संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११६
स चापि त्रिविधः प्रोक्तो मोक्षो वै तत्वदर्शिभिः। पूर्वं वियोगो ज्ञानेन द्वितीये रागसंक्षयात् ॥५८ तृष्णाक्षयात्तृतीयस्तु व्याख्यातं मोक्षकारणम् । लिंगाभावात्तु कैवल्यं कैवल्यात् निरंजनम् ॥५९ निरंजनत्वाच्छुद्धस्तु नेताऽन्यो नैव विद्यते । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वैराग्यं दोषदर्शनात् ॥६० दिव्ये च मानुषे चैव विषये पंचलक्षणे । अप्रद्वेषोऽनभिष्वंगः कर्त्तव्यो दोषदर्शनात् ॥६१ तापप्रीतिविषादानां कार्यं तु परिवर्जनम् । एवं वैराग्यमास्थाय शरीरी निर्ममो भवेत् ॥६२ अनित्यमशिवं दुःखमिति बुद्ध्यानुचिंत्य च । विशुद्धं कार्यकरणं सत्त्वस्यातिनिषेवया ॥६३
वह अपने ही स्वरूप में अवस्थित होता हुआ भी विरूपात्मा के द्वारा लिखा जाता है। यह इतना ही संक्षेप से ज्ञान और मोक्ष का लक्षण कहा गया है ।५७। वह मोक्ष भी तत्व दर्शियों के द्वारा तीन प्रकार का कहा गया है। पूर्व ज्ञान वियोग—दूसरे में राग का संक्षय से होता है ।५८। तृष्णा के क्षय से तीसरा मोक्ष का कारण कहा गया है। लिङ्ग के अभाव से कैवल्य होता है और कैवल्य से निरञ्जन होता है। निरञ्जनत्व होने से शुद्ध होता है। अन्य कोई भी नेता नहीं होता है। इसके आगे हम दोषों के देखने से जो वैराग्य होता है उसको बतलायेंगे ।५९-६०। दिव्य और मानुष पांच लक्षणों वाला विषय है उसमें अप्रद्वेष और अनभिष्वङ्ग दोषों के देखने से करना चाहिए ।६१। ताप प्रीति और विष आदि का अच्छी तरह से परिवर्जन कर देना चाहिए। उस तरह से वैराग्य में समास्थित होकर यह शरीरधारी ममता से रहित हो जाया करता है ।६२। बुद्धि से ऐसा अनुचिन्तन करना चाहिए कि यह दुःख अनित्य और अशिव है। सत्व की ही अति-निषेवा से सर्वथा परम विशुद्ध कार्यों को करे ।६३।
परिपक्वकषायो हि कृत्स्नान्दोषान्प्रपश्यति । ततः प्रयाणकाले हि दोषैर्नैमित्तिकैस्तथा ॥६४