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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

[ प्रतिसर्ग वर्णन ] । १११

प्रवृत होता है ।६। सर्व प्रथम जल भूमि का जो विशेष गुण गन्ध है उसको ग्रस लिया करते हैं । इसके अनन्तर गन्ध हीन भूमि प्रलय को ही प्राप्त हो जाया करती है ।७।

प्रणष्टे गंधतन्मात्रे तोयावस्था धरा भवेत् ।
आपस्तदा प्रविष्टास्तु वेगवत्यो महास्वनाः ॥८
सर्वमापूरयित्वेदं तिष्ठंति विचरंति च ।
अपामपि गुणो यस्तु ज्योतिः ष्वालीयते रसः ॥६
नश्यंत्यापस्तदा तत्र रसतन्मात्रसंक्षयात् ।
तीव्रतेजोहतरसा ज्योतिष्ट्वं प्राप्नुवंत्युत ॥१०
ग्रस्ते च सलिले तेजः सर्वतोमुखमीक्षते ।
अथाग्निः सर्वतो व्याप्त आदत्ते तज्जलं तदा ॥११
सर्वमापूर्यतेऽर्चिभिस्तदा जगदिदं शनैः ।
अर्चिभिः संततो तस्मिस्तिर्यगूर्ध्वमधस्ततः ॥१२
ज्योतिषोऽपि गुणं रूपं वायुरत्ति प्रकाशकम् ।
प्रलीयते तदा तस्मिन्दीपार्चिरिव मारुते ॥१३
प्रणष्टे रूपतन्मात्रे हतरूपो विभावसुः ।
उपशाम्यति तेजो हि वायुराधूयते महान् ॥१४

गन्ध की तन्मात्रा जब प्रणष्ट हो जाती है तो यह समस्त पृथ्वी जल की ही अवस्था वाली हो जाया करती है और भूमि का अस्तित्व ही सर्वथा लुप्त हो जाता है । उस समय में यह जल बड़े भीषण घोष और वेग से समन्वित होकर प्रविष्ट हो जाया करते हैं ।८। ये जल सबको आपूरित करके ही स्थित हो जाया करते हैं तथा विचरण किया करते हैं । फिर जल का जो विशेष गुण रस है वह तेज में लीन हो जाता है ।६। जब रस की तन्मात्रा का विनाश हो जाता करता है । तेज की तीव्रता से जल के रस के अपहृत हो जाने पर वह जल तेज के ही स्वरूप को प्राप्त हो जाया करता है ।१०। तेज के द्वारा जल के ग्रस्त हो जाने पर वही तेज सभी ओर दिखाई दिया करता है । इसके पश्चात् सभी ओर व्याप्त हुआ अग्नि उस समय में

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उस जल को अपने ही स्वरूप ले लेता है ।११। धीरे-धीरे यह सब जगत् अग्नि (तेज) की ज्वालाओं से सम्पूरित हो जाता है । वे सब अर्चियाँ ऊपर-नीचे और तिरछी और सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं ।१२। इस तेज का विशेष गुण रूप होता है जो कि इसका प्रकाश करने वाला है । इस रूप को वायु भक्षण कर जाता है । उस समय में वह तेज की ज्वालाओं वायु में दीप की शिखा के ही समान प्रलीन हो जाया करती है । जब रूप की तन्मात्रा विनष्ट हो जाती है तो वह अग्नि रूप से रहित हो जाता है । तेज तो फिर उपशान्त हो जाता है और केवल वायु ही महान् स्वरूप को धारण करके धूम धाम से सर्वत्र वहन किया करता है ।१३-१४।

निरालोके तदा लोके वायुभूते च तेजसि । ततस्तु मूलमासाद्य वायुः संबंधमात्मनः ।।१५ ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक्च दोधवीति दिशो दश । वायोरपि गुणं स्पर्शमाकाशं ग्रसते च तत् ।।१६ प्रशाम्यति तदा वायुः खं तु निष्ट्यनावृतम् । अरूपमरसस्पर्शमगन्धं न च मूर्तिमत् ।।१७ सर्वमापूरयञ्छब्दैः सुमहत्तत्प्रकाशते । तस्मिँल्लीने तदा शिष्टमाकाशं शब्दलक्षणम् ।।१८ शब्दमात्रं तदाऽकाशं सर्वमावृत्य तिष्ठति । तत्र शब्दं गुणं तस्य भूतादिर्ग्रसते पुनः ।।१६ भूतेंद्रियेषु युगपद्भूतादौ संस्थितेषु वै । अभिमानात्मको ह्येष भूतादिस्तामसः स्मृतः ।।२० भूतादिग्रंसते चापि महान्वै बुद्धिलक्षणः । महानात्मा तु विज्ञेयः संकल्पो व्यवसायकः ।।२१

तेज को जब वायु ने ग्रस लिया था तो प्रकाशक रूप के अभाव होने से लोक में आलोक सर्वथा नहीं रहा था क्योंकि तेज तो वायु के ही रूप में लीन हो गया था । इसके पश्चात् वायु अपने सम्बन्ध भूत को प्राप्त करके ।१५। वह वायु ऊपर नीचे और इधर-उधर सर्वत्र दश दिशाओं में प्रकम्पित किया करता है । इस वायु का विशेष गुण स्पर्श होता है उस स्पर्श को

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११३

आकाश ग्रस लिया करता है ।१६। उस समय में वायु भी अस्तित्व खोकर प्रशान्त हो जाता है और केवल आकाश ही अनावृत होकर स्थित रहा करता है । न तो इसके रूप है और न रस-स्पर्श-गन्ध तथा मूर्त्ति हैं । ऐसा आकाश रहा करता है ।१७। आकाश का विशेष गुण शब्द है । वह इसी से सबको पूरित करके बहुत विशाल दिखाई देता है । तात्पर्य यही है कि इसी का अस्तित्व होता है । वायु में भी लीन होने पर केवल अवशिष्ट आकाश ही होता है जिसका लक्षण ही शब्द होता है ।१८। उस समय में केवल शब्द ही जिसमें शेष रह गया था ऐसा आकाश सबको ढककर स्थित था । वहाँ पर जो उसका गुण शब्द था उसको भूतादि ग्रस लेते हैं ।१९। भूतेन्द्रियों में एक साथ भूतादि के संस्थित होने पर यह अभिमान के ही स्वरूप वाला भूतादि तमस कहा गया है ।२०। बुद्धि के लक्षण वाला यह महान् भूतादि का ग्रसन कर लेता है, महान् के स्वरूप वाला यह व्यवसाय करने वाला सङ्कल्प ही समझ लेना चाहिए ।२१।

बुद्धिर्मनश्च लिंगं च महानक्षर एव च । पर्यायवाचकैः शब्दैस्तमाहुस्तत्त्वचिंतकाः ॥२२ संप्रलीनेषु भूतेषु गुणसाम्ये ततो महान् । लीयते गुणसाम्यं तु स्वात्मन्येवावतिष्ठते ॥२३ लीयन्ते सर्वभूतानां कारणानि प्रसंगमे । इत्येष संयमश्चैव तत्त्वानां कारणैः सह ॥२४ तत्त्वप्रसंयमो ह्येष स्मृतो ह्यावर्तको द्विजाः । धर्माधर्मौ तपो ज्ञानं शुभं सत्यानृते तथा ॥२५ ऊर्ध्वभावो ह्यधोभावः सुखदुःखे प्रियाप्रिये । सर्वमेतत्प्रपंचस्थं गुणमात्रात्मकं स्मृतम् ॥२६ निरिन्द्रियाणां च तदा ज्ञानिनां तच्छुभाशुभम् । प्रकृत्यां चैव तत्सर्वं पुण्यं पापं प्रतिष्ठति ॥२७ यात्यवस्था तु स चैव देहिनां तु निरुच्यते । जंतूना पापपुण्यं तु प्रकृतौ यत्प्रतिष्ठितम् ॥२८

११४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जो तत्वों का चिन्तन करने वाले महा मनीषी हैं वे उसको बुद्धि-मन-लिङ्ग-महान् और अक्षर-इन पर्याय वाचक शब्दों के द्वारा कहा करते हैं ।२२। जब ये सब भूतादिक भली भांति से प्रलीन हो जाया करते हैं तब गुणों की (सत्त्व-रज-तम) समता हो जाती है और उस में वह गुणों का साम्य लीन हो जाता है तथा अपने ही स्वरूप में अवस्थित रहा करता है ।२३। समस्त भूतों के कारण प्रसङ्ग में लीन हो जाया करते हैं। यही तत्त्वों का कारणों के साथ संयम होता है ।२४। हे द्विजो ! यह तत्त्वों का प्रसंयम आवर्त्तक कहा गया है। धर्म और अधर्म, शुभ ज्ञान, सत्य और मिथ्या-ऊर्ध्वभाव और अधोभाव-सुख और दुःख-प्रिय और अप्रिय-यह सभी कुछ प्रपञ्च में स्थित गुणमात्र के स्वरूप वाला कहा गया है ।२५-२६। बिना इन्द्रियों वाले ज्ञानियों का उस समय में जो भी शुभ और अशुभ कर्म है वह सब पुण्य और पाप प्रकृति में प्रतिष्ठित होता है ।२७। और यही अवस्था होती है जो देह धारियों की कही जाया करती है और जन्तुओं का जो भी कुछ पुण्य और पाप है वह प्रकृति में प्रतिष्ठित होता है ।२८।

अवस्थास्थानि तान्येव पुण्यपापानि जंतवः ।
योजयंति पुनर्देहान्परत्वेन तथैव च ॥२६
धर्माधर्मै तु जंतूनां गुणमात्रात्मकावुभौ ।
कारणैः स्वैः प्रचीयेते कार्यत्वेन जंतुभिः ॥३०
सचेतनाः प्रलीयंत क्षेत्रज्ञाधिष्ठिता गुणाः ।
सर्गे च प्रतिसर्गे च संसारे चैव जंतवः ॥३१
संयुज्यन्ते वियुज्यन्ते कारणैः संचरंति च ।
राजसी तामसी चैव सात्विकी चैव वृत्तयः ॥३२
गुणमात्राः प्रवर्तन्ते पुरुषाधिष्ठितास्त्रिधा ।
उद्ध्वंदेशात्मकं सत्त्वमधोभागात्मकं तमः ॥३३
तयोः प्रवर्त्तकं मध्ये इहैवावर्त्तकं रजः ।
इत्येवं परिवर्तन्ते त्रयश्चेतोगुणात्मकाः ॥३४
लोकेषु सर्वभूतानां तन्न कार्यं विजानता ।
अविद्याप्रत्ययारंभा आरभ्यन्ते हि मानवैः ॥३५

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११५

उस अवस्था में स्थित हो वे ही सब पाप और पुण्य जन्तुओं को पुनः परत्व से उसी प्रकार से देहों के साथ योजित किया करते हैं अर्थात् उन्हीं पुण्य पापों के अनुसार जीव देहों को प्राप्त किया करते हैं ।२६। जीवों के धर्म और अधर्म दोनों ही गुण मात्रों के स्वरूप वाले होते हैं । जन्तुओं के द्वारा अपने ही कारणों से कार्य के रूप में परिणत होकर बढ़ जाया करते हैं ।३०। क्षेत्रज्ञ (आत्मा) में अधिष्ठित गुण चेतन के सहित धलीन होते हैं । इस संसार में सर्ग में सब जन्तु होते हैं ।३१। राजसी तामसी और सात्त्विकी वृत्तियाँ संयुक्त होती हैं—वियुक्त होती हैं और कारणों के द्वारा सञ्चरण किया करती हैं ।३२। पुरुषों में अधिष्ठित केवल गुण ही प्रवृत्त हुआ करते हैं और तीन प्रकार से होते हैं । ऊर्ध्व दशात्मक सत्त्व है—और अधोभागात्मक तम है ।३३। इन दोनों का मध्य प्रवर्त्तक रजोगुण चेत इसी रीति से यहाँ पर है और ये तीनों परिवर्तित हुआ करते हैं ।३४। लोकों में समस्त भूतों के कार्य को जानने वाले को वह नहीं करना चाहिए । मानवों के द्वारा अविद्या के विश्वास से ही सभी का आरम्भ किया जाया करता है । तात्पर्य यही है कि सबका आरम्भ अविद्या के ही विश्वास से हुआ करता है ।३५।

एतास्तु गतयस्तिस्रः शुभात्पापात्मिकाः स्मृताः ।
तमसोऽभिभवाज्जंतुर्यथातथ्यं न विदति ॥३६

अतत्त्वदर्शनात्सोऽथ विविधं बध्यते ततः ।
प्राकृतेन च बन्धेन तथावैकारिकेण च ॥३७

दक्षिणाभिस्तृतीयेन बद्धोऽत्यंतं विवर्त्तते ।
इत्येते वै त्रयः प्रोक्ता बंधा ह्यज्ञानहेतुकाः ॥३८

अनित्ये नित्यसंज्ञा च दुःखे च सुखदर्शनम् ।
अस्वे स्वमिति च ज्ञानमशुचौ शुचिनिश्चयः ॥३९

येषामेते मनोदोषा ज्ञानदोषा विपर्ययात् ।
रागद्वेषनिवृत्तिश्च तज्ज्ञानं समुदाहृतम् ॥४०

अज्ञानं तमसो मूलं कर्मद्वयफलं रजः ।
कर्मजस्तु पुनर्देहो महादुःखं प्रवर्त्तते ॥४१

श्रोत्रजा नेत्रजा चैव त्वग्जिह्वाघ्राणजा तथा ।
पुनर्भवकरी दुःखात्कर्मणा जायते तृषा ॥४२

११६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ये तीन ही गतियां होती हैं जो शुभ और पापात्मिक कही गयी हैं। तमोगुण से अभिभूत होकर यह जीवात्मा यथार्थता को प्राप्त नहीं हुआ करता है। ३६। तत्व के दर्शन न करने से ही वह जीवात्मा यहाँ पर अनेक प्रकार से बद्ध हो जाया करता है। वह बन्धन तत्व वैकारिक और प्राकृत है। ३७। तृतीय दक्षिणों में बद्ध हुआ यह अत्यन्त ही विवर्त्तित हो जाता है। ये ही तीन इस जीवात्मा के बन्धन होते हैं जो केवल अज्ञान के ही कारण से हुआ करते हैं। ३८। यह जीवात्मा जो वस्तु अनित्य है उनमें नित्य होने का ज्ञान रखता है जो कि सर्वथा गलत है। जो दुःखमय है उसमें ही सुख का दर्शन किया करता है। जो वस्तुतः अपना नहीं है उसको ही अपना समझता है और जो वास्तव में अशुचि अर्थात् अपवित्र है उसको पवित्र जानता है। ३६। ज्ञान की विपरीतता होने ही से ये सब दोष समुत्पन्न हुआ करते हैं और जिनमें ये होते हैं वे सब उनके मन के ही दोष हैं। जिसके मन में सांसारिक वस्तुओं के प्रति राग द्वेष की निवृत्ति होती है, उसी का नाम ज्ञान कहा गया है, किन्तु वास्तविक रूप से ऐसा होता नहीं है, दिखाने और कहने को भले ही कोई कुछ भी किया करे। ४०। यह अज्ञान जो होता है उसका मूल तमोगुण की ही अधिकता है। ज्ञान का होना और अज्ञान का जमा रहना ये दोनों ही रजोगुण का परिणाम हैं। सभी जानते हैं कि कुछ भी साथ नहीं जाता है फिर भी सांसारिक वस्तुओं में प्रबल मोह नहीं छूटता है। यह देह तो कर्मों ही से प्राप्त होता है और फिर भी वही अज्ञान इसमें भरा ही रहता है तो यह महान् दुःख का भागी होता है। ४१। विषयों के प्रति बड़ी भारी तृषा बनी रहती है। यही तृषा पुनः संसार में फँसाये रखने वाली होती है जो कर्मों के कारण दुःख से होती है। कानों में समुत्पन्न—नेत्रों से सम्भूत-त्वचा, रसना और नासिका से उत्पन्न यह विषयों के आस्वादन की पिपासा हुआ करती है। ४२।

सतृष्णोऽभिहितो बालः स्वकृतैः कर्मणः फलैः ।
तैंलपीडकवज्जीवस्तत्रैव परिवर्त्तते ॥४३
तस्मान्मूलमनर्थानामज्ञानमुपदिश्यते ।
तं शत्रुमवधार्यैकं ज्ञाने यत्नं समाचरेत् ॥४४
ज्ञानाद्धि त्यजते सर्व त्यागाद्बुद्धिर्विरज्यते ।
वैराग्याच्छुध्यते चापि शुद्धः सत्त्वेन मुच्यते ॥४५

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११७

अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि रागं भूतापहारिणम् ।
अभिष्वंग्राय योगः स्याद्विषयेष्ववशात्मनः ॥४६
अनिष्टमिष्टमप्रीतिप्रीतितापविषादनम् ।
दुःखलाभे न तापश्च सुखानुस्मरणं तथा ॥४७
इत्येष वैषयो रागः संभूत्याः कारणं स्मृतः ।
ब्रह्मादौ स्थावरांते वै संसारे ह्याधिभौतिके ॥४८
अज्ञानपूर्वकं तस्मादज्ञानं तु विवर्जयेत् ।
यस्य चार्षं न प्रमाणं शिष्टाचारं तथैव च ॥४९

बाल तृष्णा के सहित होता है और अपने ही द्वारा किये हुए कर्मों के फलों से तेल पीड़क की भाँति उसी में परिवर्त्तित हुआ करता है अर्थात् जैसे तेल निकालने की घानी में कोई फिरता है उसी तरह से इस संसार के चक्र में जीव घूमा करता है ।४३। इस कारण से अनर्थों का मूल अज्ञान ही बताया जाया करता है । उसी एक अज्ञान को अपना शत्रु मानकर ज्ञान के प्राप्त करने में ही पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए ।४४। मन से सब कुछ का त्याग किया जाता है और त्याग जब होता है तो उस त्याग से बुद्धि में वैराग्य हो जाया करता है अर्थात् फिर संसार की सभी वस्तु सार हीन और हेय प्रतीत हुआ करती हैं । वैराग्य से शुद्धि हो जाया करती है तथा शुद्ध सत्व से युक्त हो जाता है ।४५। अब इसके आगे हम उस राग के विषय में बतलायेंगे जो भूतों का अपहरण करने वाला होता है, विषयों में अवश आत्मा वाले का अभिष्वङ्ग के लिए योग हुआ करता है ।४६। अनिष्ट-इष्ट-अप्रीति-प्रीति-ताप-विषाद-दुःखों के लाभ में ताप होता है और सुखों का अनुस्मरण नहीं हुआ करता है ।४७। इतना यही विषयों में रहने वाला राग है और संभूति कारण यही राग बताया गया है । जो ब्रह्मा से आदि लेकर स्थावर पर्यन्त इस आधिभौतिक संसार में होता है ।४८। यह सब अज्ञान पूर्वक अर्थात् अज्ञान से ही होता है । इस कारण से अज्ञान को परिवर्जित कर देना चाहिए । जिसका आर्षग्रन्थों में कोई प्रमाण नहीं है और जो शिष्ट पुरुषों का आचरण भी नहीं है ।४९।

वर्णाश्रमविरुद्धो यः शिष्टशास्त्रविरोधकः ।
एष मार्गो हि निरये तिर्यग्योनौ च कारणम् ॥५०

११८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तिर्य्यग्योनियतं चैव कारणं तन्त्रिरुच्यते । त्रिविधो यातनास्थाने तिर्य्य योनौ च षड्विधे ॥५१ कारणे विषये चैव प्रतिघातस्तु सर्वशः । अनैश्वर्य्यं तु तत्सर्वं प्रतिघातात्मकं स्मृतम् ॥५२ इत्येषा तामसी वृत्तिर्भूतादीनां चतुर्विधा । सत्वस्थमात्रकं चित्तं यथासत्वं प्रदर्शनात् ॥५३ तत्वानां च यथातत्वं दृष्ट्वा वै तत्वदर्शनात् । सत्वक्षेत्रज्ञनानात्वमेतन्नानार्थदर्शनम् ॥५४ नानात्वदर्शनं ज्ञानं ज्ञानाद्वै योग उच्यते । तेन बद्धस्य वै बंधो मोक्षो मुक्तस्य तेन च ॥५५ संसारे विनिवृत्ते तु मुक्तो लिंगेन मुच्यते । निःसंबंधो ह्यचैतन्यः स्वात्मन्येवावतिष्ठते ॥५६ जो कार्य वर्णों और आश्रमों के विरुद्ध है और जो शिष्ट शास्त्रों के विरोध करने वाला है—यह ऐसा ही मार्ग है जिसमें गमन करने वाला नरक में जाता है और तिर्यग् योनि में प्राप्त होने का भी यही कारण होता है। ।५०। तिर्यग् योनि में रहने वाला जो कारण है वह तीन कहे जाते हैं। यातना स्थान में तीन प्रकार का है और छै प्रकार का तिर्यग् योनि में होता है ।५१। कारण में और विषय में सभी ओर प्रतिघात है। वह सब अनैश्वर्य प्रतिघात है। यह सब अनैश्वर्य प्रतिघात के स्वरूप वाला कहा गया है। ।५२। यह इस प्रकार से भूतादिक की तामसी वृत्ति चार प्रकार की होती है। चित्त सत्वस्थ मात्रक होता है तथा सत्व प्रदर्शन से होता है यथा सत्व प्रदर्शन से होता है ।५३। और तत्वों का यथा तत्व देखकर तत्व प्रदर्शन से होता है। तत्व—क्षेत्रज्ञ का नानात्व जो है यही नानार्थ प्रदर्शन हैं ।५४। नानात्व का दर्शन ज्ञान है और ज्ञान से योग कहा जाया करता है उससे बद्ध का बन्ध और मुक्त का मोक्ष भी उसी से होता है ।५५। इस संसार के विशेष निवृत्त होने पर लिङ्ग से मुक्त हो जाया करता है। निःसम्बन्ध अचैतन्य अपनी ही आत्मा में अवस्थित होता है ।५६।

स्वात्मन्यवस्थितश्चापि विरूपाख्येन लिख्यते । इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं समासाज्ज्ञानमोक्षयोः ॥५७

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११६

स चापि त्रिविधः प्रोक्तो मोक्षो वै तत्वदर्शिभिः। पूर्वं वियोगो ज्ञानेन द्वितीये रागसंक्षयात् ॥५८ तृष्णाक्षयात्तृतीयस्तु व्याख्यातं मोक्षकारणम् । लिंगाभावात्तु कैवल्यं कैवल्यात् निरंजनम् ॥५९ निरंजनत्वाच्छुद्धस्तु नेताऽन्यो नैव विद्यते । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वैराग्यं दोषदर्शनात् ॥६० दिव्ये च मानुषे चैव विषये पंचलक्षणे । अप्रद्वेषोऽनभिष्वंगः कर्त्तव्यो दोषदर्शनात् ॥६१ तापप्रीतिविषादानां कार्यं तु परिवर्जनम् । एवं वैराग्यमास्थाय शरीरी निर्ममो भवेत् ॥६२ अनित्यमशिवं दुःखमिति बुद्ध्यानुचिंत्य च । विशुद्धं कार्यकरणं सत्त्वस्यातिनिषेवया ॥६३

वह अपने ही स्वरूप में अवस्थित होता हुआ भी विरूपात्मा के द्वारा लिखा जाता है। यह इतना ही संक्षेप से ज्ञान और मोक्ष का लक्षण कहा गया है ।५७। वह मोक्ष भी तत्व दर्शियों के द्वारा तीन प्रकार का कहा गया है। पूर्व ज्ञान वियोग—दूसरे में राग का संक्षय से होता है ।५८। तृष्णा के क्षय से तीसरा मोक्ष का कारण कहा गया है। लिङ्ग के अभाव से कैवल्य होता है और कैवल्य से निरञ्जन होता है। निरञ्जनत्व होने से शुद्ध होता है। अन्य कोई भी नेता नहीं होता है। इसके आगे हम दोषों के देखने से जो वैराग्य होता है उसको बतलायेंगे ।५९-६०। दिव्य और मानुष पांच लक्षणों वाला विषय है उसमें अप्रद्वेष और अनभिष्वङ्ग दोषों के देखने से करना चाहिए ।६१। ताप प्रीति और विष आदि का अच्छी तरह से परिवर्जन कर देना चाहिए। उस तरह से वैराग्य में समास्थित होकर यह शरीरधारी ममता से रहित हो जाया करता है ।६२। बुद्धि से ऐसा अनुचिन्तन करना चाहिए कि यह दुःख अनित्य और अशिव है। सत्व की ही अति-निषेवा से सर्वथा परम विशुद्ध कार्यों को करे ।६३।

परिपक्वकषायो हि कृत्स्नान्दोषान्प्रपश्यति । ततः प्रयाणकाले हि दोषैर्नैमित्तिकैस्तथा ॥६४

१२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः ।
स शरीरमुपाश्रित्य कृत्स्नान्दोषान्रुणद्धि वै ॥६५
प्राणस्थानानि भिदन्हि छिन्दन्मर्माण्यतीत्य च ।
शैत्यात्प्रकुपितो वायुरूर्द्ध्वं तूत्क्रामते ततः ॥६६
स चायं सर्वभूतानां प्राणस्थानेष्ववस्थितः ।
समासात्संवृते ज्ञाने संवृत्तेषु च कर्मसु ॥६७
स जीवो नाभ्यधिष्ठानः कर्मभिः स्वैः पुराकृतैः ।
अष्टांगप्राणवृत्तिं वै स विच्यावयते पुनः ॥६८
शरीरं प्रजहन्सोंऽते निरुच्छ्वासस्ततो भवेत् ।
एवं प्राणैः परित्यक्तो मृत इत्यभिधीयते ॥६६
यथेह लोके स्वप्ने तं नीयमानमितस्ततः ।
रंजनं तद्विधेयस्य तेनान्यो न च विद्यते ॥७०

जब मनुष्य परिपक्व कषाय वाला होता है अर्थात् सांसारिक दुःखों के भोगों से परिपक्व होता है। ऐसा मनुष्य सभी दोषों का अवलोकन किया करता है। इसके अनन्तर प्रयाण के समय में नैमित्तिक दोषों से इस शरीर में तीव्र वायु से प्रेरित ऊष्मा प्रकुपित होकर शरीर में उपाश्रय ग्रहण करके समस्त दोषों का अवरोध कर दिया करता है ।६४-६५। वह प्राण के स्थानों का भेदन करता हुआ तथा मर्म स्थलों में अतिक्रमण करके उन का छेदन किया करता है और शैत्य से प्रकुपित हुआ वायु फिर ऊपर की ओर उत्क्रमण किया करता है ।६६। और वही यह समस्त प्राणियों के प्राण के स्थानों में अवस्थित होता है। संक्षेप से ज्ञान के संवृत हो जाने पर सभी कर्म भी संवृत्त हो जाते हैं ।६७। वह जीव अपने पूर्व में किये हुए कर्मों से अभ्यधिष्ठान नहीं होता है। फिर वह अष्टाङ्ग प्राण वृत्ति को भी विच्यावित कर दिया करता है ।६८। वह अन्त में इस पाञ्चभौतिक शरीर का त्याग करता हुआ फिर बिना श्वासों वाला हो जाया करता है। इस रीति से प्राणों के द्वारा परित्यक्त होता हुआ वह मानव मर गया है—यही कहा जाया करता है ।६६। जिस तरह से इस लोक में स्वप्न में इधर से उधर नीयमान होता है। उसके विधेय का रञ्जन है उससे अन्य नहीं होता है ।७०।

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ १२१

तृष्णाक्षयस्तृतीयस्तु व्याख्यातं मोक्षलक्षणम् ।
शब्दाद्ये विषये दोषद्दष्टिर्वै पञ्चलक्षणे ॥७१
अप्रद्वेषोऽनभिष्वंगः प्रीतित्यापविवर्जनम् ।
वैराग्यकारणं ह्येते प्रकृतीनां लयस्य च ॥७२
अष्टौ प्रकृतयो ज्ञेयाः पूर्वोक्ता वै यथाक्रमम् ।
अव्यक्ताद्यास्तु विज्ञेया भूतांताः प्रकृतेर्भवाः ॥७३
वर्णाश्रमाचारयुक्तः शिष्टः शास्त्राविरोधनः ।
वर्णाश्रमाणां धर्मोऽयं देवस्थानेषु कारणम् ॥७४
ब्रह्मादीनि पिशाचांतान्यष्टौ स्थानानि देवताः ।
ऐश्वर्यमणिमाद्यं हि कारणं ह्यष्टलक्षणम् ॥७५
निमित्तमप्रतीघाते दृष्टे शब्दादिलक्षणे ।
अष्टावेतानि रूपाणि प्राकृतानि यथाक्रमम् ॥७६
क्षेत्रज्ञेष्वनुसज्जंते गुणमात्रात्मकानि तु ।
प्रावृट्काले पृथग्मेघं पश्यंतीव सचक्षुषः ॥७७

तीसरा तृष्णा का क्षय है जो कि मोक्ष का लक्षण व्याख्यान किया गया है। शब्दादि पञ्च लक्षण विषय में दोष दृष्टि होती है ।७४। अप्रद्वेष-अभिष्वङ्ग-प्रीति ताप का विवर्जन ये ही प्रकृतियों का और लय का वैराग्य का कारण हैं ।७२। आठ पूर्व में वर्णित क्रमानुसार प्रकृतियाँ जाननी चाहिए। अव्यक्तादि और भूतान्त प्रकृति से उद्भूत समझने चाहिए ।७३। वर्णों ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र और आश्रमों (ब्रह्मचर्य-गार्हस्थ्य-वाणप्रस्थ-संन्यास) से समन्वित-शिष्ट और शास्त्रों का विरोध न करने वाला यह वर्णाश्रमों का देवों के स्थानों में कारण होता है ।७४। ब्रह्मा से आदि लेकर पिशाचों के अन्त पर्यन्त ये आठ स्थान ही देवता हैं। ऐश्वर्य और अणिमादि आठ लक्षण ही कारण हैं ।७५। शब्दादि के लक्षण वाले अप्रतिघात के दृष्ट होने पर निमित्त हैं। ये क्रमानुसार आठ प्राकृत रूप हैं ।७६। ये गुण मात्रात्मक क्षेत्रज्ञों में अनुसज्जित होते हैं। जिस तरह से नेत्रों वाले मनुष्य वर्षा काल में मेघ को पृथक् देखा करते हैं ।७७।

१२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पश्यंत्येवं विधाः सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषा ।
खादतश्चान्नपानानि योनीः प्रविशतस्तथा ॥७८
तिर्यगूर्ध्वमधस्ताच्च धावतोऽपि यथाक्रमम् ।
जीवः प्राणस्तथा लिंगं करणं च चतुष्टयम् ॥७६
पर्यायवाचकैः शब्दैरेकार्थैः सोऽभिलप्यते ।
व्यक्ताव्यक्तप्रमाणोऽयं स वै भुंक्ते तु कृत्स्नशः ॥८०
अव्यक्तानुग्रहांतं च क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं च यत् ।
एवं ज्ञात्वा शुचिर्भूत्वा ज्ञानाद्धै वि मुच्यते ॥८१
नष्टं चैव यथातत्वं तत्त्वानां तत्त्वदर्शने ।
यथेष्टं परिनिर्याति भिन्ने देहे सुनिर्वृते ॥८२
भिद्यते करणं चापि ह्यव्यक्तज्ञानिनस्ततः ।
मुक्तो गुणशरीरेण प्राणाद्येन तु सर्वशः ॥८३
नान्यच्छरीरमादत्ते दग्धे बीजे यथांकुरः ।
ज्ञानी च सर्वसंसारार्विज्ञशारीरमानसः ॥८४

इसी प्रकार के सिद्ध पुरुष जीव को दिव्य चक्षुके द्वारा देखा करते हैं तथा उनको जो अन्न को खाते हैं और पान किया करते हैं तथा योनियों में प्रवेश किया करते हैं ।७८। ऊपर-नीचे और तिरछा दौड़ता हुआ भी जो क्रम के ही अनुरूप उसका धावन होता है उस दशा में भी उसके जीव-प्राण-लिङ्ग ओर करण—ये चार वस्तुएं विद्यमान हैं ।७६। ये चारों पर्याय वाचक अर्थात समानार्थक हैं तो भी एकार्थ वाले शब्दों से वह अभिलषित होता है । व्यक्त और अव्यक्त प्रमाण वाला यह है और वह पूर्णतया भोगता है ।८०। अव्यक्त के अनुग्रह के अन्त वाला है और जो क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित है । इस प्रकार से ज्ञान प्राप्त करके शुचि होकर ज्ञान से ही निश्चित रूप से विमुक्ति को प्राप्त हुआ करता है ।८१। तत्वों के दर्शन में तत्व जैसे ही नष्ट होता है फिर भिन्न सुनिर्वृत्त देह में जैसा भी इष्ट हो वह परिनिर्वाण किया करता है ।८२। फिर अव्यक्त ज्ञानी का करण भी विद्यमान होता है । वह प्राणादि गुण शरीर से सब प्रकार से मुक्त ही हो जाता है ।८३। फिर वह अन्य शरीर को ग्रहण नहीं किया करता है क्योंकि जैसे जब बीज ही दग्ध हो जाता है

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ १२३

तो बीजांकुर भी समाप्त हो जाया करता है और ज्ञानी जो है वह तो सर्व संसाराविज्ञ शारीर मानस होता है अर्थात् सभी संसार के द्वारा उसका शरीर और मन अविज्ञ ही रहता ।८४।

ज्ञानाच्चतुर्दशो बुद्धः प्रकृतिस्थो निवर्त्तते । प्रकृतिं सत्यमित्याहुर्विकारोऽनृतमुच्यते ॥८५ असद्भावोऽनृतं ज्ञेयं सद्भावः सत्यमुच्यते । अनामरूपं क्षेत्रज्ञनामरूपं प्रचक्षते ॥८६ यस्मात्क्षेत्रं विजानाति तस्मात्क्षेत्रज्ञ उच्यते । क्षेत्रं प्रत्ययते यस्मात्क्षेत्रज्ञः शुभ उच्यते ॥८७ क्षेत्रज्ञः स्मर्यते तस्मात्क्षेत्रं तज्ज्ञैर्विभाष्यते । क्षेत्रं त्वत्प्रत्ययं दृष्टं क्षेत्रज्ञः प्रत्ययः सदा ॥८८ क्षपणात्कारणाच्चैव क्षतत्राणात्तथैव च । भोज्यत्वविषयत्वाच्च क्षेत्रं क्षेत्रविदो विदुः ॥८६ महदाद्यं विशेषांतं सणैरूप्यं विलक्षणम् । विकारलक्षणं तद्वं सोऽक्षरः क्षरमेति च ॥६० तमेवानुविकारं तु यस्माद्वं क्षरते पुनः । तस्माच्च कारणाच्चैव क्षरमित्यभिधीयते ॥६१

ज्ञान से चार प्रकार की दशा से बद्ध प्रकृति में स्थित निवृत्त हो जाता है । यह प्रकृति तो सत्य ही कही जाती है इस से जो भी विकार होता है वही मिथ्या बताया जाया करता है ।८५। जो असद्भाव वाला है वही अनृत समझना चाहिए और जो सद्भाव होता है वह सत्य कहा जाता है । यह क्षेत्रज्ञ नाम और रूप से रहित होता है । यह तो क्षेत्रज्ञ इसी नाम से बोला जाया करता है ।८६। क्षेत्रज्ञ इसका नाम इसीलिए होता है कि यह क्षेत्र को जानता है । जिस कारण से यह क्षेत्र को विश्वस्त मानता है इसी से क्षेत्रज्ञ परम शुभ कहा जाता है ।८७। क्षेत्रज्ञ का स्मरण किया जाता है इसी कारण से उसके ज्ञाताओं के द्वारा विभाश्यमान होता है । क्षेत्र तो त्वत्प्रत्यय वाला देखा गया है और सदा ही क्षेत्रज्ञ प्रत्यय होता है ।८८। अब यह बताते हैं कि क्षेत्र यह नाम इसका क्यों हुआ है—इसका शयन होता है

१२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एक तो यही कारण है और दूसरा कारण यह है कि क्षत का त्राणत्व वाला है । यह भोज्यत्व वाला है तथा इसमें विषय भी होता है । इसी लिये क्षेत्र के ज्ञाता इसको क्षेत्र कहा करते हैं ।५९। महत् तत्त्व से आरम्भ करके अर्थात् महत् तत्त्व जिसमें आदि है और विशेष के अन्त पर्यन्त में एक परम विल- क्षण विरूपता रहा करती है । वह विकार का लक्षण है किन्तु वह अक्षर होता है और क्षरता को प्राप्त हो जाता है ।६०। कारण यह है कि उसी अनुविकार को फिर क्षरित करता है और उसी कारण से यह क्षर—इस नाम से पुकारा जाया करता है ।६१।

संसारे नरकेभ्यश्च त्रायते पुरुषं च यत् । दुःखात्राणात्पुनश्चापि क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥६२

सुखदुःखमहंभावाद्भोज्यमित्यभिधीयते । अचेतनत्वाद्दिषयस्तद्विधर्मा विभुः स्मृतः ॥६३

न क्षीयते न क्षरति विकारप्रसृतं तु तत् । अक्षरं तेन वाप्युक्तमक्षीणत्वात्तथैव च ॥६४

यस्मात्पुर्य्यनुशेते च तस्मात्पुरुष उच्यते । पुरप्रत्ययिको यस्मात्पुरुषेत्यभिधीयते ॥६५

पुरुषं कथयस्वाथ कथितोऽज्ञैर्विभाष्यते । शुद्धो निरंजनाभासो ज्ञाता ज्ञानविवर्जितः ॥६६

अस्तिनास्तीति सोऽन्यो वा बद्धो मुक्तो गतः स्थितः । नैर्हेतुकात्वनिर्देश्यादहस्तस्मिन्न विद्यते ॥६७

शुद्धत्वान्न तु दृश्यो वै द्रष्टृत्वात्समदर्शनः । आत्मप्रत्ययकारित्वादन्यूनं वाप्यहेतुकम् ॥६८

जो इस परमाधिक दुःखमय संसार में नरकों से पुरुष का परित्राण किया करता है और फिर भी दुःखों के त्राण से इसका नाम क्षेत्र यह कहा जाता है ।६२। इसमें सुख-दुःख और अहंभाव विद्यमान रहता है अतएव इसको भोज्य—इस नाम से भी पुकारा जाया करता है । इसमें अचेतना होती है इसीलिए यह विषय है और उससे विधर्मा होता है अतएव यह न तो क्षीण होता है और न इसका क्षरण ही होता है और विकार से प्रसूत

१२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

के द्वारा उस प्रकार से आत्मा को दिया करता है। वहाँ पर प्रकृति में कारण में अपनी आत्मा में ही उपस्थित होता है ।१०१। अस्ति—नास्ति—इससे वह अन्य है अथवा यहाँ पर अथवा परलोक में फिर होता है। एकत्व है अथवा पृथक्त्व है—क्षेत्रज्ञ है अथवा पुरुष है ।१०२। वह आत्मा है या निरात्मा है। चेतन है या अचेतन है। वह कर्त्ता है या अकर्त्ता है—वह भोक्ता है या भोज्य ही है ।१०३। जहाँ पर पहुँच कर फिर वहाँ से वापिस नहीं लौटता है क्षेत्रज्ञ निरञ्जन है। उसका कोई भी आख्यान नहीं होता है इसलिये वह अवाच्य है ओर वाद के हेतुओं के द्वारा अग्राह्य है ।१०४। चिन्तन न करने के योग्य होने से वह प्रतर्क के योग्य नहीं है। अवार्य योग्य नहीं है और मन के साथ भी अप्राप्त है ।१०५।

क्षेत्रज्ञे निर्गुणे शुद्धे शान्ते क्षीणे निरंजने । व्यपेतसुखदुःखे च निरुद्धे शान्तिमागते ॥१०६ निरात्मके पुनस्तस्मिन्वाच्यावाच्यं न विद्यते । एतौ संहारविस्तारौ व्यक्ताव्यक्तौ ततः पुनः ॥१०७ सृज्यते ग्रसते चैव व्यक्तौ पर्यवतिष्ठते । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं सर्वं पुनः सर्गे प्रवर्त्तते ॥१०८ अधिष्ठानं प्रपद्येत तस्यान्ते बुद्धिपूर्वकम् । साधर्म्यवैधर्म्यकृतः संयोगो विदितस्तयोः । अनादिमांश्च संयोगो महापुरुषजः स्मृतः ॥१०९ यावच्च सर्गंप्रति सर्गकालस्तावज्जगत्तिष्ठति संनिरुध्य । पूर्वं हि तस्यैव च बुद्धिपूर्वं प्रवर्त्तते तत्पुरुषार्थमेव ॥११० एषा निसर्गप्रतिसर्गपूर्वा प्राधानिकी चेश्वरकारिता वा । अनाद्यनंता ह्यभिमानपूर्वकं वित्रासयन्ती जगदभ्युपैति ॥१११ इत्येष प्राकृतः सर्गस्तृतीयो हेतुलक्षणः । उक्तो ह्यस्मिंस्तदात्यंतं कालं ज्ञात्वा प्रमुच्यते ॥११२ इत्येष प्रतिसर्गो वस्त्रिविधः कीर्त्तितो मया । विस्तरेणानुपूर्व्या च भूयः किं वर्त्तयाम्यहम् ॥११३

ब्रह्माण्डवर्ते वर्णन ] ,। १२७

क्षेत्रज्ञ के निर्गुण-शुद्ध-शान्त-क्षीण-निरञ्जन-अपेत अर्थात् रहित सुख दुःख वाले-निरुद्ध और शान्ति को प्राप्त होने वाले और निरात्मक होने पर फिर उसमें वाच्य और अवाच्य नहीं रहता है। ये दो संहार और विस्तार और फिर व्यक्त और अव्यक्त होते हैं ।१०६-१०७। सृजन किया जाता है ग्रसन होता है और व्यक्त पर्यवस्थित होते हैं। सब क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित फिर सर्ग में प्रवृत्त हुआ करता है ।१०८। उसके अन्त में बुद्धि पूर्वक अधिष्ठान को प्रपन्न हो जाता है। उन दोनों का संयोग साधर्म्य और वैधर्म्य के द्वारा किया हुआ विदित होता है। महापुरुष से समुत्पन्न संयोग अनादिमान् कहा गया है ।१०९। और जबतक सर्ग और प्रतिसर्ग काल होता है तब तक जगत संनिरुद्ध होकर स्थित रहा करता है और उसके पूर्व में ही बुद्धिपूर्वक उसका पुरुषार्थ ही प्रवृत्त होता है ।११०। यह विसर्ग और प्रतिसर्ग पूर्व वाली प्राधानिकी अर्थात् प्रधान (प्रकृति) के द्वारा की हुई या ईश्वर की कराई हुई है। यह ऐसी है जिसका न आदि है और न अन्त ही है और यह अभिमान के साथ इस जगत को निग्रस्त करती हुई ही प्राप्त हुआ करती है ।१११। यही प्राकृत तीसरा सर्ग है जो हेतु के लक्षण वाला है। जो इसमें कहा गया है तब अत्यन्त काल का ज्ञान प्राप्त करके ही प्राणी प्रसक्त हुआ करता है ।११२। यही प्रतिसर्ग है जो तीन प्रकार का होता है जिसका वर्णन मैंने आपके सामने किया है। मैंने इसका विस्तार से और आनुपूर्वी से अर्थात् क्रम से आदि से अन्त पर्यन्त कह दिया है। अब फिर मैं क्या बताऊँ—यह बतलाइये ।११३।

—x—

ब्रह्माण्डवर्त वर्णन

ऋषय ऊचुः-
श्रुतं सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् ।
प्रजानां मनुभिः सार्द्धं देवानाम्ऋषिभिः सह ॥१
पितृगन्धर्वभूतानां पिशाचोरगरक्षसाम् ।
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणामेव पक्षिणाम् ॥२
अप्यद्भुतानि कर्माणि विविधा धर्मनिश्चयाः ।
विचित्राश्च कथायोगा जन्म चाग्र्यमनुत्तमम् ॥३

ब्रह्माण्डवर्त वर्णन ] [ १२६

पूर्ववत्स तु विज्ञेयः समासात्तन्निबोधत ।
दृष्टेनैवानुमेयं च तर्कं वक्ष्यामि युक्तितः ॥१०
यस्माद्वाचो निवर्त्तन्ते त्वप्राप्य मनसा सह ।
अव्यक्तवत्परोक्षत्वाद़गहनं तद्दुरासदम् ॥११
विकारैः प्रतिसंसृष्टो गुणः साम्येन वर्त्तते ।
प्रधानं पुरुषाणां च साधर्म्येणैव तिष्ठति ॥१२
धर्माधमौ प्रलीयेते ह्यव्यक्ते प्राणिनां सदा ।
सत्वमात्रात्मको धर्मो गुणे सत्वे प्रतिष्ठितः ॥१३
तमोमात्रात्मको धर्मो गुणे तमसि तिष्ठति ।
अविभागेन तावेतो गुणसाम्ये स्थितावुभौ ॥१४

इस सर्ग की प्रवृत्ति होने की क्या रीति होती है—यही अब हम पूछते हैं उसको आप कृपा करके हमको बतला दीजिए इस तरह से जब लोमहर्षण सूतजी से पूछा गया था तो फिर उन्होंने पुनः उस सर्ग की जैसे प्रकृति हुआ करती है उसकी व्याख्या करने का उपक्रम किया था और उन्होंने कहा था कि यहाँ पर जैसे यह सर्ग प्रवृत्त होगा—उसको मैं आप लोगों को बतलाऊँगा ।८-६। हे वत्स ! यह सब पूर्व की ही भाँति समझ लेना चाहिए । और संक्षेप से अब भी समझ लो । जो भी दृष्ट है उसी से अनुमान कर लेना चाहिए । मैं युक्ति से तर्क बतलाऊँगा ।१०। वह ऐसा विषय है जहाँ पर वाणी की पहुँच नहीं हैं और मन भी वहाँ तक नहीं पहुँचता है । वह अव्यक्त के ही समान परोक्ष है अतएव बहुत ही गहन और दुरासद है ।११। विकारों के साथ प्रति संसृष्ट होता हुआ गुण समता से रहता है । प्रधान पुरुषों के साधर्म्य से ही स्थित रहा करता है ।१२। प्राणियों के सदा धर्म और अधर्म अव्यक्त में प्रलीन हो जाते हैं । उस समय में सत्व मात्रात्मक अर्थात् केवल सत्व स्वरूप वाला धर्म सत्वगुण में प्रतिष्ठित होता है ।१३। तमो मात्रात्मक धर्म तमोगुण में प्रतिष्ठित होता है । ये दोनों ही बिना ही विभाग के गुणों की समता में स्थित रहते हैं ।१४।

सर्वं कार्यं बुद्धिपूर्वं प्रधानस्य प्रपत्स्यते ।
अबुद्धिपूर्वं क्षेत्रज्ञ अधिष्ठास्यति तान्गुणान् ॥१५

१२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्कथ्यमानमस्माकं भवता श्लक्ष्णया गिरा । मनः कर्णसुखं सूते प्रीणात्यमृतसन्निभम् ॥४ एवमाराध्य ते सूतं सत्कृत्य च महर्षयः । पप्रच्छुः सत्त्रिणः सर्वे पुनः सर्गप्रवर्त्तनम् ॥५ कथं सूत महाप्राज्ञ पुनः सर्गः प्रपत्स्यते । बन्धेषु संप्रलीनेषु गुणसाम्ये तमोमये ॥६ विकारेष्वविसृष्टेषु ह्यव्यक्ते चात्मनि स्थिते । अप्रवृत्ते ब्रह्मणा तु सहसा योज्यगैस्तदा ॥७

ऋषियों ने कहा—आपके द्वारा वर्णित यह महान आख्यान हमने सुन लिया है। इसमें मनुओं के साथ प्रजाओं का तथा ऋषियों के सहित देवों का—पितरों का—गन्धर्वों का—भूतों का—पिशाच—उरग और राक्षसों का—दैत्यों का—दानवों का—यक्षों का और पक्षियों का वर्णन है। इन सबके अत्यन्त अद्भुत कर्म हैं तथा धर्म आदि का भी निश्चय है और बहुत ही विचित्र कथा के योग हैं और अत्युत्तम तथा श्रेष्ठजन्म हैं। यह सभी का हमने भली श्रवण कर लिया है ।१-३। आपने जो भी वर्णन किया है वह बहुत ही श्रुति प्रिय सुन्दर वाणी के द्वारा किया है और हमारे मन और कानों को सुख देने वाला है तथा अमृत के ही समान प्रीणन करने वाला है ।४। उन सब महर्षियों ने सूतजी की इस रीति से आराधना करके उनका बड़ा ही सत्कार किया था। फिर उन सत्र करने वालों ने सबने पुनः सर्ग के प्रवर्त्तन के विषय में उनसे प्रश्न किया था ।५। उन्होंने कहा था—हे सूतजी ! आप तो महान् पण्डित हैं। अब हमको यही बतलाइये कि फिर इस सर्ग का प्रवर्त्तन किस प्रकार से होगा। जब ये सभी बन्धन प्रलीन हो जाते हैं और प्रकृति के तीनों गुणों में साम्यावस्था होती है और यह सर्वत्र अन्धकार से परिपूर्ण होता है। समस्त विकार अविसृष्ट होते हैं तथा अव्यक्त आत्मा में स्थित होता है। उस समय में योज्यगों के द्वारा सहसा ब्रह्माजी के अप्रवृत्त होने पर यह सर्ग कैसे होता है ।६-७।

कथं प्रपत्स्यते सर्गस्तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम् । एवमुक्तस्ततः सूतस्तदाऽसौ लोमहर्षणः ॥८ व्याख्यातुमुपचक्राम पुनः सर्गप्रवर्त्तनम् । अत्र वो वर्त्तयिष्यामि यथा सर्ग प्रपत्स्यते ॥६

१३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एवं तानभिमानेन प्रपत्स्यति पुनस्तदा । यदा प्रवर्त्तितव्यं तु क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्द्वयोः ॥१६ भोज्यभोक्तृत्वसंबंधाः प्रपत्स्यंते च तावुभौ । तस्मादक्षरमव्यक्तं साम्ये स्थित्वा गुणात्मकम् ॥१७ क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं तत्र वैषम्यं भजते तु तत् । ततः प्रपत्स्यते व्यक्तं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्द्वयोः ॥१८ क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं सत्त्वं विकारं जनयिष्यति । महदाद्यं विशेषांतं चतुर्विंशगुणात्मकम् ॥१६ क्षेत्रज्ञस्य प्रधानस्य पुरुषस्य प्रवर्त्स्यतः । आदिदेवः प्रधानस्यानुग्रहाय प्रचक्षते ॥२० अनाद्यौ बपमुत्पादौ उभौ सूक्ष्मौ तु तौ स्मृतौ । अनादिसंयोगयुक्तौ सर्वं क्षेत्रज्ञमेव च ॥२१

यह सभी कार्य बुद्धिपूर्वक प्रधान का ही होगा। यह क्षेत्रज्ञ अबुद्धिपूर्वक उन गुणों में अधिष्ठित होगा ।१५। इस प्रकार से उस समय में फिर अभिमान के साथ उनको प्राप्त होगा । जिस समय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ इन दोनों का प्रवृत्त होना चाहिए ।१६। वे दोनों ही को भोज्य और भोक्तृत्व के सम्बन्ध प्राप्त होंगे । इससे गुणात्मक अक्षर अव्यक्त समता में स्थित होता है ।१७। वहाँ पर वह क्षेत्रत्र में अधिष्ठित विषमता को प्राप्त होता है । फिर दोनों क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को व्यक्त प्राप्त होगा ।१८। क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित सत्व विकार को उत्पन्न कर देगा । वह विकार महत् तत्व से लेकर विशेष के अन्त तक चौबीस गुणों के स्वरूप वाला है ।१६। क्षेत्रज्ञ का प्रधान का और पुरुष का प्रवृत्त होंगे । जो आदि देव हैं वे प्रधान के ही ऊपर अनुग्रह करने वाले कहे जाते हैं । वे दोनों अनादि और श्रेष्ठ उत्पाद तथा सूक्ष्म कहे गये हैं ।२०-२१।

अबुद्धिपूर्वकं युक्तमशक्तौ तु वरौ तदा । अप्रत्ययममोघं च स्थितावुदकमत्स्यवत् ॥२२ प्रवृत्तपूर्वौ तौ पूर्वं पुनः सर्वं प्रपत्स्यते । अज्ञा गुणैः प्रवर्त्तन्ते रजःसत्त्वतमोऽभिधैः ॥२३

ब्रह्माण्डवर्तं वर्णन ] [ १३१

प्रवृत्तिकाले रजसाभिपन्नो महत्वभूतादिविशेषतां च ।
विशेषतां चेंद्रियतां च याति गुणावसानौषधिभिर्मनुष्यः ॥२४
सत्याभिध्यायिनस्तस्य ध्यायिनः सन्निमित्तकम् ।
रजः सत्त्वतमौव्यक्ता विधुर्माणः परस्परम् ॥२५
आद्यंतं वै प्रपत्स्यंते क्षेत्रमज्ञाम्बु सर्वशः ।
संसिद्धकार्यकरणा उत्पद्यंतेऽभिमानिनः ॥२६
सर्वे सत्त्वाः प्रपद्यंते ह्यव्यक्तात्पूर्वमेव च ।
प्राक्सृतौ ये त्वसुवहाः साधकाश्चाप्यसाधकाः ॥२७
असंशांतास्तु ते सर्वे स्थानप्रकरणैः सह ।
कार्याणि प्रतित्स्यंते उत्पत्स्यन्ते पुनः पुनः ॥२८

उस समय में अबुद्धि पूर्वक युक्त है और अशक्त पर हैं यह प्रत्यय रहित और अमोघ हैं और जल में मछली के ही समान स्थित हैं ।२२। पूर्व में वे दोनों ही पूर्व की प्रवृत्ति वाले हैं फिर सर्व को प्राप्त हो जायगा । जो अज्ञ हैं वे रज-सत्व और तम नामों वाले गुणों से प्रवृत्त हुआ करते हैं ।२३। यह मनुष्य प्रवृत्ति के समय से रजोगुण से अभिपन्न होता है और महत्वभूत आदि की विशेषता और इन्द्रियतता की विशेषता को गुणामुखी के और निमित्तों के साथ ध्यायी के ये रज-सत्व और तम पर स्वर में विधर्मी होते हुए व्यक्त होते हैं ।२४-२५। आद्यन्त सभी ओर अज्ञाम्बु क्षेत्र में प्राप्त हो जायँगे । फिर संसिद्ध कार्य और करण वाले अभिमानी उत्पन्न हुआ करते हैं ।२६। सभी सत्व अव्यक्त से पूर्व ही प्रसन्न होते हैं । पूर्व में होने वाली सृत्ति में जो भी प्राणधारी हैं वे चाहे साधक होवे या असाधक होवे ।२७। वे सभी स्थान प्रकरणों के साथ असंशान्त हैं । वे सब कार्यों को प्राप्त करेंगे और बार-बार उत्पन्न होंगे ।२८।

गुणमात्रात्मकावेव धर्माधमौ परस्परम् ।
आरप्सेते हि चान्योन्यं वरेणानुग्रहेण वा ॥२९
शवस्तुल्यप्रसृष्टश्च सर्गादौ याति विक्रियाम् ।
गुणास्तं प्रतिधीर्यते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥३०