संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 522, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें[ प्रतिसर्ग वर्णन ] । १११
प्रवृत होता है ।६। सर्व प्रथम जल भूमि का जो विशेष गुण गन्ध है उसको ग्रस लिया करते हैं । इसके अनन्तर गन्ध हीन भूमि प्रलय को ही प्राप्त हो जाया करती है ।७।
प्रणष्टे गंधतन्मात्रे तोयावस्था धरा भवेत् ।
आपस्तदा प्रविष्टास्तु वेगवत्यो महास्वनाः ॥८
सर्वमापूरयित्वेदं तिष्ठंति विचरंति च ।
अपामपि गुणो यस्तु ज्योतिः ष्वालीयते रसः ॥६
नश्यंत्यापस्तदा तत्र रसतन्मात्रसंक्षयात् ।
तीव्रतेजोहतरसा ज्योतिष्ट्वं प्राप्नुवंत्युत ॥१०
ग्रस्ते च सलिले तेजः सर्वतोमुखमीक्षते ।
अथाग्निः सर्वतो व्याप्त आदत्ते तज्जलं तदा ॥११
सर्वमापूर्यतेऽर्चिभिस्तदा जगदिदं शनैः ।
अर्चिभिः संततो तस्मिस्तिर्यगूर्ध्वमधस्ततः ॥१२
ज्योतिषोऽपि गुणं रूपं वायुरत्ति प्रकाशकम् ।
प्रलीयते तदा तस्मिन्दीपार्चिरिव मारुते ॥१३
प्रणष्टे रूपतन्मात्रे हतरूपो विभावसुः ।
उपशाम्यति तेजो हि वायुराधूयते महान् ॥१४
गन्ध की तन्मात्रा जब प्रणष्ट हो जाती है तो यह समस्त पृथ्वी जल की ही अवस्था वाली हो जाया करती है और भूमि का अस्तित्व ही सर्वथा लुप्त हो जाता है । उस समय में यह जल बड़े भीषण घोष और वेग से समन्वित होकर प्रविष्ट हो जाया करते हैं ।८। ये जल सबको आपूरित करके ही स्थित हो जाया करते हैं तथा विचरण किया करते हैं । फिर जल का जो विशेष गुण रस है वह तेज में लीन हो जाता है ।६। जब रस की तन्मात्रा का विनाश हो जाता करता है । तेज की तीव्रता से जल के रस के अपहृत हो जाने पर वह जल तेज के ही स्वरूप को प्राप्त हो जाया करता है ।१०। तेज के द्वारा जल के ग्रस्त हो जाने पर वही तेज सभी ओर दिखाई दिया करता है । इसके पश्चात् सभी ओर व्याप्त हुआ अग्नि उस समय में