भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः ।
स शरीरमुपाश्रित्य कृत्स्नान्दोषान्रुणद्धि वै ॥६५
प्राणस्थानानि भिदन्हि छिन्दन्मर्माण्यतीत्य च ।
शैत्यात्प्रकुपितो वायुरूर्द्ध्वं तूत्क्रामते ततः ॥६६
स चायं सर्वभूतानां प्राणस्थानेष्ववस्थितः ।
समासात्संवृते ज्ञाने संवृत्तेषु च कर्मसु ॥६७
स जीवो नाभ्यधिष्ठानः कर्मभिः स्वैः पुराकृतैः ।
अष्टांगप्राणवृत्तिं वै स विच्यावयते पुनः ॥६८
शरीरं प्रजहन्सोंऽते निरुच्छ्वासस्ततो भवेत् ।
एवं प्राणैः परित्यक्तो मृत इत्यभिधीयते ॥६६
यथेह लोके स्वप्ने तं नीयमानमितस्ततः ।
रंजनं तद्विधेयस्य तेनान्यो न च विद्यते ॥७०

जब मनुष्य परिपक्व कषाय वाला होता है अर्थात् सांसारिक दुःखों के भोगों से परिपक्व होता है। ऐसा मनुष्य सभी दोषों का अवलोकन किया करता है। इसके अनन्तर प्रयाण के समय में नैमित्तिक दोषों से इस शरीर में तीव्र वायु से प्रेरित ऊष्मा प्रकुपित होकर शरीर में उपाश्रय ग्रहण करके समस्त दोषों का अवरोध कर दिया करता है ।६४-६५। वह प्राण के स्थानों का भेदन करता हुआ तथा मर्म स्थलों में अतिक्रमण करके उन का छेदन किया करता है और शैत्य से प्रकुपित हुआ वायु फिर ऊपर की ओर उत्क्रमण किया करता है ।६६। और वही यह समस्त प्राणियों के प्राण के स्थानों में अवस्थित होता है। संक्षेप से ज्ञान के संवृत हो जाने पर सभी कर्म भी संवृत्त हो जाते हैं ।६७। वह जीव अपने पूर्व में किये हुए कर्मों से अभ्यधिष्ठान नहीं होता है। फिर वह अष्टाङ्ग प्राण वृत्ति को भी विच्यावित कर दिया करता है ।६८। वह अन्त में इस पाञ्चभौतिक शरीर का त्याग करता हुआ फिर बिना श्वासों वाला हो जाया करता है। इस रीति से प्राणों के द्वारा परित्यक्त होता हुआ वह मानव मर गया है—यही कहा जाया करता है ।६६। जिस तरह से इस लोक में स्वप्न में इधर से उधर नीयमान होता है। उसके विधेय का रञ्जन है उससे अन्य नहीं होता है ।७०।