संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पितृगणों के समीप में उपस्थित होता है । कारण यही है कि पहिले यह उसी के द्वारा कहा जाता है ।५१-५४। जो पुरुष इसकी निरुक्ति को जानता है वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है । उसी भाँति तीनों वर्षों में जो मनुष्य इसको पढ़ते हैं इस इतिहास का श्रवण करके धर्म की बुद्धि हो जाती है और शरीर में जितने भी करोड़ रोमों के छिद्र हैं उतने ही वर्ष वह स्वर्ग में निवास करता है ।५५-५६।
तावत्कोटिसहस्राणि वर्षाणि दिवि मोदते ।
ब्रह्मसायुज्यगो भूत्वा दैवतैः सह मोदते ॥५७
सर्वपापहरं पुण्यं पवित्रं च यशस्वि च ।
ब्रह्मा ददौ शास्त्रमिदं पुराणं मातरिश्वने ॥५८
तस्माच्चोशनसा प्राप्तं तस्माच्चापि बृहस्पतिः ।
बृहस्पतिस्तु प्रोवाच सवित्रे तदनंतरम् ॥५९
सविता मृत्यवे प्राह मृत्युश्चेंद्राय वै पुनः ।
इन्द्रश्चापि वसिष्ठाय सोऽपि सारस्वताय च ॥६०
सारस्वतस्त्रिधाम्नेऽथ त्रिधामा च शरद्वते ।
शरद्वांस्तु त्रिविष्टाय सोऽंतरिक्षाय दत्तवान् ॥६१
चर्षिणे चांतरिक्षो वै सोऽपि त्रय्यारुणाय च ।
त्रय्यारुणाद्धनंजयः स वै प्रादात्कृतंजये ॥६२
कृतंजयात्तृणंजयो भरद्वाजाय सोऽप्यथ ।
गौतमाय भरद्वाजः सोऽपि निर्य्यंतरे पुनः ॥६३
शरीर में स्थित रोम कूपों के समान उतने ही सहस्र वर्षों तक स्वर्ग में आनन्द प्राप्त किया करता है । फिर ब्रह्मा के सायुज्य में गमन करने वाला होकर देवों के साथ में परमानन्दित हुआ करता है ।५७। यह महापुराण सभी पापों के हरण करने वाला—पुण्य स्वरूप—पवित्र और यश वाला है । ब्रह्माजी ने ही इस शास्त्र पुराण को वायु देव के लिये दिया था ।५८। उस वासुदेव से इसकी प्राप्ति उशना ने की थी । उशना से देव गुरु बृहस्पति