संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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॥ प्रतिसर्ग वर्णन ॥
सूत उवाच- प्रत्याहारं प्रवक्ष्यामि परस्यान्ते स्वयंभुवः । ब्रह्मणः स्थितिकाले तु क्षीणे तस्मिंस्तदा प्रभोः ॥१ यथेदं कुरुते व्यक्तं सुसूक्ष्मं विश्वमीश्वरः । अव्यक्तं ग्रसते व्यक्तं प्रत्याहारे च कृत्स्नशः ॥२ पुरांतद्व्यणुकाद्यानां संपूर्णे कल्पसंक्षये । उपस्थिते महाघोरे ह्यप्रत्यक्षे तु कस्याचित् ॥३ अन्ते द्रुमस्य संप्राप्ते पश्चिमस्य मनोस्तदा । अंते कलियुगे तस्मिन्क्षीणे संहार उच्यते ॥४ सम्प्राप्ते तदा वृत्ते प्रत्याहारे ह्युपस्थिते । प्रत्याहारे तदा तस्मिन्भूततन्मात्रसंक्षये ॥५ महदादिविकारस्य विशेषांतस्य संक्षये । स्वभावकारिते तस्मिन्प्रवृत्ते संचरे ॥६ आपो ग्रसन्ति वै पूर्वं भूमेर्गन्धात्मकं गुणम् । आत्तगंधा ततो भूमिः प्रलयत्वाय कल्पते ॥७
श्री सूतजी ने कहा—पर के अन्त में स्वयंभू का प्रत्याहार मैं कहूँगा। प्रभु ब्रह्मा के स्थिति के काल में और उस समय में उसके क्षीण हो जाने पर ।१। जैसे ईश्वर इस सुसूक्ष्म व्यक्त विश्व की रचना करता है। प्रत्याहार के समय में इस अव्यक्त को व्यक्त ग्रस लिया करता है और पूर्णतया यह ग्रस्त हो जाता है ।२। पुरान्त द्वयणुक आदि का सम्पूर्ण कल्प संक्षय होने पर ।३। अन्त में उस समय में पश्चिम द्रुम मनु के सम्प्राप्त होने पर अन्त में उस कलियुग के क्षीण हो जाने पर संहार कहा जाता है ।४। उस समय में वृत्त के संक्षाल होने पर और प्रत्याहार के उपस्थित होने पर उस काल में प्रत्याहार में भूतों और तन्मात्राओं का संक्षय हो जाता है ।५। महत् तत्त्व आदि जो प्रकृति के विकार हैं विशेषान्त पर्यन्त सबका संक्षय हो जाता है। यह सभी कुछ स्वभाव से ही किया जाता है तब वह प्रति सञ्चर