संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तिर्य्यग्योनियतं चैव कारणं तन्त्रिरुच्यते । त्रिविधो यातनास्थाने तिर्य्य योनौ च षड्विधे ॥५१ कारणे विषये चैव प्रतिघातस्तु सर्वशः । अनैश्वर्य्यं तु तत्सर्वं प्रतिघातात्मकं स्मृतम् ॥५२ इत्येषा तामसी वृत्तिर्भूतादीनां चतुर्विधा । सत्वस्थमात्रकं चित्तं यथासत्वं प्रदर्शनात् ॥५३ तत्वानां च यथातत्वं दृष्ट्वा वै तत्वदर्शनात् । सत्वक्षेत्रज्ञनानात्वमेतन्नानार्थदर्शनम् ॥५४ नानात्वदर्शनं ज्ञानं ज्ञानाद्वै योग उच्यते । तेन बद्धस्य वै बंधो मोक्षो मुक्तस्य तेन च ॥५५ संसारे विनिवृत्ते तु मुक्तो लिंगेन मुच्यते । निःसंबंधो ह्यचैतन्यः स्वात्मन्येवावतिष्ठते ॥५६ जो कार्य वर्णों और आश्रमों के विरुद्ध है और जो शिष्ट शास्त्रों के विरोध करने वाला है—यह ऐसा ही मार्ग है जिसमें गमन करने वाला नरक में जाता है और तिर्यग् योनि में प्राप्त होने का भी यही कारण होता है। ।५०। तिर्यग् योनि में रहने वाला जो कारण है वह तीन कहे जाते हैं। यातना स्थान में तीन प्रकार का है और छै प्रकार का तिर्यग् योनि में होता है ।५१। कारण में और विषय में सभी ओर प्रतिघात है। वह सब अनैश्वर्य प्रतिघात है। यह सब अनैश्वर्य प्रतिघात के स्वरूप वाला कहा गया है। ।५२। यह इस प्रकार से भूतादिक की तामसी वृत्ति चार प्रकार की होती है। चित्त सत्वस्थ मात्रक होता है तथा सत्व प्रदर्शन से होता है यथा सत्व प्रदर्शन से होता है ।५३। और तत्वों का यथा तत्व देखकर तत्व प्रदर्शन से होता है। तत्व—क्षेत्रज्ञ का नानात्व जो है यही नानार्थ प्रदर्शन हैं ।५४। नानात्व का दर्शन ज्ञान है और ज्ञान से योग कहा जाया करता है उससे बद्ध का बन्ध और मुक्त का मोक्ष भी उसी से होता है ।५५। इस संसार के विशेष निवृत्त होने पर लिङ्ग से मुक्त हो जाया करता है। निःसम्बन्ध अचैतन्य अपनी ही आत्मा में अवस्थित होता है ।५६।
स्वात्मन्यवस्थितश्चापि विरूपाख्येन लिख्यते । इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं समासाज्ज्ञानमोक्षयोः ॥५७