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संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

११८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तिर्य्यग्योनियतं चैव कारणं तन्त्रिरुच्यते । त्रिविधो यातनास्थाने तिर्य्य योनौ च षड्विधे ॥५१ कारणे विषये चैव प्रतिघातस्तु सर्वशः । अनैश्वर्य्यं तु तत्सर्वं प्रतिघातात्मकं स्मृतम् ॥५२ इत्येषा तामसी वृत्तिर्भूतादीनां चतुर्विधा । सत्वस्थमात्रकं चित्तं यथासत्वं प्रदर्शनात् ॥५३ तत्वानां च यथातत्वं दृष्ट्वा वै तत्वदर्शनात् । सत्वक्षेत्रज्ञनानात्वमेतन्नानार्थदर्शनम् ॥५४ नानात्वदर्शनं ज्ञानं ज्ञानाद्वै योग उच्यते । तेन बद्धस्य वै बंधो मोक्षो मुक्तस्य तेन च ॥५५ संसारे विनिवृत्ते तु मुक्तो लिंगेन मुच्यते । निःसंबंधो ह्यचैतन्यः स्वात्मन्येवावतिष्ठते ॥५६ जो कार्य वर्णों और आश्रमों के विरुद्ध है और जो शिष्ट शास्त्रों के विरोध करने वाला है—यह ऐसा ही मार्ग है जिसमें गमन करने वाला नरक में जाता है और तिर्यग् योनि में प्राप्त होने का भी यही कारण होता है। ।५०। तिर्यग् योनि में रहने वाला जो कारण है वह तीन कहे जाते हैं। यातना स्थान में तीन प्रकार का है और छै प्रकार का तिर्यग् योनि में होता है ।५१। कारण में और विषय में सभी ओर प्रतिघात है। वह सब अनैश्वर्य प्रतिघात है। यह सब अनैश्वर्य प्रतिघात के स्वरूप वाला कहा गया है। ।५२। यह इस प्रकार से भूतादिक की तामसी वृत्ति चार प्रकार की होती है। चित्त सत्वस्थ मात्रक होता है तथा सत्व प्रदर्शन से होता है यथा सत्व प्रदर्शन से होता है ।५३। और तत्वों का यथा तत्व देखकर तत्व प्रदर्शन से होता है। तत्व—क्षेत्रज्ञ का नानात्व जो है यही नानार्थ प्रदर्शन हैं ।५४। नानात्व का दर्शन ज्ञान है और ज्ञान से योग कहा जाया करता है उससे बद्ध का बन्ध और मुक्त का मोक्ष भी उसी से होता है ।५५। इस संसार के विशेष निवृत्त होने पर लिङ्ग से मुक्त हो जाया करता है। निःसम्बन्ध अचैतन्य अपनी ही आत्मा में अवस्थित होता है ।५६।

स्वात्मन्यवस्थितश्चापि विरूपाख्येन लिख्यते । इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं समासाज्ज्ञानमोक्षयोः ॥५७

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ ११६

स चापि त्रिविधः प्रोक्तो मोक्षो वै तत्वदर्शिभिः। पूर्वं वियोगो ज्ञानेन द्वितीये रागसंक्षयात् ॥५८ तृष्णाक्षयात्तृतीयस्तु व्याख्यातं मोक्षकारणम् । लिंगाभावात्तु कैवल्यं कैवल्यात् निरंजनम् ॥५९ निरंजनत्वाच्छुद्धस्तु नेताऽन्यो नैव विद्यते । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वैराग्यं दोषदर्शनात् ॥६० दिव्ये च मानुषे चैव विषये पंचलक्षणे । अप्रद्वेषोऽनभिष्वंगः कर्त्तव्यो दोषदर्शनात् ॥६१ तापप्रीतिविषादानां कार्यं तु परिवर्जनम् । एवं वैराग्यमास्थाय शरीरी निर्ममो भवेत् ॥६२ अनित्यमशिवं दुःखमिति बुद्ध्यानुचिंत्य च । विशुद्धं कार्यकरणं सत्त्वस्यातिनिषेवया ॥६३

वह अपने ही स्वरूप में अवस्थित होता हुआ भी विरूपात्मा के द्वारा लिखा जाता है। यह इतना ही संक्षेप से ज्ञान और मोक्ष का लक्षण कहा गया है ।५७। वह मोक्ष भी तत्व दर्शियों के द्वारा तीन प्रकार का कहा गया है। पूर्व ज्ञान वियोग—दूसरे में राग का संक्षय से होता है ।५८। तृष्णा के क्षय से तीसरा मोक्ष का कारण कहा गया है। लिङ्ग के अभाव से कैवल्य होता है और कैवल्य से निरञ्जन होता है। निरञ्जनत्व होने से शुद्ध होता है। अन्य कोई भी नेता नहीं होता है। इसके आगे हम दोषों के देखने से जो वैराग्य होता है उसको बतलायेंगे ।५९-६०। दिव्य और मानुष पांच लक्षणों वाला विषय है उसमें अप्रद्वेष और अनभिष्वङ्ग दोषों के देखने से करना चाहिए ।६१। ताप प्रीति और विष आदि का अच्छी तरह से परिवर्जन कर देना चाहिए। उस तरह से वैराग्य में समास्थित होकर यह शरीरधारी ममता से रहित हो जाया करता है ।६२। बुद्धि से ऐसा अनुचिन्तन करना चाहिए कि यह दुःख अनित्य और अशिव है। सत्व की ही अति-निषेवा से सर्वथा परम विशुद्ध कार्यों को करे ।६३।

परिपक्वकषायो हि कृत्स्नान्दोषान्प्रपश्यति । ततः प्रयाणकाले हि दोषैर्नैमित्तिकैस्तथा ॥६४

१२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः ।
स शरीरमुपाश्रित्य कृत्स्नान्दोषान्रुणद्धि वै ॥६५
प्राणस्थानानि भिदन्हि छिन्दन्मर्माण्यतीत्य च ।
शैत्यात्प्रकुपितो वायुरूर्द्ध्वं तूत्क्रामते ततः ॥६६
स चायं सर्वभूतानां प्राणस्थानेष्ववस्थितः ।
समासात्संवृते ज्ञाने संवृत्तेषु च कर्मसु ॥६७
स जीवो नाभ्यधिष्ठानः कर्मभिः स्वैः पुराकृतैः ।
अष्टांगप्राणवृत्तिं वै स विच्यावयते पुनः ॥६८
शरीरं प्रजहन्सोंऽते निरुच्छ्वासस्ततो भवेत् ।
एवं प्राणैः परित्यक्तो मृत इत्यभिधीयते ॥६६
यथेह लोके स्वप्ने तं नीयमानमितस्ततः ।
रंजनं तद्विधेयस्य तेनान्यो न च विद्यते ॥७०

जब मनुष्य परिपक्व कषाय वाला होता है अर्थात् सांसारिक दुःखों के भोगों से परिपक्व होता है। ऐसा मनुष्य सभी दोषों का अवलोकन किया करता है। इसके अनन्तर प्रयाण के समय में नैमित्तिक दोषों से इस शरीर में तीव्र वायु से प्रेरित ऊष्मा प्रकुपित होकर शरीर में उपाश्रय ग्रहण करके समस्त दोषों का अवरोध कर दिया करता है ।६४-६५। वह प्राण के स्थानों का भेदन करता हुआ तथा मर्म स्थलों में अतिक्रमण करके उन का छेदन किया करता है और शैत्य से प्रकुपित हुआ वायु फिर ऊपर की ओर उत्क्रमण किया करता है ।६६। और वही यह समस्त प्राणियों के प्राण के स्थानों में अवस्थित होता है। संक्षेप से ज्ञान के संवृत हो जाने पर सभी कर्म भी संवृत्त हो जाते हैं ।६७। वह जीव अपने पूर्व में किये हुए कर्मों से अभ्यधिष्ठान नहीं होता है। फिर वह अष्टाङ्ग प्राण वृत्ति को भी विच्यावित कर दिया करता है ।६८। वह अन्त में इस पाञ्चभौतिक शरीर का त्याग करता हुआ फिर बिना श्वासों वाला हो जाया करता है। इस रीति से प्राणों के द्वारा परित्यक्त होता हुआ वह मानव मर गया है—यही कहा जाया करता है ।६६। जिस तरह से इस लोक में स्वप्न में इधर से उधर नीयमान होता है। उसके विधेय का रञ्जन है उससे अन्य नहीं होता है ।७०।

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ १२१

तृष्णाक्षयस्तृतीयस्तु व्याख्यातं मोक्षलक्षणम् ।
शब्दाद्ये विषये दोषद्दष्टिर्वै पञ्चलक्षणे ॥७१
अप्रद्वेषोऽनभिष्वंगः प्रीतित्यापविवर्जनम् ।
वैराग्यकारणं ह्येते प्रकृतीनां लयस्य च ॥७२
अष्टौ प्रकृतयो ज्ञेयाः पूर्वोक्ता वै यथाक्रमम् ।
अव्यक्ताद्यास्तु विज्ञेया भूतांताः प्रकृतेर्भवाः ॥७३
वर्णाश्रमाचारयुक्तः शिष्टः शास्त्राविरोधनः ।
वर्णाश्रमाणां धर्मोऽयं देवस्थानेषु कारणम् ॥७४
ब्रह्मादीनि पिशाचांतान्यष्टौ स्थानानि देवताः ।
ऐश्वर्यमणिमाद्यं हि कारणं ह्यष्टलक्षणम् ॥७५
निमित्तमप्रतीघाते दृष्टे शब्दादिलक्षणे ।
अष्टावेतानि रूपाणि प्राकृतानि यथाक्रमम् ॥७६
क्षेत्रज्ञेष्वनुसज्जंते गुणमात्रात्मकानि तु ।
प्रावृट्काले पृथग्मेघं पश्यंतीव सचक्षुषः ॥७७

तीसरा तृष्णा का क्षय है जो कि मोक्ष का लक्षण व्याख्यान किया गया है। शब्दादि पञ्च लक्षण विषय में दोष दृष्टि होती है ।७४। अप्रद्वेष-अभिष्वङ्ग-प्रीति ताप का विवर्जन ये ही प्रकृतियों का और लय का वैराग्य का कारण हैं ।७२। आठ पूर्व में वर्णित क्रमानुसार प्रकृतियाँ जाननी चाहिए। अव्यक्तादि और भूतान्त प्रकृति से उद्भूत समझने चाहिए ।७३। वर्णों ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र और आश्रमों (ब्रह्मचर्य-गार्हस्थ्य-वाणप्रस्थ-संन्यास) से समन्वित-शिष्ट और शास्त्रों का विरोध न करने वाला यह वर्णाश्रमों का देवों के स्थानों में कारण होता है ।७४। ब्रह्मा से आदि लेकर पिशाचों के अन्त पर्यन्त ये आठ स्थान ही देवता हैं। ऐश्वर्य और अणिमादि आठ लक्षण ही कारण हैं ।७५। शब्दादि के लक्षण वाले अप्रतिघात के दृष्ट होने पर निमित्त हैं। ये क्रमानुसार आठ प्राकृत रूप हैं ।७६। ये गुण मात्रात्मक क्षेत्रज्ञों में अनुसज्जित होते हैं। जिस तरह से नेत्रों वाले मनुष्य वर्षा काल में मेघ को पृथक् देखा करते हैं ।७७।

१२२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पश्यंत्येवं विधाः सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषा ।
खादतश्चान्नपानानि योनीः प्रविशतस्तथा ॥७८
तिर्यगूर्ध्वमधस्ताच्च धावतोऽपि यथाक्रमम् ।
जीवः प्राणस्तथा लिंगं करणं च चतुष्टयम् ॥७६
पर्यायवाचकैः शब्दैरेकार्थैः सोऽभिलप्यते ।
व्यक्ताव्यक्तप्रमाणोऽयं स वै भुंक्ते तु कृत्स्नशः ॥८०
अव्यक्तानुग्रहांतं च क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं च यत् ।
एवं ज्ञात्वा शुचिर्भूत्वा ज्ञानाद्धै वि मुच्यते ॥८१
नष्टं चैव यथातत्वं तत्त्वानां तत्त्वदर्शने ।
यथेष्टं परिनिर्याति भिन्ने देहे सुनिर्वृते ॥८२
भिद्यते करणं चापि ह्यव्यक्तज्ञानिनस्ततः ।
मुक्तो गुणशरीरेण प्राणाद्येन तु सर्वशः ॥८३
नान्यच्छरीरमादत्ते दग्धे बीजे यथांकुरः ।
ज्ञानी च सर्वसंसारार्विज्ञशारीरमानसः ॥८४

इसी प्रकार के सिद्ध पुरुष जीव को दिव्य चक्षुके द्वारा देखा करते हैं तथा उनको जो अन्न को खाते हैं और पान किया करते हैं तथा योनियों में प्रवेश किया करते हैं ।७८। ऊपर-नीचे और तिरछा दौड़ता हुआ भी जो क्रम के ही अनुरूप उसका धावन होता है उस दशा में भी उसके जीव-प्राण-लिङ्ग ओर करण—ये चार वस्तुएं विद्यमान हैं ।७६। ये चारों पर्याय वाचक अर्थात समानार्थक हैं तो भी एकार्थ वाले शब्दों से वह अभिलषित होता है । व्यक्त और अव्यक्त प्रमाण वाला यह है और वह पूर्णतया भोगता है ।८०। अव्यक्त के अनुग्रह के अन्त वाला है और जो क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित है । इस प्रकार से ज्ञान प्राप्त करके शुचि होकर ज्ञान से ही निश्चित रूप से विमुक्ति को प्राप्त हुआ करता है ।८१। तत्वों के दर्शन में तत्व जैसे ही नष्ट होता है फिर भिन्न सुनिर्वृत्त देह में जैसा भी इष्ट हो वह परिनिर्वाण किया करता है ।८२। फिर अव्यक्त ज्ञानी का करण भी विद्यमान होता है । वह प्राणादि गुण शरीर से सब प्रकार से मुक्त ही हो जाता है ।८३। फिर वह अन्य शरीर को ग्रहण नहीं किया करता है क्योंकि जैसे जब बीज ही दग्ध हो जाता है

प्रतिसर्ग वर्णन ] [ १२३

तो बीजांकुर भी समाप्त हो जाया करता है और ज्ञानी जो है वह तो सर्व संसाराविज्ञ शारीर मानस होता है अर्थात् सभी संसार के द्वारा उसका शरीर और मन अविज्ञ ही रहता ।८४।

ज्ञानाच्चतुर्दशो बुद्धः प्रकृतिस्थो निवर्त्तते । प्रकृतिं सत्यमित्याहुर्विकारोऽनृतमुच्यते ॥८५ असद्भावोऽनृतं ज्ञेयं सद्भावः सत्यमुच्यते । अनामरूपं क्षेत्रज्ञनामरूपं प्रचक्षते ॥८६ यस्मात्क्षेत्रं विजानाति तस्मात्क्षेत्रज्ञ उच्यते । क्षेत्रं प्रत्ययते यस्मात्क्षेत्रज्ञः शुभ उच्यते ॥८७ क्षेत्रज्ञः स्मर्यते तस्मात्क्षेत्रं तज्ज्ञैर्विभाष्यते । क्षेत्रं त्वत्प्रत्ययं दृष्टं क्षेत्रज्ञः प्रत्ययः सदा ॥८८ क्षपणात्कारणाच्चैव क्षतत्राणात्तथैव च । भोज्यत्वविषयत्वाच्च क्षेत्रं क्षेत्रविदो विदुः ॥८६ महदाद्यं विशेषांतं सणैरूप्यं विलक्षणम् । विकारलक्षणं तद्वं सोऽक्षरः क्षरमेति च ॥६० तमेवानुविकारं तु यस्माद्वं क्षरते पुनः । तस्माच्च कारणाच्चैव क्षरमित्यभिधीयते ॥६१

ज्ञान से चार प्रकार की दशा से बद्ध प्रकृति में स्थित निवृत्त हो जाता है । यह प्रकृति तो सत्य ही कही जाती है इस से जो भी विकार होता है वही मिथ्या बताया जाया करता है ।८५। जो असद्भाव वाला है वही अनृत समझना चाहिए और जो सद्भाव होता है वह सत्य कहा जाता है । यह क्षेत्रज्ञ नाम और रूप से रहित होता है । यह तो क्षेत्रज्ञ इसी नाम से बोला जाया करता है ।८६। क्षेत्रज्ञ इसका नाम इसीलिए होता है कि यह क्षेत्र को जानता है । जिस कारण से यह क्षेत्र को विश्वस्त मानता है इसी से क्षेत्रज्ञ परम शुभ कहा जाता है ।८७। क्षेत्रज्ञ का स्मरण किया जाता है इसी कारण से उसके ज्ञाताओं के द्वारा विभाश्यमान होता है । क्षेत्र तो त्वत्प्रत्यय वाला देखा गया है और सदा ही क्षेत्रज्ञ प्रत्यय होता है ।८८। अब यह बताते हैं कि क्षेत्र यह नाम इसका क्यों हुआ है—इसका शयन होता है

१२४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एक तो यही कारण है और दूसरा कारण यह है कि क्षत का त्राणत्व वाला है । यह भोज्यत्व वाला है तथा इसमें विषय भी होता है । इसी लिये क्षेत्र के ज्ञाता इसको क्षेत्र कहा करते हैं ।५९। महत् तत्त्व से आरम्भ करके अर्थात् महत् तत्त्व जिसमें आदि है और विशेष के अन्त पर्यन्त में एक परम विल- क्षण विरूपता रहा करती है । वह विकार का लक्षण है किन्तु वह अक्षर होता है और क्षरता को प्राप्त हो जाता है ।६०। कारण यह है कि उसी अनुविकार को फिर क्षरित करता है और उसी कारण से यह क्षर—इस नाम से पुकारा जाया करता है ।६१।

संसारे नरकेभ्यश्च त्रायते पुरुषं च यत् । दुःखात्राणात्पुनश्चापि क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥६२

सुखदुःखमहंभावाद्भोज्यमित्यभिधीयते । अचेतनत्वाद्दिषयस्तद्विधर्मा विभुः स्मृतः ॥६३

न क्षीयते न क्षरति विकारप्रसृतं तु तत् । अक्षरं तेन वाप्युक्तमक्षीणत्वात्तथैव च ॥६४

यस्मात्पुर्य्यनुशेते च तस्मात्पुरुष उच्यते । पुरप्रत्ययिको यस्मात्पुरुषेत्यभिधीयते ॥६५

पुरुषं कथयस्वाथ कथितोऽज्ञैर्विभाष्यते । शुद्धो निरंजनाभासो ज्ञाता ज्ञानविवर्जितः ॥६६

अस्तिनास्तीति सोऽन्यो वा बद्धो मुक्तो गतः स्थितः । नैर्हेतुकात्वनिर्देश्यादहस्तस्मिन्न विद्यते ॥६७

शुद्धत्वान्न तु दृश्यो वै द्रष्टृत्वात्समदर्शनः । आत्मप्रत्ययकारित्वादन्यूनं वाप्यहेतुकम् ॥६८

जो इस परमाधिक दुःखमय संसार में नरकों से पुरुष का परित्राण किया करता है और फिर भी दुःखों के त्राण से इसका नाम क्षेत्र यह कहा जाता है ।६२। इसमें सुख-दुःख और अहंभाव विद्यमान रहता है अतएव इसको भोज्य—इस नाम से भी पुकारा जाया करता है । इसमें अचेतना होती है इसीलिए यह विषय है और उससे विधर्मा होता है अतएव यह न तो क्षीण होता है और न इसका क्षरण ही होता है और विकार से प्रसूत

१२६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

के द्वारा उस प्रकार से आत्मा को दिया करता है। वहाँ पर प्रकृति में कारण में अपनी आत्मा में ही उपस्थित होता है ।१०१। अस्ति—नास्ति—इससे वह अन्य है अथवा यहाँ पर अथवा परलोक में फिर होता है। एकत्व है अथवा पृथक्त्व है—क्षेत्रज्ञ है अथवा पुरुष है ।१०२। वह आत्मा है या निरात्मा है। चेतन है या अचेतन है। वह कर्त्ता है या अकर्त्ता है—वह भोक्ता है या भोज्य ही है ।१०३। जहाँ पर पहुँच कर फिर वहाँ से वापिस नहीं लौटता है क्षेत्रज्ञ निरञ्जन है। उसका कोई भी आख्यान नहीं होता है इसलिये वह अवाच्य है ओर वाद के हेतुओं के द्वारा अग्राह्य है ।१०४। चिन्तन न करने के योग्य होने से वह प्रतर्क के योग्य नहीं है। अवार्य योग्य नहीं है और मन के साथ भी अप्राप्त है ।१०५।

क्षेत्रज्ञे निर्गुणे शुद्धे शान्ते क्षीणे निरंजने । व्यपेतसुखदुःखे च निरुद्धे शान्तिमागते ॥१०६ निरात्मके पुनस्तस्मिन्वाच्यावाच्यं न विद्यते । एतौ संहारविस्तारौ व्यक्ताव्यक्तौ ततः पुनः ॥१०७ सृज्यते ग्रसते चैव व्यक्तौ पर्यवतिष्ठते । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं सर्वं पुनः सर्गे प्रवर्त्तते ॥१०८ अधिष्ठानं प्रपद्येत तस्यान्ते बुद्धिपूर्वकम् । साधर्म्यवैधर्म्यकृतः संयोगो विदितस्तयोः । अनादिमांश्च संयोगो महापुरुषजः स्मृतः ॥१०९ यावच्च सर्गंप्रति सर्गकालस्तावज्जगत्तिष्ठति संनिरुध्य । पूर्वं हि तस्यैव च बुद्धिपूर्वं प्रवर्त्तते तत्पुरुषार्थमेव ॥११० एषा निसर्गप्रतिसर्गपूर्वा प्राधानिकी चेश्वरकारिता वा । अनाद्यनंता ह्यभिमानपूर्वकं वित्रासयन्ती जगदभ्युपैति ॥१११ इत्येष प्राकृतः सर्गस्तृतीयो हेतुलक्षणः । उक्तो ह्यस्मिंस्तदात्यंतं कालं ज्ञात्वा प्रमुच्यते ॥११२ इत्येष प्रतिसर्गो वस्त्रिविधः कीर्त्तितो मया । विस्तरेणानुपूर्व्या च भूयः किं वर्त्तयाम्यहम् ॥११३

ब्रह्माण्डवर्ते वर्णन ] ,। १२७

क्षेत्रज्ञ के निर्गुण-शुद्ध-शान्त-क्षीण-निरञ्जन-अपेत अर्थात् रहित सुख दुःख वाले-निरुद्ध और शान्ति को प्राप्त होने वाले और निरात्मक होने पर फिर उसमें वाच्य और अवाच्य नहीं रहता है। ये दो संहार और विस्तार और फिर व्यक्त और अव्यक्त होते हैं ।१०६-१०७। सृजन किया जाता है ग्रसन होता है और व्यक्त पर्यवस्थित होते हैं। सब क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित फिर सर्ग में प्रवृत्त हुआ करता है ।१०८। उसके अन्त में बुद्धि पूर्वक अधिष्ठान को प्रपन्न हो जाता है। उन दोनों का संयोग साधर्म्य और वैधर्म्य के द्वारा किया हुआ विदित होता है। महापुरुष से समुत्पन्न संयोग अनादिमान् कहा गया है ।१०९। और जबतक सर्ग और प्रतिसर्ग काल होता है तब तक जगत संनिरुद्ध होकर स्थित रहा करता है और उसके पूर्व में ही बुद्धिपूर्वक उसका पुरुषार्थ ही प्रवृत्त होता है ।११०। यह विसर्ग और प्रतिसर्ग पूर्व वाली प्राधानिकी अर्थात् प्रधान (प्रकृति) के द्वारा की हुई या ईश्वर की कराई हुई है। यह ऐसी है जिसका न आदि है और न अन्त ही है और यह अभिमान के साथ इस जगत को निग्रस्त करती हुई ही प्राप्त हुआ करती है ।१११। यही प्राकृत तीसरा सर्ग है जो हेतु के लक्षण वाला है। जो इसमें कहा गया है तब अत्यन्त काल का ज्ञान प्राप्त करके ही प्राणी प्रसक्त हुआ करता है ।११२। यही प्रतिसर्ग है जो तीन प्रकार का होता है जिसका वर्णन मैंने आपके सामने किया है। मैंने इसका विस्तार से और आनुपूर्वी से अर्थात् क्रम से आदि से अन्त पर्यन्त कह दिया है। अब फिर मैं क्या बताऊँ—यह बतलाइये ।११३।

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ब्रह्माण्डवर्त वर्णन

ऋषय ऊचुः-
श्रुतं सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् ।
प्रजानां मनुभिः सार्द्धं देवानाम्ऋषिभिः सह ॥१
पितृगन्धर्वभूतानां पिशाचोरगरक्षसाम् ।
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणामेव पक्षिणाम् ॥२
अप्यद्भुतानि कर्माणि विविधा धर्मनिश्चयाः ।
विचित्राश्च कथायोगा जन्म चाग्र्यमनुत्तमम् ॥३

ब्रह्माण्डवर्त वर्णन ] [ १२६

पूर्ववत्स तु विज्ञेयः समासात्तन्निबोधत ।
दृष्टेनैवानुमेयं च तर्कं वक्ष्यामि युक्तितः ॥१०
यस्माद्वाचो निवर्त्तन्ते त्वप्राप्य मनसा सह ।
अव्यक्तवत्परोक्षत्वाद़गहनं तद्दुरासदम् ॥११
विकारैः प्रतिसंसृष्टो गुणः साम्येन वर्त्तते ।
प्रधानं पुरुषाणां च साधर्म्येणैव तिष्ठति ॥१२
धर्माधमौ प्रलीयेते ह्यव्यक्ते प्राणिनां सदा ।
सत्वमात्रात्मको धर्मो गुणे सत्वे प्रतिष्ठितः ॥१३
तमोमात्रात्मको धर्मो गुणे तमसि तिष्ठति ।
अविभागेन तावेतो गुणसाम्ये स्थितावुभौ ॥१४

इस सर्ग की प्रवृत्ति होने की क्या रीति होती है—यही अब हम पूछते हैं उसको आप कृपा करके हमको बतला दीजिए इस तरह से जब लोमहर्षण सूतजी से पूछा गया था तो फिर उन्होंने पुनः उस सर्ग की जैसे प्रकृति हुआ करती है उसकी व्याख्या करने का उपक्रम किया था और उन्होंने कहा था कि यहाँ पर जैसे यह सर्ग प्रवृत्त होगा—उसको मैं आप लोगों को बतलाऊँगा ।८-६। हे वत्स ! यह सब पूर्व की ही भाँति समझ लेना चाहिए । और संक्षेप से अब भी समझ लो । जो भी दृष्ट है उसी से अनुमान कर लेना चाहिए । मैं युक्ति से तर्क बतलाऊँगा ।१०। वह ऐसा विषय है जहाँ पर वाणी की पहुँच नहीं हैं और मन भी वहाँ तक नहीं पहुँचता है । वह अव्यक्त के ही समान परोक्ष है अतएव बहुत ही गहन और दुरासद है ।११। विकारों के साथ प्रति संसृष्ट होता हुआ गुण समता से रहता है । प्रधान पुरुषों के साधर्म्य से ही स्थित रहा करता है ।१२। प्राणियों के सदा धर्म और अधर्म अव्यक्त में प्रलीन हो जाते हैं । उस समय में सत्व मात्रात्मक अर्थात् केवल सत्व स्वरूप वाला धर्म सत्वगुण में प्रतिष्ठित होता है ।१३। तमो मात्रात्मक धर्म तमोगुण में प्रतिष्ठित होता है । ये दोनों ही बिना ही विभाग के गुणों की समता में स्थित रहते हैं ।१४।

सर्वं कार्यं बुद्धिपूर्वं प्रधानस्य प्रपत्स्यते ।
अबुद्धिपूर्वं क्षेत्रज्ञ अधिष्ठास्यति तान्गुणान् ॥१५

१२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तत्कथ्यमानमस्माकं भवता श्लक्ष्णया गिरा । मनः कर्णसुखं सूते प्रीणात्यमृतसन्निभम् ॥४ एवमाराध्य ते सूतं सत्कृत्य च महर्षयः । पप्रच्छुः सत्त्रिणः सर्वे पुनः सर्गप्रवर्त्तनम् ॥५ कथं सूत महाप्राज्ञ पुनः सर्गः प्रपत्स्यते । बन्धेषु संप्रलीनेषु गुणसाम्ये तमोमये ॥६ विकारेष्वविसृष्टेषु ह्यव्यक्ते चात्मनि स्थिते । अप्रवृत्ते ब्रह्मणा तु सहसा योज्यगैस्तदा ॥७

ऋषियों ने कहा—आपके द्वारा वर्णित यह महान आख्यान हमने सुन लिया है। इसमें मनुओं के साथ प्रजाओं का तथा ऋषियों के सहित देवों का—पितरों का—गन्धर्वों का—भूतों का—पिशाच—उरग और राक्षसों का—दैत्यों का—दानवों का—यक्षों का और पक्षियों का वर्णन है। इन सबके अत्यन्त अद्भुत कर्म हैं तथा धर्म आदि का भी निश्चय है और बहुत ही विचित्र कथा के योग हैं और अत्युत्तम तथा श्रेष्ठजन्म हैं। यह सभी का हमने भली श्रवण कर लिया है ।१-३। आपने जो भी वर्णन किया है वह बहुत ही श्रुति प्रिय सुन्दर वाणी के द्वारा किया है और हमारे मन और कानों को सुख देने वाला है तथा अमृत के ही समान प्रीणन करने वाला है ।४। उन सब महर्षियों ने सूतजी की इस रीति से आराधना करके उनका बड़ा ही सत्कार किया था। फिर उन सत्र करने वालों ने सबने पुनः सर्ग के प्रवर्त्तन के विषय में उनसे प्रश्न किया था ।५। उन्होंने कहा था—हे सूतजी ! आप तो महान् पण्डित हैं। अब हमको यही बतलाइये कि फिर इस सर्ग का प्रवर्त्तन किस प्रकार से होगा। जब ये सभी बन्धन प्रलीन हो जाते हैं और प्रकृति के तीनों गुणों में साम्यावस्था होती है और यह सर्वत्र अन्धकार से परिपूर्ण होता है। समस्त विकार अविसृष्ट होते हैं तथा अव्यक्त आत्मा में स्थित होता है। उस समय में योज्यगों के द्वारा सहसा ब्रह्माजी के अप्रवृत्त होने पर यह सर्ग कैसे होता है ।६-७।

कथं प्रपत्स्यते सर्गस्तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम् । एवमुक्तस्ततः सूतस्तदाऽसौ लोमहर्षणः ॥८ व्याख्यातुमुपचक्राम पुनः सर्गप्रवर्त्तनम् । अत्र वो वर्त्तयिष्यामि यथा सर्ग प्रपत्स्यते ॥६

१३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

एवं तानभिमानेन प्रपत्स्यति पुनस्तदा । यदा प्रवर्त्तितव्यं तु क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्द्वयोः ॥१६ भोज्यभोक्तृत्वसंबंधाः प्रपत्स्यंते च तावुभौ । तस्मादक्षरमव्यक्तं साम्ये स्थित्वा गुणात्मकम् ॥१७ क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं तत्र वैषम्यं भजते तु तत् । ततः प्रपत्स्यते व्यक्तं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्द्वयोः ॥१८ क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं सत्त्वं विकारं जनयिष्यति । महदाद्यं विशेषांतं चतुर्विंशगुणात्मकम् ॥१६ क्षेत्रज्ञस्य प्रधानस्य पुरुषस्य प्रवर्त्स्यतः । आदिदेवः प्रधानस्यानुग्रहाय प्रचक्षते ॥२० अनाद्यौ बपमुत्पादौ उभौ सूक्ष्मौ तु तौ स्मृतौ । अनादिसंयोगयुक्तौ सर्वं क्षेत्रज्ञमेव च ॥२१

यह सभी कार्य बुद्धिपूर्वक प्रधान का ही होगा। यह क्षेत्रज्ञ अबुद्धिपूर्वक उन गुणों में अधिष्ठित होगा ।१५। इस प्रकार से उस समय में फिर अभिमान के साथ उनको प्राप्त होगा । जिस समय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ इन दोनों का प्रवृत्त होना चाहिए ।१६। वे दोनों ही को भोज्य और भोक्तृत्व के सम्बन्ध प्राप्त होंगे । इससे गुणात्मक अक्षर अव्यक्त समता में स्थित होता है ।१७। वहाँ पर वह क्षेत्रत्र में अधिष्ठित विषमता को प्राप्त होता है । फिर दोनों क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को व्यक्त प्राप्त होगा ।१८। क्षेत्रज्ञ में अधिष्ठित सत्व विकार को उत्पन्न कर देगा । वह विकार महत् तत्व से लेकर विशेष के अन्त तक चौबीस गुणों के स्वरूप वाला है ।१६। क्षेत्रज्ञ का प्रधान का और पुरुष का प्रवृत्त होंगे । जो आदि देव हैं वे प्रधान के ही ऊपर अनुग्रह करने वाले कहे जाते हैं । वे दोनों अनादि और श्रेष्ठ उत्पाद तथा सूक्ष्म कहे गये हैं ।२०-२१।

अबुद्धिपूर्वकं युक्तमशक्तौ तु वरौ तदा । अप्रत्ययममोघं च स्थितावुदकमत्स्यवत् ॥२२ प्रवृत्तपूर्वौ तौ पूर्वं पुनः सर्वं प्रपत्स्यते । अज्ञा गुणैः प्रवर्त्तन्ते रजःसत्त्वतमोऽभिधैः ॥२३

ब्रह्माण्डवर्तं वर्णन ] [ १३१

प्रवृत्तिकाले रजसाभिपन्नो महत्वभूतादिविशेषतां च ।
विशेषतां चेंद्रियतां च याति गुणावसानौषधिभिर्मनुष्यः ॥२४
सत्याभिध्यायिनस्तस्य ध्यायिनः सन्निमित्तकम् ।
रजः सत्त्वतमौव्यक्ता विधुर्माणः परस्परम् ॥२५
आद्यंतं वै प्रपत्स्यंते क्षेत्रमज्ञाम्बु सर्वशः ।
संसिद्धकार्यकरणा उत्पद्यंतेऽभिमानिनः ॥२६
सर्वे सत्त्वाः प्रपद्यंते ह्यव्यक्तात्पूर्वमेव च ।
प्राक्सृतौ ये त्वसुवहाः साधकाश्चाप्यसाधकाः ॥२७
असंशांतास्तु ते सर्वे स्थानप्रकरणैः सह ।
कार्याणि प्रतित्स्यंते उत्पत्स्यन्ते पुनः पुनः ॥२८

उस समय में अबुद्धि पूर्वक युक्त है और अशक्त पर हैं यह प्रत्यय रहित और अमोघ हैं और जल में मछली के ही समान स्थित हैं ।२२। पूर्व में वे दोनों ही पूर्व की प्रवृत्ति वाले हैं फिर सर्व को प्राप्त हो जायगा । जो अज्ञ हैं वे रज-सत्व और तम नामों वाले गुणों से प्रवृत्त हुआ करते हैं ।२३। यह मनुष्य प्रवृत्ति के समय से रजोगुण से अभिपन्न होता है और महत्वभूत आदि की विशेषता और इन्द्रियतता की विशेषता को गुणामुखी के और निमित्तों के साथ ध्यायी के ये रज-सत्व और तम पर स्वर में विधर्मी होते हुए व्यक्त होते हैं ।२४-२५। आद्यन्त सभी ओर अज्ञाम्बु क्षेत्र में प्राप्त हो जायँगे । फिर संसिद्ध कार्य और करण वाले अभिमानी उत्पन्न हुआ करते हैं ।२६। सभी सत्व अव्यक्त से पूर्व ही प्रसन्न होते हैं । पूर्व में होने वाली सृत्ति में जो भी प्राणधारी हैं वे चाहे साधक होवे या असाधक होवे ।२७। वे सभी स्थान प्रकरणों के साथ असंशान्त हैं । वे सब कार्यों को प्राप्त करेंगे और बार-बार उत्पन्न होंगे ।२८।

गुणमात्रात्मकावेव धर्माधमौ परस्परम् ।
आरप्सेते हि चान्योन्यं वरेणानुग्रहेण वा ॥२९
शवस्तुल्यप्रसृष्टश्च सर्गादौ याति विक्रियाम् ।
गुणास्तं प्रतिधीर्यते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥३०

१३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गुणास्ते यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे ।
तान्येव प्रतिपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥३१
हिंस्राहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते ।
तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥३२
महाभूतेषु नानात्वमिन्द्रियार्थेषु मूर्त्तिषु ।
विप्रयोगश्च भूतानां गुणेभ्यः संप्रवर्त्तते ॥३३
इत्येष वो मया ख्यातः पुनः सर्गः समासतः ।
समासादेव वक्ष्यामि ब्रह्मणोऽथ समुद्भवम् ॥३४
अव्यक्तात्कारणात्तस्मान्नित्यात्सदसदात्मकात् ।
प्रधानपुरुषाभ्यां तु जायते च महेश्वरः ॥३५

धर्म और अधर्म परस्पर में केवल गुण के ही स्वरूप वाले होते हैं और वे एक दूसरे के वर के द्वारा या अनुग्रह के द्वारा आरम्भ हुआ करते हैं ।२६। इसके उपरान्त तुल्य प्रसूष्टि शव सर्ग के आदि काल में विक्रिया को प्राप्त होता है । गुण इस कारण से उसका प्रतिधान किया करते हैं वह उसको अच्छा लगता है ।३०। वे गुण जो भी कर्म कर्म पूर्व की सृष्टि में प्रतिपन्न हुए थे वे ही बार-बार सृज्यमान होते हुए प्रतिपन्न हुआ करते हैं ।३१। हिंस्र-अहिंस्र, मृदु-क्रूर, धर्म-अधर्म, ऋत-अनृत ये सब जो भी जिसको प्रिय लगता है उसी भाव से भावित होते हुए प्रसन्न हुआ करते हैं ।३२। महाभूतों में अनेक रूपता-इन्द्रियों के विषयों में तथा मूर्त्तियों में अनेक रूपता-इन्द्रियों के विषयों में तथा मूर्त्तियों में अनेकता होती है और प्राणियों के विप्रयोग गुणों से ही प्रवृत्त हुआ करते हैं ।३३। मैंने यह सर्ग आपको बहुत ही संक्षेप से बता दिया है । अब ब्रह्माजी का उद्भव भी मैं बहुत संक्षेप से वर्णन करूंगा ।३४। उसी अव्यक्त कारण से जो सत् और असत् स्वरूप वाला है । प्रधान से और पुरुष से महेश्वर जन्म ग्रहण किया करते हैं ।३५।

स पुनः संभावयिता जायते ब्रह्मसंज्ञितः ।
सृजते स पुनर्लोकानभिमानगुणात्मकान् ॥३६
अहंकारस्तु महतस्तस्माद्भूतानि चात्मनः ।

ब्रह्माण्डवर्त वर्णन ] [ १३३

युगपत्संप्रवर्त्तन्ते भूतान्येवेंद्रियाणि च ॥३७
भूतभेदाश्च भूतेभ्य इति सर्गः प्रवर्त्तते ।
विस्तरावयबस्तेषां यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम् ।
कीर्त्तितो वा यथापूर्वं तथैवाप्युपधार्यताम् ॥३८
एतच्छ्रुत्वा नैमिषेयास्तदानीं लोकोत्पत्ति सुस्थितिं
चाप्ययं च ।
तस्मिन्सत्रेऽवभृथं प्राप्य शुद्धाः पुण्यं लोकमृषयः
प्राप्नुवंति ॥३९
यथा यूयं विधिना देवतादीनिष्ट्वा चैवावभृथं प्राप्य शुद्धाः ।
त्यक्त्वा देहानायुषोऽन्ते कृतार्थाः पुण्यं लोकं प्राप्य
मोदध्वमेवम् ॥४०
एते ते नैमिषेया वै दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च वै तदा ।
जग्मुश्चावभृथस्नाताः स्वर्गं सर्वे तु सत्त्रिणः ॥४१
विप्रास्तथा यूयमपि इष्ट्वा बहुविधैर्मखैः ।
आयुषोऽन्ते ततः स्वर्गं गंतारः स्थ द्विजोत्तमाः ॥४२

वे ही फिर सम्मान करने वाला ब्रह्म के नाम वाले हो जाते हैं । और फिर यही ब्रह्माजी अभिमान और गुणात्मक लोकों का सृजन करते हैं ।३६। महत् तत्व से अहंकार की उत्पत्ति होती है और फिर अहंकार से भूतों का उद्भव हुआ करता है । ये भूत और इन्द्रियां एक ही साथ सम्प्रवृत्त हुआ करते हैं ।३७। इन भूतों से अन्य भूतों के भेद होते हैं—इस तरह से सर्ग प्रवृत्त हुआ करता है । उनका विस्तार और अवयव जैसी प्रज्ञा है और जैसा भी सुना है मैंने आपको पूर्व में बता दिया है उसी प्रकार से इनका अवधारण आप कर लीजिये ।३८। इसको नैमिष क्षेत्र में रहने वालों ने श्रवण करके जो उस समय में लोकों की उत्पत्ति और संहार कहा गया था उस सबमें अवभृथ को प्राप्त करके शुद्ध हुए ऋषिगण—पुण्य लोक को प्राप्त हो जाते हैं ।३९। जिस रीति से आप लोग विधि पूर्वक यजन करके और देव आदि का अर्चन करके तथा अवभृथ को प्राप्त करके शुद्ध हुए हो । फिर आयु के समाप्त होने पर शरीरों का त्याग करके कृतार्थ हुई हैं और

१३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

परम पुण्यलोक को प्राप्त करके इस प्रकार से आनन्दित हो रहे हैं ।४०। ये वे भी नैमिषेय अर्थात् नैमिष क्षेत्र में रहने वाले सभी देखकर को और स्पर्श करके उस समय में अवभृथ स्नान किये हुए सबके सब स्वर्गलोक को गमन कर गये थे ।४१। हे विप्रो ! उसी प्रकार से आप लोगों ने भी बहुत प्रकार के यज्ञों के द्वारा यजन किया है। हे उत्तम द्विजगणो ! फिर जब आपकी आयु का अवसान होगा तब आप भी सब स्वर्ग में गमन कर जांयगे ।४२।

प्रक्रिया प्रथमः पादः कथायास्तु परिग्रहः । अनुषंग उपोद्घात उपसंहार एव च ॥४३ एवमेव चतुः पादं पुराणं लोकसम्मतम् । उवाच भगवात्साक्षाद्वायुर्लोकहिते रतः ॥४४ नैमिषे सत्रमासाद्य मुनिभ्यो मुनिसत्तम । तत्प्रसादं च संसिद्धं भूतोत्पत्तिलयान्वितम् ॥४५ प्राधानिकीमिमां सृष्टिं तथैवेश्वरकारिताम् । सम्यग्विदित्वा मेधावी न मोहमधिगच्छति ॥४६ इदं यो ब्राह्मणो विद्वानितिहासं पुरातनम् । शृणुयाच्छ्रावयेद्वापि तथाऽध्यापयतेऽपि च ॥४७ स्थानेषु स महैंद्रस्य मोदते शाश्वतीः समाः । ब्रह्मसायुज्यगो भूत्वा ब्रह्मणा सह मोदते ॥४८ तेषां कीर्तिमतां कीर्ति प्रजेशानां महात्मनाम् । प्रथयन्पृथिवीशानां ब्रह्मभूयाय गच्छति ॥४९

इस महा पुराण में चार पाद हैं—सर्व प्रथम प्रक्रिया है जो कि प्रथम पाद है—फिर कथा का परिग्रह है । फिर अनुष्वंग है और अन्त में उपो- द्घात तथा उपसंहार है ।४३। इसी रीति से चार पादों वाला यह पुराण लोक सम्मत है । इस पुराण को लोकों के हित में रति रखने वाले भगवान् वायु देव ने ही साक्षात् रूप से इसको कहा है ।४४। हे श्रेष्ठतम मुने ! नैमिष क्षेत्र में एक सत्र (यज्ञ) को प्राप्त करके मुनिगण एकत्रित हुए थे तभी उनसे कहा उसका प्रसाद संसिद्ध हो गया जो भूतों की उत्पत्ति और तप से संयुत है ।४५। इस प्राधिनिकी अर्थात् प्रधान के द्वारा की हुई तथा ईश्वर के द्वारा

ब्रह्माण्डवतं वर्णन ] [ १३५

करायी हुई सृष्टि को भली भाँति जानकर मेधावी पुरुष कभी भी मोह को प्राप्त नहीं होता है ।४६। जो भी कोई विद्वान विप्र इस ब्रह्माजी के परम पुरातन इतिहास का श्रवण करता है अथवा श्रवण कराता है और इसका ध्यान भी करता है वह महेन्द्र देव के स्थानों में अनन्त वर्षों पर्यन्त आनन्द प्राप्त किया करता है और ब्रह्म के सायुज्य को प्राप्त करके ब्रह्म के साथ आनन्दित होता है ।४७-४८। उन प्रजाओं के स्वामी महात्माओं तथा कीर्त्ति-मानों की कीर्त्ति को जो कि इस पृथिवी के ईश हैं संसार में प्रथित करके ब्रह्म के ही समान हो जाता है ।४६।

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं वेदैश्च संमितम् ।
कृष्णद्वैपायनेनोक्तं पुराणं ब्रह्मवादिना ॥५०
मन्वन्तरेश्वराणां च यः कीर्त्ति प्रथयेदिमाम् ।
देवतानामृषीणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ॥५१
स सर्वैर्मुच्यते पापै पुण्यं च महदाप्नुयात् ।
यश्चेदं श्रावयेद्विद्वान्सदा पर्वणि पर्वणि ॥५२
धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।
अक्षयं सर्वकामीयं पितृ स्तञ्चोपतिष्ठते ।
यस्मात्पुरा ह्यणंतीदं पुराणं तेन चोच्यते ॥५४
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
तथैव त्रिषु वर्णेषु ये मनुष्या अधीयते ॥५५
इतिहासमिमं श्रुत्वा धर्माय विदधे मतिम् ।
यावंत्यस्य शरीरेषु रोमकूपानि सर्वशः ॥५६

यह पुराण परम धन्य है—यश की वृद्धि करने वाला है—आयु के बढ़ाने वाला—परम स्मरूप और वेदों की समानता रखने वाला है । यह पुराण ब्रह्मवादी श्रीकृष्ण द्वैपायन ने ही कहा है ।५६। जो मनुष्य इस मन्वन्तरों की कीर्त्ति को प्रथित करता है तथा देवों की और भूरि द्रविण तेज वाले ऋषियों की कीर्त्ति को फैलाता है वह सभी प्रकार के पापों से छूट जाता है और महान पुण्य का लाभ प्राप्त किया करता है और जो विद्वान प्रत्येक पर्व पर इसका श्रवण कराता है और इस अन्तिम पाद को श्राद्ध में ब्राह्मणों को सुनाता है वह अक्षय और सर्वकामनाओं की पूर्ति करने वाला

१३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पितृगणों के समीप में उपस्थित होता है । कारण यही है कि पहिले यह उसी के द्वारा कहा जाता है ।५१-५४। जो पुरुष इसकी निरुक्ति को जानता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है । उसी भाँति तीनों वर्षों में जो मनुष्य इसको पढ़ते हैं इस इतिहास का श्रवण करके धर्म की बुद्धि हो जाती है और शरीर में जितने भी करोड़ रोमों के छिद्र हैं उतने ही वर्ष वह स्वर्ग में निवास करता है ।५५-५६।

तावत्कोटिसहस्राणि वर्षाणि दिवि मोदते ।
ब्रह्मसायुज्यगो भूत्वा दैवतैः सह मोदते ॥५७
सर्वपापहरं पुण्यं पवित्रं च यशस्वि च ।
ब्रह्मा ददौ शास्त्रमिदं पुराणं मातरिश्वने ॥५८
तस्माच्चोशनसा प्राप्तं तस्माच्चापि बृहस्पतिः ।
बृहस्पतिस्तु प्रोवाच सवित्रे तदनंतरम् ॥५९
सविता मृत्यवे प्राह मृत्युश्चेंद्राय वै पुनः ।
इन्द्रश्चापि वसिष्ठाय सोऽपि सारस्वताय च ॥६०
सारस्वतस्त्रिधाम्नेऽथ त्रिधामा च शरद्वते ।
शरद्वांस्तु त्रिविष्टाय सोऽंतरिक्षाय दत्तवान् ॥६१
चर्षिणे चांतरिक्षो वै सोऽपि त्रय्यारुणाय च ।
त्रय्यारुणाद्धनंजयः स वै प्रादात्कृतंजये ॥६२
कृतंजयात्तृणंजयो भरद्वाजाय सोऽप्यथ ।
गौतमाय भरद्वाजः सोऽपि निर्य्यंतरे पुनः ॥६३

शरीर में स्थित रोम कूपों के समान उतने ही सहस्र वर्षों तक स्वर्ग में आनन्द प्राप्त किया करता है । फिर ब्रह्मा के सायुज्य में गमन करने वाला होकर देवों के साथ में परमानन्दित हुआ करता है ।५७। यह महापुराण सभी पापों के हरण करने वाला—पुण्य स्वरूप—पवित्र और यश वाला है । ब्रह्माजी ने ही इस शास्त्र पुराण को वायु देव के लिये दिया था ।५८। उस वासुदेव से इसकी प्राप्ति उशना ने की थी । उशना से देव गुरु बृहस्पति

ब्रह्माणवतं वर्णन ] [ १३७

जी ने प्राप्त किया था । बृहस्पति ने फिर सविता को बताया था ।५६। सविता ने मृत्यु को दिया था और मृत्यु ने फिर इन्द्र को दिया था । इन्द्र ने वसिष्ठ मुनि को बताया था और वसिष्ठजी सारस्वत को दिया था ।५९-६०। सारस्वत ने त्रिधामा को दिया था और त्रिधामा ने शरद्वान् को दिया था । शरद्वान् ने त्रिविष्ट को दिया और उसने अन्तरिक्ष को दिया था ।६१। अन्तरिक्ष ने चर्ची को बतलाया और उसने त्रय्यारुण को दिया था । त्रय्यारुण ने धनञ्जय को दिया था उसने कृतञ्जय को दिया था ।६२। कृतञ्जय से तृणञ्जय को मिला था और इससे भरद्वाज को प्राप्त हुआ था । भरद्वाज ने गौतम को दिया था ओर उसने फिर नियंन्तर को दिया था ।६३।

नियन्तरस्तु प्रोवाच तथा वाजश्रवाय वै ।
स ददौ सोमशुष्माय स चादात्तृणबिन्दवे ॥६४
तृणबिन्दुस्तु दक्षाय दक्षः प्रोवाच शक्तये ।
शक्तेः पराशरश्चापि गर्भस्थः श्रुतवानिदम् ॥६५
पराशराज्जातुकर्ण्यस्तस्माद्द्वैपायनः प्रभुः ।
द्वैपायनात्पुनश्चापि मया प्राप्तं द्विजोत्तम ॥६६
मया चैतत्पुनः प्रोक्तं पुत्रायामितबुद्धये ।
इत्येव वाक्यं ब्रह्मादिकगुरूणां समुदाहृतम् ॥६७
नमस्कार्याश्च गुरवः प्रयत्नेन मनीषिभिः ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं सर्वार्थसाधकम् ॥६८
पापघ्नं नियमेनेदं श्रोतव्यं ब्राह्मणैः सदा ।
नाशुचौ नापि पापाय नाप्यसंवत्सरोषिते ॥६९
नाश्रद्दधानेऽविदुषे नापुत्राय कथंचन ।
नाहिताय प्रदातव्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ॥७०

नियन्तर ने वाजश्रव को यह बताया था ओर उसने सोम शुष्म को दिया था फिर उसने तृण बिन्दु के लिए दिया था ।६४। तृण बिन्दु ने दक्ष को दिया था ओर उसने फिर शक्ति को बताया था । शक्ति से गर्भ में ही स्थित पराशर मुनि ने इसका श्रवण किया था ।६५। पराशर से जातुकर्ण्य ने प्राप्त किया था फिर उससे प्रभु द्वैपायन ने प्राप्त किया था । हे द्विजोत्तम !

१३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वैपायन मुनि से इस महापुराण को मैंने प्राप्त किया था। ६६। फिर मैंने अमित बुद्धि पुत्र को दिया था। यह इतना वाक्य ब्रह्मा से आदि लेकर गुरु वर्गों का मैंने बता दिया है । ६७। मनीषियों को प्रयत्न से इन गुरु वर्गों के लिए नमस्कार करना चाहिए। यह पुराण यशस्य—आयुष्य—पुण्य और सब अर्थों का साधक है । ६८। यह पापों के हनन करने वाला है। ब्राह्मणों को सदा ही इसका श्रवण करना चाहिए। इस पुराण को जो अशुचि हो—पापी हो तथा जो एक वर्ष से भी कम वास करने वाला हो उसको नहीं बताना चाहिए । ६९। जिसमें इसके प्रति श्रद्धा न हो उसको—अविद्वान् को और पुत्रहीन को भी कभी नहीं बताना चाहिए। यह परम पवित्र तथा उत्तम है अतः जो अपना हित न हो उसको भी नहीं देना चाहिए । ७०।

अव्यक्तं वै यस्य योनिं वदंति व्यक्तं देहं कालमेतं गतिं च । वह्निर्वक्त्रं चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे दिशः श्रोत्रे घ्राणमाहुश्च वायुम् ॥७१

वाचो वेदा अंतरिक्षं शरीरं क्षितिः पादास्तारका रोमकूपाः। सर्वाणि द्यौर्मस्तकानि त्वथो वै विद्याश्चैवोपनिषदद्यस्य पुच्छम् ॥७२

तं देवदेवं जननं जनानां यज्ञात्मकं सत्यलोकप्रतिष्ठम् । वरं वराणां वरदं महेश्वरं ब्रह्माणमादिं प्रयतो नमस्ये ॥७३

जिसकी योनि अव्यक्त है—व्यक्त जिसका देह है—यह काल ही गति है—अग्नि मुख हैं—चन्द्र और सूर्य ही नेत्र हैं—दिशायें जिसके श्रोत्र हैं और वायु घ्राण है ।७१। वाणी जिसकी वेद हैं—अन्तरिक्ष ही शरीर है—क्षितिहो पाद हैं—तारे रोम कय हैं—द्यौ मस्तक है—विद्या अधोभाग है और उपनिषद् जिसकी कूप है ।७२। उस देवों के भी देव को और जनों के जन्म स्थल को—यज्ञ स्वरूप तथा सत्यलोक में प्रतिष्ठित को—वरों के देने वालों के श्रेष्ठ वर को आदि महेश्वर ब्रह्माजी को प्रणत होकर नमस्कार करता हूँ ।७३।