोत्पत्तिरुच्यते ॥१६८ यथा सूर्यस्य लोकेऽस्मिन्नुदयास्तमने स्मृते । तथा जन्मनिरोधश्च भूतानामिह दृश्यते ॥१६६ आभूतसंप्लवात्तस्माद्भवः संसार उच्यते । यथा सर्वाणि भूतानां जायन्ते वर्षणेष्विह ॥२०० स्थावरादीनि नियमात्कल्पे कल्पे तथा प्रजाः । यथार्त्तवृतुलिंगानि नानारूपाणि पर्यये ॥२०१ दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा ब्रह्मद्युरात्रिषु । प्रत्याहारे विसर्गे च गतिमंति ध्रुवाणि च ॥२०२ निष्क्रमन्ते विशंते च प्रजाः काले प्रजापतिम् । ब्रह्माणं सर्वभूतानि महायोगं महेश्वरम् ॥२०३
जिस समय में यह महानिशा नष्ट हो जाती है तब अव्यक्त योनि वाले ब्रह्मा से वे सभी भूत पूर्ण रूप से फिर समुत्पन्न हो जाया करते हैं ।१६७। ऋषिगण-मनुगण-देवगण और सब चारों प्रकार की प्रजा और उन्हीं सिद्धों की निधनोत्पत्ति कही जाया करती हैं ।१६८। जिस प्रकार से इस लोक में सूर्यदेव के उदय और अस्तमन कहे गये हैं उसी तरह से इन समस्त प्राणियों का जन्म और निरोध भी हुआ करता है जो कि सबको दिखाई दिया करता है । आत्मा तो नित्य है, उसका शरीर से वियोग ही निधन और संयोग जन्म कहा जाया करता है ।१६६। उस समस्त प्राणियों की जल निमग्नता से उत्पन्न हो जाना ही संसार कहा जाया करता है । जैसे वर्षा होने पर यहाँ पर सब भूतों के साहित्य समुत्पन्न हुआ करते हैं ।२००। स्थावर आदि सब प्रत्येक कल्प में तथा समस्त प्रजा जैसे ऋतु काल में सभी ऋतु के चिह्न नाना रूप वाले हो जाया करते हैं और बदल जाते हैं वैसे ही सब समुत्पन्न होते हैं ।२०१। जिस तरह से ब्रह्मा के दिन और रात्रि में हैं वही सबके सब दिखलाई दिया करते हैं । जब प्रत्याहरण होता है और विसर्ग होता है । उस समय में सभी निश्चित रूप से गतिमान् हुआ करते हैं ।२०२। समय के समुपस्थित हो जाने पर अपने ही आप ये सब प्रजाजन प्रजापति में प्रवेश और निष्क्रमण किया करते हैं । समस्त भूत ब्रह्माजी में
१०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तथा महेश्वर में महायोग किया करते हैं अर्थात् सृजन काल में ब्रह्माजी में तथा संहरण काल में महेश्वर में इन सबका महान योग होता है ॥२०३।
स सृष्टा सर्वभूतानां कल्पादिषु पुनः पुनः । व्यक्तोऽव्यक्तो महादेवस्तस्य सर्वमिदं जगत् ॥२०४ येनैव सृष्टाः प्रथमं प्रयाता आपो हि मार्गेण महीतलेऽस्मिन् । पूर्वं प्रयातेन यथात्वथापस्तेनैव तेनैव तु स्वर्व्रजंति ॥२०५ यथा शुभेन त्वशुभेन चैव तत्रैव विवर्त्तमानाः । मर्त्यास्तु देहांतराभावितत्वाद्रवेर्वशादूर्ध्वमधश्चरंति ॥२०६ ये चापि देवा मनवः प्रजेशा अन्येऽपि ये स्वर्गगताश्च सिद्धाः । तद्भाविताः ख्यातिवशाच्च धर्म्याः पुनर्विसर्गेण भवन्ति सत्त्वाः ॥२०७ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि कालमाभूतसंप्लवम् । मन्वन्तराणि यानि स्युर्व्याख्यातानि मया द्विजाः ॥२०८ सह प्रजानिसर्गेण सह देवैश्चतुर्दश । सा युगाख्या सहस्रं तु सर्वाण्येवांतराणि वै ॥२०९ अस्याः सहस्रे द्वे पूर्णे विशेषः कल्प उच्यते । एतद्ब्राह्ममहर्ज्ञेयं तस्य संख्यां निबोधतः ॥२१०
कल्पों के आदि काल में बार-बार समस्त प्राणियों का वही सृजन करने वाला हुआ करता है। महादेव का स्वरूप व्यक्त और अव्यक्त है और उसी का यह सम्पूर्ण जगत हुआ करता है ।२०४। जिसके ही द्वारा ये सर्व प्रथम सृष्ट हुए हैं वे जल समग्र इसी महीतल में मार्ग के द्वारा चले गये हैं। जैसे पूर्व में यह गमन कर गये हैं उसी मार्ग से फिर भी स्वर्ग में चले जाते हैं ।२०५। जो भी उनका कर्म शुभ अथवा अशुभ होता है उसी के अनुसार वे वहाँ-वहाँ अन्य देहों में स्थित रहते हुए सूर्य के वंश में रहकर ऊर्ध्व में अर्थात् देवलोक में और अधोभाग में अर्थात् नरकों में सञ्चरण किया करते हैं ।२०६। और जो भी देवगण और मनुगण हैं--प्रजेश और अन्य भी जो स्वर्ग में गये हुए सिद्ध हैं वे सब उसी से होने वाले तथा ख्याति के वश होने से धर्म से युक्त होते हुए प्राणी फिर विसर्ग के द्वारा हुआ
आभूत संप्लव वर्णन ] [ १०५
करते हैं ।२०७। इसके आगे आभूत संप्लव अर्थात् समस्त प्राणियों को जल-मग्न हो जाना मैं उस काल के विषय में वर्णन करूँगा । हे द्विजो ! जो-जो भी मन्वन्तर होते हैं । उन सबको मैंने बतला ही दिया है ।२०८। प्रजाओं के निसर्ग और देवों के साथ चतुर्दश होते हैं । वह सहस्र युगाख्या है उसी में सभी अन्तर होते हैं ।२०६। इस युगाख्या के जब पूर्ण हो सहस्र होते हैं तब विशेष कल्प कहा जाया करता है । यही ब्रह्माजी का दिन समझना चाहिए । उसकी संख्या को भी समझ लो ।२१०।
निमेषतुल्यमात्रा हि कृता लब्धक्षणेन तु । मानुषाक्षिनिमेषास्तु काष्ठा पंचदश स्मृताः ॥२११ नव क्षणस्तु पंचैव विंशत्काष्ठा तु ते त्रयः । प्रस्था सप्तोदकाश्चैव साधिकास्तु लवः स्मृतः ॥२१२ लवास्त्रिंशत्कला ज्ञेया मुहूर्त्तस्त्रिंशतः कलाः । मुहूर्त्तस्तु पुनस्त्रिंशदहोरात्रमिति स्थितिः ॥२१३ अहोरात्रं कलानां तु अधिकानि शतानि षट् । ताश्चैव संख्यया ज्ञेयाश्चंद्रादित्यगतिर्यथा ॥२१४ निमेषा दश पंचैवं काष्ठास्तास्त्रिंशतः कला । त्रिंशत्कला मुहूर्त्तं तु दशभागं कला स्मृतम् ॥२१५ चत्वारिंशत्कलाः पंच मुहूर्त्त इति संज्ञितः । मुहूर्त्ताश्च लवाश्चापि प्रमाणज्ञैः प्रकल्पिताः ॥२१६ तथानेनांभसञ्चापि पलान्यथ त्रयोदश । मागधेनैव मानेन जलप्रस्थो विधीयते ॥२१७
क्षण के लाभ से निमेष की मात्रा होती है । मनुष्य की आँखों की पलकें जो चलती हैं उसी काल को निमेष कहा जाता है । ऐसे पन्द्रह निमेषों की एक काष्ठा होती है । नौ और पांच क्षण ही बीस काष्ठा है । वे तीन तथा साधिक सात प्रस्थोदक लव कहा गया है ।२११-२१२। तीस लव की एक कला होती है और तीस कला का—एक मुहूत्तं होता है । यही स्थिति हुआ करती है ।२१३। कलाओं का अहोरात्र साधिक शत और छै है । वे ही संख्या से जैसी चन्द्र और सूर्य की गति होती है जान लेनी
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चाहिए। २१४। पन्द्रह निमेष काष्ठा है और तीस काष्ठाओं की कला होती है। तीस कला का मुहूर्त्त होता है। दशभाग ही कला कहा गया है। २१५। चालीस कलाओं के पाँच मुहूर्त्त संज्ञा होती है। ये मुहूर्त्त और लव प्रमाणों के ज्ञाताओं के द्वारा कल्पित किये हैं। उसी भाँति से इसके द्वारा जल के भी तरह पल होते हैं। मागध मान से भी जल प्रस्थ किया जाता है। २१६-२१७।
एते वाराप्लुतप्रस्थाश्चत्वारो नालिकोच्चयः । हेममाषैः कृतच्छिद्रश्चतुर्भिश्चतुरंगुलैः ॥२१८ समाहनि च रात्रौ च मुहूर्त्ता वै द्विनालिकाः । रवेर्गतिविशेषेण सर्वेष्वेतेषु नित्यशः ॥२१९ अधिकं षट्शतं यच्च कलानां प्रविधीयते । तदहर्मानुषं ज्ञेयं नाक्षत्रं तु दशाधिकम् ॥२२० सावनेन तु मानेन अब्दोऽयं मानुषः स्मृत । एतद्दिव्यमहोरात्रमिति शास्त्रविनिश्चयः ॥२२१ अह्नानेन तु या संख्या मासर्त्वयनवार्षिकी । तदा बद्धमिदं ज्ञानं संज्ञया ह्युपलक्षितम् ॥२२२ कलानां तु परीमाणं कला इत्यभिधीयते । यदहो ब्रह्मणः प्रोक्तः दिव्या कोटी तु सा स्मृतः ॥२२३ शतानां च सहस्राणि दशद्विगुणितानि च । नवति च सहस्राणि तथैवान्यानि यानि तु ॥२२४
ये धारा प्लुत प्रस्थ नालिकोच्चय चार हैं। चार अंगुल चार हेम- माषों से कृतच्छिद्र है। २१८। सम दिन में ओर रात्रि में द्विनालि का मुहूर्त्त होते हैं। नित्य ही इन सबों में रवि की गति विशेष से होते हैं। २१९। और अधिक छे सौ कलाओं का प्रविधान किया जाता है। वह मनुष्यों का दिन समझना चाहिए और जो नक्षत्र है वह दशाधिक होता है। २२०। इस दिन से जो संख्या होती है वह मास-ऋतु-अयन और वर्ष की होती है। उस समय में यह बद्धज्ञान संज्ञा के द्वारा उपलक्षित होता है। २२२। कलाओं का जो परिमाण है वह कला—इस नाम से कहा जाया करता है। जो ब्रह्माजी
आभूत संप्लव वर्णन ] [ १०७
का दिन कहा गया है वह दिव्य कोटी कही गयी है ।२२३। शतों के सहस्र दश ही से गुणित होते हैं नब्बे सहस्र और उसी भाँति जो अन्य हैं ।२२४।
एतच्छ्रुत्वा तु ऋषयो विस्मयं परमाद्भुतम् ।
संख्यासंभजनं ज्ञानमपृच्छन्सुतरां तदा ॥२२५
ऋषयु ऊचु-
संप्रकालनमानं तु मानुषेणैव सम्मतम् ।
मानेन श्रोतुमिच्छामः संक्षेपार्थपदाक्षरम् ॥२२६
तेषां श्रुत्वा स देवस्तु वायुर्लोकहिते रतः ।
संक्षेपाद्दिव्यचक्षुष्ट्वात्प्रोवाच वचनं प्रभुः ॥२२७
एते रात्र्यहनी पूर्वं कीर्तिते त्विह लौकिके ।
तासां संख्याथ वर्षाग्रं ब्राह्मं वक्ष्याम्यहः क्षये ॥२२८
कोटीशतानि चत्वारि वर्षाणि मानुषाणि तु ।
द्वात्रिंशच्च तथा कोट्यः संख्याताः संख्यया द्विजैः ॥२२९
तथा शतसहस्राणि एकोननवतिः पुनः ।
अशीतिश्च सहस्राणि एष कालः प्लवस्य तु ॥२३०
मानुषाख्येन संख्यातः कालो ह्याभूतसंप्लवः ।
सप्तसूर्यप्रदग्धेषु तदा लोकेषु तेषु वै ।
महाभूतेषु लीयंते प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ॥२३१
समस्त ऋषियों ने जब यह सुना तो उनको बहुत ही अधिक आश्चर्य हुआ था । उस समय में पुनः इस संख्या के संभजन के ज्ञान को पूछा था ।२२५। ऋषियों ने कहा—यह संप्रकालन का ज्ञान मनुष्यों के द्वारा ही सम्मत होता है । अब हम लोग मान के द्वारा संक्षेपार्थ पदाक्षर को श्रवण करने की इच्छा करते हैं ।२२६। उनके इस वचन को सुनकर लोगों के हित में रति रखने वाले वायु देव ने जो प्रभु दिव्य चक्षु वाले थे यह वचन बोले ।२२७। वे रात और दिन जो कि लौकिक होते हैं और यहां पर माने जाते हैं और यहाँ पर माने जाते हैं वे तो अपने पूर्व में ही वर्णन कर दिए हैं । उनकी सख्या और इसके पश्चात् वर्षाग्र ब्राह्म क्षय में बताऊँगा ।२२८।
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चार सौ करोड़ मानवों के वर्ष तथा बत्तीस करोड़ द्विजों के द्वारा संख्या से संख्यात हैं ।२२६। उसी भाँति एक सौ सहस्र और फिर उन्यासी अस्सी सहस्र यह उस महान् प्लव का काल होता है ।२३०। यह आभूत संप्लव का काल मानुष नामक संख्या से गिनकर बताया गया है । जिसमें समस्त प्राणियों का संक्षय होकर सर्वत्र जल ही जल हो जाता है उसी को आभूत संप्लव कहा जाया करता है । सात सूर्यों के द्वारा उस समय में उन लोकों के प्रदग्ध होने पर चारों प्रकार की सम्पूर्ण प्रजा महाभूतों में लीन हो जाया करती है । जरायुज—स्वेदज—अण्डज और उद्भिज—ये प्रजा के चार प्रकार होते हैं ।२३१।
सलिलेनाप्लुते लोके नष्टे स्थावरजंगमे ॥२३२
विनिवृत्ते च संहारे उपशान्ते प्रजापतौ ।
निरालोके प्रदग्धे तु नैशेन तमसा वृते ॥२३३
ईश्वराधिष्ठिते त्वस्मिंस्तदा ह्येकार्णवे किल ।
तावदेकार्णवे ज्ञेयं यावदासीदहः प्रभोः ॥२३४
रात्रिस्तु सलिलावस्था निवृतौ वाप्यहः स्मृतम् ।
अहोरात्रस्तथैवास्य क्रमेण परिवर्तते ॥२३५
आभूतसंप्लवो ह्येष अहोरात्रः स्मृतः प्रभोः ।
त्रैलोक्ये यानि सत्वानि गतिमंति ध्रुवाणि च ॥२३६
आभूतेभ्यः प्रलीयन्ते तस्मादाभूतसंप्लवः ।
अतीता वर्तमानाश्च तथैवानागताः प्रजाः ॥२३७
दिव्यसंख्या प्रसंख्याता अपरार्धगुणीकृताः ।
परार्द्धं द्विगुणं चापि परमायुः प्रकीर्तितम् ॥२३८
उस समय में सम्पूर्ण लोक जल से समाप्लुत होकर नष्ट हो जाया करता है और सभी स्थावर तथा जङ्गम विनष्ट हो जाया करते हैं ।२३२। समग्र संहार के समीप हो जाने पर और प्रजापति के उपशान्त होने पर तथा सर्वत्र प्रकाश से रहित एवं दग्ध तथा रात्रि के अन्धकार से आवृत होने पर ।२३३। उस समय में यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर के द्वारा ही अधिष्ठित था और सर्वत्र एक ही अर्णव था । यह तब तक एकार्णव का स्वरूप था जब
उसी को दिन कहा गया है । इसी रीति से इनका अहोरात्र क्रम से परिव- र्तित हुआ करता है ।२३५। यह आभूत संप्लव प्रभु का अहोरात्र कहा गया है । इन तीनों लोकों में जो भी प्राणी हैं वे सभी गतिमान् और ध्रुव हैं ।२३६। जितने भी भूत हैं वे सभी प्रलीन होते हैं इसी कारण से इसका नाम आभूत संप्लव होता है । जो व्यतीत हो चुके हैं—जो भी वर्त्तमान हैं और जो प्रजा अनागत हैं और परार्ध से गुणी वृत हैं । परार्ध द्विगुण है और यही परम आयु कीर्तित की गयी है ।२३७-२३८।
एतावान्स्थितिकालस्तु ह्यजस्येह प्रजापतेः । स्थित्यंतं प्रतिसर्गंश्च ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥२३६
यथा वायुप्रगेन दीपार्चिरुपशाम्यति । तथैव प्रतिसर्गेण ब्रह्मा समुपशाम्यति ॥२४०
तथा स्वप्रतिसंसृष्टे महादादौ महेश्वरे । महत्प्रलीयते व्यक्तो गुणसाम्यं ततो भवेत् ॥२४१
इत्येष वः समाख्यातो मया ह्याभूतसंप्लवः । ब्रह्मनैमित्तिको हष संप्रक्षालनसंयमः । समासेन समाख्यातो भूयः किं वर्णयामि वः ॥२४२
य इदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः । कीर्त्तयेद्वर्णयेष्टापि महतीं सिद्धिमाप्नुयात् ॥२४३
उस अजन्मा प्रजापति का इतना ही स्थिति का काल होता है । उस परमेष्ठी ब्रह्माजी का स्थिति का अन्त और प्रति सर्ग होता है ।२३६। जिस प्रकार से वायु के प्रवेग से दीप की शिखा उपशान्त हो जाया करते हैं ।२४० उसी भाँति महदादि महेश्वर के अपने प्रति संसृष्ट होने पर महिमा है । जो भी कोई इसको नित्य धारण किया करता है अथवा इसका बारम्बार श्रवण किया करता है अथवा इसका कीर्त्तन किया करता है या वर्णन करता है वह मानव बड़ी भारी सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ।२४३।
—X—
११० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
॥ प्रतिसर्ग वर्णन ॥
सूत उवाच- प्रत्याहारं प्रवक्ष्यामि परस्यान्ते स्वयंभुवः । ब्रह्मणः स्थितिकाले तु क्षीणे तस्मिंस्तदा प्रभोः ॥१ यथेदं कुरुते व्यक्तं सुसूक्ष्मं विश्वमीश्वरः । अव्यक्तं ग्रसते व्यक्तं प्रत्याहारे च कृत्स्नशः ॥२ पुरांतद्व्यणुकाद्यानां संपूर्णे कल्पसंक्षये । उपस्थिते महाघोरे ह्यप्रत्यक्षे तु कस्याचित् ॥३ अन्ते द्रुमस्य संप्राप्ते पश्चिमस्य मनोस्तदा । अंते कलियुगे तस्मिन्क्षीणे संहार उच्यते ॥४ सम्प्राप्ते तदा वृत्ते प्रत्याहारे ह्युपस्थिते । प्रत्याहारे तदा तस्मिन्भूततन्मात्रसंक्षये ॥५ महदादिविकारस्य विशेषांतस्य संक्षये । स्वभावकारिते तस्मिन्प्रवृत्ते संचरे ॥६ आपो ग्रसन्ति वै पूर्वं भूमेर्गन्धात्मकं गुणम् । आत्तगंधा ततो भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते ॥७
श्री सूतजी ने कहा—पर के अन्त में स्वयंभू का प्रत्याहार मैं कहूँगा। प्रभु ब्रह्मा के स्थिति के काल में और उस समय में उसके क्षीण हो जाने पर ।१। जैसे ईश्वर इस सुसूक्ष्म व्यक्त विश्व की रचना करता है। प्रत्याहार के समय में इस अव्यक्त को व्यक्त ग्रस लिया करता है और पूर्णतया यह ग्रस्त हो जाता है ।२। पुरान्त द्वयणुक आदि का सम्पूर्ण कल्प संक्षय होने पर ।३। अन्त में उस समय में पश्चिम द्रुम मनु के सम्प्राप्त होने पर अन्त में उस कलियुग के क्षीण हो जाने पर संहार कहा जाता है ।४। उस समय में वृत्त के संक्षाल होने पर और प्रत्याहार के उपस्थित होने पर उस काल में प्रत्याहार में भूतों और तन्मात्राओं का संक्षय हो जाता है ।५। महत् तत्त्व आदि जो प्रकृति के विकार हैं विशेषान्त पर्यन्त सबका संक्षय हो जाता है। यह सभी कुछ स्वभाव से ही किया जाता है तब वह प्रति सञ्चर
[ प्रतिसर्ग वर्णन ] । १११
प्रवृत होता है ।६। सर्व प्रथम जल भूमि का जो विशेष गुण गन्ध है उसको ग्रस लिया करते हैं । इसके अनन्तर गन्ध हीन भूमि प्रलय को ही प्राप्त हो जाया करती है ।७।
प्रणष्टे गंधतन्मात्रे तोयावस्था धरा भवेत् ।
आपस्तदा प्रविष्टास्तु वेगवत्यो महास्वनाः ॥८
सर्वमापूरयित्वेदं तिष्ठंति विचरंति च ।
अपामपि गुणो यस्तु ज्योतिः ष्वालीयते रसः ॥६
नश्यंत्यापस्तदा तत्र रसतन्मात्रसंक्षयात् ।
तीव्रतेजोहतरसा ज्योतिष्ट्वं प्राप्नुवंत्युत ॥१०
ग्रस्ते च सलिले तेजः सर्वतोमुखमीक्षते ।
अथाग्निः सर्वतो व्याप्त आदत्ते तज्जलं तदा ॥११
सर्वमापूर्यतेऽर्चिभिस्तदा जगदिदं शनैः ।
अर्चिभिः संततो तस्मिस्तिर्यगूर्ध्वमधस्ततः ॥१२
ज्योतिषोऽपि गुणं रूपं वायुरत्ति प्रकाशकम् ।
प्रलीयते तदा तस्मिन्दीपार्चिरिव मारुते ॥१३
प्रणष्टे रूपतन्मात्रे हतरूपो विभावसुः ।
उपशाम्यति तेजो हि वायुराधूयते महान् ॥१४
गन्ध की तन्मात्रा जब प्रणष्ट हो जाती है तो यह समस्त पृथ्वी जल की ही अवस्था वाली हो जाया करती है और भूमि का अस्तित्व ही सर्वथा लुप्त हो जाता है । उस समय में यह जल बड़े भीषण घोष और वेग से समन्वित होकर प्रविष्ट हो जाया करते हैं ।८। ये जल सबको आपूरित करके ही स्थित हो जाया करते हैं तथा विचरण किया करते हैं । फिर जल का जो विशेष गुण रस है वह तेज में लीन हो जाता है ।६। जब रस की तन्मात्रा का विनाश हो जाता करता है । तेज की तीव्रता से जल के रस के अपहृत हो जाने पर वह जल तेज के ही स्वरूप को प्राप्त हो जाया करता है ।१०। तेज के द्वारा जल के ग्रस्त हो जाने पर वही तेज सभी ओर दिखाई दिया करता है । इसके पश्चात् सभी ओर व्याप्त हुआ अग्नि उस समय में
११२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
उस जल को अपने ही स्वरूप ले लेता है ।११। धीरे-धीरे यह सब जगत् अग्नि (तेज) की ज्वालाओं से सम्पूरित हो जाता है । वे सब अर्चियाँ ऊपर-नीचे और तिरछी और सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं ।१२। इस तेज का विशेष गुण रूप होता है जो कि इसका प्रकाश करने वाला है । इस रूप को वायु भक्षण कर जाता है । उस समय में वह तेज की ज्वालाओं वायु में दीप की शिखा के ही समान प्रलीन हो जाया करती है । जब रूप की तन्मात्रा विनष्ट हो जाती है तो वह अग्नि रूप से रहित हो जाता है । तेज तो फिर उपशान्त हो जाता है और केवल वायु ही महान् स्वरूप को धारण करके धूम धाम से सर्वत्र वहन किया करता है ।१३-१४।
निरालोके तदा लोके वायुभूते च तेजसि । ततस्तु मूलमासाद्य वायुः संबंधमात्मनः ।।१५ ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश । वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते च तत् ।।१६ प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु निष्ट्यनावृतम् । अरूपमरसस्पर्शमगन्धं न च मूर्तिमत् ।।१७ सर्वमापूरयञ्छब्दैः सुमहत्तत्प्रकाशते । तस्मिँल्लीने तदा शिष्टमाकाशं शब्दलक्षणम् ।।१८ शब्दमात्रं तदाऽकाशं सर्वमावृत्य तिष्ठति । तत्र शब्दं गुणं तस्य भूतादिर्ग्रसते पुनः ।।१६ भूतेंद्रियेषु युगपद्भूतादौ संस्थितेषु वै । अभिमानात्मको ह्येष भूतादिस्तामसः स्मृतः ।।२० भूतादिग्रंसते चापि महान्वै बुद्धिलक्षणः । महानात्मा तु विज्ञेयः संकल्पो व्यवसायकः ।।२१
तेज को जब वायु ने ग्रस लिया था तो प्रकाशक रूप के अभाव होने से लोक में आलोक सर्वथा नहीं रहा था क्योंकि तेज तो वायु के ही रूप में लीन हो गया था । इसके पश्चात् वायु अपने सम्बन्ध भूत को प्राप्त करके ।१५। वह वायु ऊपर नीचे और इधर-उधर सर्वत्र दश दिशाओं में प्रकम्पित किया करता है । इस वायु का विशेष गुण स्पर्श होता है उस स्पर्श को
प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११३
आकाश ग्रस लिया करता है ।१६। उस समय में वायु भी अस्तित्व खोकर प्रशान्त हो जाता है और केवल आकाश ही अनावृत होकर स्थित रहा करता है । न तो इसके रूप है और न रस-स्पर्श-गन्ध तथा मूर्त्ति हैं । ऐसा आकाश रहा करता है ।१७। आकाश का विशेष गुण शब्द है । वह इसी से सबको पूरित करके बहुत विशाल दिखाई देता है । तात्पर्य यही है कि इसी का अस्तित्व होता है । वायु में भी लीन होने पर केवल अवशिष्ट आकाश ही होता है जिसका लक्षण ही शब्द होता है ।१८। उस समय में केवल शब्द ही जिसमें शेष रह गया था ऐसा आकाश सबको ढककर स्थित था । वहाँ पर जो उसका गुण शब्द था उसको भूतादि ग्रस लेते हैं ।१९। भूतेन्द्रियों में एक साथ भूतादि के संस्थित होने पर यह अभिमान के ही स्वरूप वाला भूतादि तमस कहा गया है ।२०। बुद्धि के लक्षण वाला यह महान् भूतादि का ग्रसन कर लेता है, महान् के स्वरूप वाला यह व्यवसाय करने वाला सङ्कल्प ही समझ लेना चाहिए ।२१।
बुद्धिर्मनश्च लिंगं च महानक्षर एव च । पर्यायवाचकैः शब्दैस्तमाहुस्तत्त्वचिंतकाः ॥२२ संप्रलीनेषु भूतेषु गुणसाम्ये ततो महान् । लीयते गुणसाम्यं तु स्वात्मन्येवावतिष्ठते ॥२३ लीयन्ते सर्वभूतानां कारणानि प्रसंगमे । इत्येष संयमश्चैव तत्त्वानां कारणैः सह ॥२४ तत्त्वप्रसंयमो ह्येष स्मृतो ह्यावर्तको द्विजाः । धर्माधर्मौ तपो ज्ञानं शुभं सत्यानृते तथा ॥२५ ऊर्ध्वभावो ह्यधोभावः सुखदुःखे प्रियाप्रिये । सर्वमेतत्प्रपंचस्थं गुणमात्रात्मकं स्मृतम् ॥२६ निरिन्द्रियाणां च तदा ज्ञानिनां तच्छुभाशुभम् । प्रकृत्यां चैव तत्सर्वं पुण्यं पापं प्रतिष्ठति ॥२७ यात्यवस्था तु स चैव देहिनां तु निरुच्यते । जंतूना पापपुण्यं तु प्रकृतौ यत्प्रतिष्ठितम् ॥२८
११४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जो तत्वों का चिन्तन करने वाले महा मनीषी हैं वे उसको बुद्धि-मन-लिङ्ग-महान् और अक्षर-इन पर्याय वाचक शब्दों के द्वारा कहा करते हैं ।२२। जब ये सब भूतादिक भली भांति से प्रलीन हो जाया करते हैं तब गुणों की (सत्त्व-रज-तम) समता हो जाती है और उस में वह गुणों का साम्य लीन हो जाता है तथा अपने ही स्वरूप में अवस्थित रहा करता है ।२३। समस्त भूतों के कारण प्रसङ्ग में लीन हो जाया करते हैं। यही तत्त्वों का कारणों के साथ संयम होता है ।२४। हे द्विजो ! यह तत्त्वों का प्रसंयम आवर्त्तक कहा गया है। धर्म और अधर्म, शुभ ज्ञान, सत्य और मिथ्या-ऊर्ध्वभाव और अधोभाव-सुख और दुःख-प्रिय और अप्रिय-यह सभी कुछ प्रपञ्च में स्थित गुणमात्र के स्वरूप वाला कहा गया है ।२५-२६। बिना इन्द्रियों वाले ज्ञानियों का उस समय में जो भी शुभ और अशुभ कर्म है वह सब पुण्य और पाप प्रकृति में प्रतिष्ठित होता है ।२७। और यही अवस्था होती है जो देह धारियों की कही जाया करती है और जन्तुओं का जो भी कुछ पुण्य और पाप है वह प्रकृति में प्रतिष्ठित होता है ।२८।
अवस्थास्थानि तान्येव पुण्यपापानि जंतवः ।
योजयंति पुनर्देहान्परत्वेन तथैव च ॥२६
धर्माधर्मै तु जंतूनां गुणमात्रात्मकावुभौ ।
कारणैः स्वैः प्रचीयेते कार्यत्वेन जंतुभिः ॥३०
सचेतनाः प्रलीयंत क्षेत्रज्ञाधिष्ठिता गुणाः ।
सर्गे च प्रतिसर्गे च संसारे चैव जंतवः ॥३१
संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते कारणैः संचरंति च ।
राजसी तामसी चैव सात्विकी चैव वृत्तयः ॥३२
गुणमात्राः प्रवर्तन्ते पुरुषाधिष्ठितास्त्रिधा ।
उद्ध्वंदेशात्मकं सत्त्वमधोभागात्मकं तमः ॥३३
तयोः प्रवर्त्तकं मध्ये इहैवावर्त्तकं रजः ।
इत्येवं परिवर्तन्ते त्रयश्चेतोगुणात्मकाः ॥३४
लोकेषु सर्वभूतानां तन्न कार्यं विजानता ।
अविद्याप्रत्ययारंभा आरभ्यन्ते हि मानवैः ॥३५
प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११५
उस अवस्था में स्थित हो वे ही सब पाप और पुण्य जन्तुओं को पुनः परत्व से उसी प्रकार से देहों के साथ योजित किया करते हैं अर्थात् उन्हीं पुण्य पापों के अनुसार जीव देहों को प्राप्त किया करते हैं ।२६। जीवों के धर्म और अधर्म दोनों ही गुण मात्रों के स्वरूप वाले होते हैं । जन्तुओं के द्वारा अपने ही कारणों से कार्य के रूप में परिणत होकर बढ़ जाया करते हैं ।३०। क्षेत्रज्ञ (आत्मा) में अधिष्ठित गुण चेतन के सहित धलीन होते हैं । इस संसार में सर्ग में सब जन्तु होते हैं ।३१। राजसी तामसी और सात्त्विकी वृत्तियाँ संयुक्त होती हैं—वियुक्त होती हैं और कारणों के द्वारा सञ्चरण किया करती हैं ।३२। पुरुषों में अधिष्ठित केवल गुण ही प्रवृत्त हुआ करते हैं और तीन प्रकार से होते हैं । ऊर्ध्व दशात्मक सत्त्व है—और अधोभागात्मक तम है ।३३। इन दोनों का मध्य प्रवर्त्तक रजोगुण चेत इसी रीति से यहाँ पर है और ये तीनों परिवर्तित हुआ करते हैं ।३४। लोकों में समस्त भूतों के कार्य को जानने वाले को वह नहीं करना चाहिए । मानवों के द्वारा अविद्या के विश्वास से ही सभी का आरम्भ किया जाया करता है । तात्पर्य यही है कि सबका आरम्भ अविद्या के ही विश्वास से हुआ करता है ।३५।
एतास्तु गतयस्तिस्रः शुभात्पापात्मिकाः स्मृताः ।
तमसोऽभिभवाज्जंतुर्यथातथ्यं न विदति ॥३६
अतत्त्वदर्शनात्सोऽथ विविधं बध्यते ततः ।
प्राकृतेन च बन्धेन तथावैकारिकेण च ॥३७
दक्षिणाभिस्तृतीयेन बद्धोऽत्यंतं विवर्त्तते ।
इत्येते वै त्रयः प्रोक्ता बंधा ह्यज्ञानहेतुकाः ॥३८
अनित्ये नित्यसंज्ञा च दुःखे च सुखदर्शनम् ।
अस्वे स्वमिति च ज्ञानमशुचौ शुचिनिश्चयः ॥३९
येषामेते मनोदोषा ज्ञानदोषा विपर्ययात् ।
रागद्वेषनिवृत्तिश्च तज्ज्ञानं समुदाहृतम् ॥४०
अज्ञानं तमसो मूलं कर्मद्वयफलं रजः ।
कर्मजस्तु पुनर्देहो महादुःखं प्रवर्त्तते ॥४१
श्रोत्रजा नेत्रजा चैव त्वग्जिह्वाघ्राणजा तथा ।
पुनर्भवकरी दुःखात्कर्मणा जायते तृषा ॥४२
११६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ये तीन ही गतियां होती हैं जो शुभ और पापात्मिक कही गयी हैं। तमोगुण से अभिभूत होकर यह जीवात्मा यथार्थता को प्राप्त नहीं हुआ करता है। ३६। तत्व के दर्शन न करने से ही वह जीवात्मा यहाँ पर अनेक प्रकार से बद्ध हो जाया करता है। वह बन्धन तत्व वैकारिक और प्राकृत है। ३७। तृतीय दक्षिणों में बद्ध हुआ यह अत्यन्त ही विवर्त्तित हो जाता है। ये ही तीन इस जीवात्मा के बन्धन होते हैं जो केवल अज्ञान के ही कारण से हुआ करते हैं। ३८। यह जीवात्मा जो वस्तु अनित्य है उनमें नित्य होने का ज्ञान रखता है जो कि सर्वथा गलत है। जो दुःखमय है उसमें ही सुख का दर्शन किया करता है। जो वस्तुतः अपना नहीं है उसको ही अपना समझता है और जो वास्तव में अशुचि अर्थात् अपवित्र है उसको पवित्र जानता है। ३६। ज्ञान की विपरीतता होने ही से ये सब दोष समुत्पन्न हुआ करते हैं और जिनमें ये होते हैं वे सब उनके मन के ही दोष हैं। जिसके मन में सांसारिक वस्तुओं के प्रति राग द्वेष की निवृत्ति होती है, उसी का नाम ज्ञान कहा गया है, किन्तु वास्तविक रूप से ऐसा होता नहीं है, दिखाने और कहने को भले ही कोई कुछ भी किया करे। ४०। यह अज्ञान जो होता है उसका मूल तमोगुण की ही अधिकता है। ज्ञान का होना और अज्ञान का जमा रहना ये दोनों ही रजोगुण का परिणाम हैं। सभी जानते हैं कि कुछ भी साथ नहीं जाता है फिर भी सांसारिक वस्तुओं में प्रबल मोह नहीं छूटता है। यह देह तो कर्मों ही से प्राप्त होता है और फिर भी वही अज्ञान इसमें भरा ही रहता है तो यह महान् दुःख का भागी होता है। ४१। विषयों के प्रति बड़ी भारी तृषा बनी रहती है। यही तृषा पुनः संसार में फँसाये रखने वाली होती है जो कर्मों के कारण दुःख से होती है। कानों में समुत्पन्न—नेत्रों से सम्भूत-त्वचा, रसना और नासिका से उत्पन्न यह विषयों के आस्वादन की पिपासा हुआ करती है। ४२।
सतृष्णोऽभिहितो बालः स्वकृतैः कर्मणः फलैः ।
तैंलपीडकवज्जीवस्तत्रैव परिवर्त्तते ॥४३
तस्मान्मूलमनर्थानामज्ञानमुपदिश्यते ।
तं शत्रुमवधार्यैकं ज्ञाने यत्नं समाचरेत् ॥४४
ज्ञानाद्धि त्यजते सर्व त्यागाद्बुद्धिर्विरज्यते ।
वैराग्याच्छुध्यते चापि शुद्धः सत्त्वेन मुच्यते ॥४५
प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११७
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि रागं भूतापहारिणम् ।
अभिष्वंग्राय योगः स्याद्विषयेष्ववशात्मनः ॥४६
अनिष्टमिष्टमप्रीतिप्रीतितापविषादनम् ।
दुःखलाभे न तापश्च सुखानुस्मरणं तथा ॥४७
इत्येष वैषयो रागः संभूत्याः कारणं स्मृतः ।
ब्रह्मादौ स्थावरांते वै संसारे ह्याधिभौतिके ॥४८
अज्ञानपूर्वकं तस्मादज्ञानं तु विवर्जयेत् ।
यस्य चार्षं न प्रमाणं शिष्टाचारं तथैव च ॥४९
बाल तृष्णा के सहित होता है और अपने ही द्वारा किये हुए कर्मों के फलों से तेल पीड़क की भाँति उसी में परिवर्त्तित हुआ करता है अर्थात् जैसे तेल निकालने की घानी में कोई फिरता है उसी तरह से इस संसार के चक्र में जीव घूमा करता है ।४३। इस कारण से अनर्थों का मूल अज्ञान ही बताया जाया करता है । उसी एक अज्ञान को अपना शत्रु मानकर ज्ञान के प्राप्त करने में ही पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए ।४४। मन से सब कुछ का त्याग किया जाता है और त्याग जब होता है तो उस त्याग से बुद्धि में वैराग्य हो जाया करता है अर्थात् फिर संसार की सभी वस्तु सार हीन और हेय प्रतीत हुआ करती हैं । वैराग्य से शुद्धि हो जाया करती है तथा शुद्ध सत्व से युक्त हो जाता है ।४५। अब इसके आगे हम उस राग के विषय में बतलायेंगे जो भूतों का अपहरण करने वाला होता है, विषयों में अवश आत्मा वाले का अभिष्वङ्ग के लिए योग हुआ करता है ।४६। अनिष्ट-इष्ट-अप्रीति-प्रीति-ताप-विषाद-दुःखों के लाभ में ताप होता है और सुखों का अनुस्मरण नहीं हुआ करता है ।४७। इतना यही विषयों में रहने वाला राग है और संभूति कारण यही राग बताया गया है । जो ब्रह्मा से आदि लेकर स्थावर पर्यन्त इस आधिभौतिक संसार में होता है ।४८। यह सब अज्ञान पूर्वक अर्थात् अज्ञान से ही होता है । इस कारण से अज्ञान को परिवर्जित कर देना चाहिए । जिसका आर्षग्रन्थों में कोई प्रमाण नहीं है और जो शिष्ट पुरुषों का आचरण भी नहीं है ।४९।
वर्णाश्रमविरुद्धो यः शिष्टशास्त्रविरोधकः ।
एष मार्गो हि निरये तिर्यग्योनौ च कारणम् ॥५०
११८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तिर्य्यग्योनियतं चैव कारणं तन्त्रिरुच्यते । त्रिविधो यातनास्थाने तिर्य्य योनौ च षड्विधे ॥५१ कारणे विषये चैव प्रतिघातस्तु सर्वशः । अनैश्वर्य्यं तु तत्सर्वं प्रतिघातात्मकं स्मृतम् ॥५२ इत्येषा तामसी वृत्तिर्भूतादीनां चतुर्विधा । सत्वस्थमात्रकं चित्तं यथासत्वं प्रदर्शनात् ॥५३ तत्वानां च यथातत्वं दृष्ट्वा वै तत्वदर्शनात् । सत्वक्षेत्रज्ञनानात्वमेतन्नानार्थदर्शनम् ॥५४ नानात्वदर्शनं ज्ञानं ज्ञानाद्वै योग उच्यते । तेन बद्धस्य वै बंधो मोक्षो मुक्तस्य तेन च ॥५५ संसारे विनिवृत्ते तु मुक्तो लिंगेन मुच्यते । निःसंबंधो ह्यचैतन्यः स्वात्मन्येवावतिष्ठते ॥५६ जो कार्य वर्णों और आश्रमों के विरुद्ध है और जो शिष्ट शास्त्रों के विरोध करने वाला है—यह ऐसा ही मार्ग है जिसमें गमन करने वाला नरक में जाता है और तिर्यग् योनि में प्राप्त होने का भी यही कारण होता है। ।५०। तिर्यग् योनि में रहने वाला जो कारण है वह तीन कहे जाते हैं। यातना स्थान में तीन प्रकार का है और छै प्रकार का तिर्यग् योनि में होता है ।५१। कारण में और विषय में सभी ओर प्रतिघात है। वह सब अनैश्वर्य प्रतिघात है। यह सब अनैश्वर्य प्रतिघात के स्वरूप वाला कहा गया है। ।५२। यह इस प्रकार से भूतादिक की तामसी वृत्ति चार प्रकार की होती है। चित्त सत्वस्थ मात्रक होता है तथा सत्व प्रदर्शन से होता है यथा सत्व प्रदर्शन से होता है ।५३। और तत्वों का यथा तत्व देखकर तत्व प्रदर्शन से होता है। तत्व—क्षेत्रज्ञ का नानात्व जो है यही नानार्थ प्रदर्शन हैं ।५४। नानात्व का दर्शन ज्ञान है और ज्ञान से योग कहा जाया करता है उससे बद्ध का बन्ध और मुक्त का मोक्ष भी उसी से होता है ।५५। इस संसार के विशेष निवृत्त होने पर लिङ्ग से मुक्त हो जाया करता है। निःसम्बन्ध अचैतन्य अपनी ही आत्मा में अवस्थित होता है ।५६।
स्वात्मन्यवस्थितश्चापि विरूपाख्येन लिख्यते । इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं समासाज्ज्ञानमोक्षयोः ॥५७
प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११६
स चापि त्रिविधः प्रोक्तो मोक्षो वै तत्वदर्शिभिः। पूर्वं वियोगो ज्ञानेन द्वितीये रागसंक्षयात् ॥५८ तृष्णाक्षयात्तृतीयस्तु व्याख्यातं मोक्षकारणम् । लिंगाभावात्तु कैवल्यं कैवल्यात् निरंजनम् ॥५९ निरंजनत्वाच्छुद्धस्तु नेताऽन्यो नैव विद्यते । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वैराग्यं दोषदर्शनात् ॥६० दिव्ये च मानुषे चैव विषये पंचलक्षणे । अप्रद्वेषोऽनभिष्वंगः कर्त्तव्यो दोषदर्शनात् ॥६१ तापप्रीतिविषादानां कार्यं तु परिवर्जनम् । एवं वैराग्यमास्थाय शरीरी निर्ममो भवेत् ॥६२ अनित्यमशिवं दुःखमिति बुद्ध्यानुचिंत्य च । विशुद्धं कार्यकरणं सत्त्वस्यातिनिषेवया ॥६३
वह अपने ही स्वरूप में अवस्थित होता हुआ भी विरूपात्मा के द्वारा लिखा जाता है। यह इतना ही संक्षेप से ज्ञान और मोक्ष का लक्षण कहा गया है ।५७। वह मोक्ष भी तत्व दर्शियों के द्वारा तीन प्रकार का कहा गया है। पूर्व ज्ञान वियोग—दूसरे में राग का संक्षय से होता है ।५८। तृष्णा के क्षय से तीसरा मोक्ष का कारण कहा गया है। लिङ्ग के अभाव से कैवल्य होता है और कैवल्य से निरञ्जन होता है। निरञ्जनत्व होने से शुद्ध होता है। अन्य कोई भी नेता नहीं होता है। इसके आगे हम दोषों के देखने से जो वैराग्य होता है उसको बतलायेंगे ।५९-६०। दिव्य और मानुष पांच लक्षणों वाला विषय है उसमें अप्रद्वेष और अनभिष्वङ्ग दोषों के देखने से करना चाहिए ।६१। ताप प्रीति और विष आदि का अच्छी तरह से परिवर्जन कर देना चाहिए। उस तरह से वैराग्य में समास्थित होकर यह शरीरधारी ममता से रहित हो जाया करता है ।६२। बुद्धि से ऐसा अनुचिन्तन करना चाहिए कि यह दुःख अनित्य और अशिव है। सत्व की ही अति-निषेवा से सर्वथा परम विशुद्ध कार्यों को करे ।६३।
परिपक्वकषायो हि कृत्स्नान्दोषान्प्रपश्यति । ततः प्रयाणकाले हि दोषैर्नैमित्तिकैस्तथा ॥६४