संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउसी को दिन कहा गया है । इसी रीति से इनका अहोरात्र क्रम से परिव- र्तित हुआ करता है ।२३५। यह आभूत संप्लव प्रभु का अहोरात्र कहा गया है । इन तीनों लोकों में जो भी प्राणी हैं वे सभी गतिमान् और ध्रुव हैं ।२३६। जितने भी भूत हैं वे सभी प्रलीन होते हैं इसी कारण से इसका नाम आभूत संप्लव होता है । जो व्यतीत हो चुके हैं—जो भी वर्त्तमान हैं और जो प्रजा अनागत हैं और परार्ध से गुणी वृत हैं । परार्ध द्विगुण है और यही परम आयु कीर्तित की गयी है ।२३७-२३८।
एतावान्स्थितिकालस्तु ह्यजस्येह प्रजापतेः । स्थित्यंतं प्रतिसर्गंश्च ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ॥२३६
यथा वायुप्रगेन दीपार्चिरुपशाम्यति । तथैव प्रतिसर्गेण ब्रह्मा समुपशाम्यति ॥२४०
तथा स्वप्रतिसंसृष्टे महादादौ महेश्वरे । महत्प्रलीयते व्यक्तो गुणसाम्यं ततो भवेत् ॥२४१
इत्येष वः समाख्यातो मया ह्याभूतसंप्लवः । ब्रह्मनैमित्तिको हष संप्रक्षालनसंयमः । समासेन समाख्यातो भूयः किं वर्णयामि वः ॥२४२
य इदं धारयेन्नित्यं शृणुयाद्वाप्यभीक्ष्णशः । कीर्त्तयेद्वर्णयेष्टापि महतीं सिद्धिमाप्नुयात् ॥२४३
उस अजन्मा प्रजापति का इतना ही स्थिति का काल होता है । उस परमेष्ठी ब्रह्माजी का स्थिति का अन्त और प्रति सर्ग होता है ।२३६। जिस प्रकार से वायु के प्रवेग से दीप की शिखा उपशान्त हो जाया करते हैं ।२४० उसी भाँति महदादि महेश्वर के अपने प्रति संसृष्ट होने पर महिमा है । जो भी कोई इसको नित्य धारण किया करता है अथवा इसका बारम्बार श्रवण किया करता है अथवा इसका कीर्त्तन किया करता है या वर्णन करता है वह मानव बड़ी भारी सिद्धि को प्राप्त कर लेता है ।२४३।
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