संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अगस्त्य यात्राजनार्दन आविर्भाव ] [ १३६
अगस्त्य यात्रा जनार्दन आविर्भाव
श्रीगणेशाय नमः— अथ श्रीललितोपाख्यान प्रारभ्यते । चतुर्भुंजे चन्द्रकलावर्तंसे कुचोन्नने कुङ्कुमरागशोणे । पुण्ड्रेक्षुपाशांकुशपुष्पवाणहस्ते नमस्ते जगदेकमातः ॥१ अस्तु नः श्रेयसे नित्यं वस्तु वामाङ्गसुन्दरम् । यतस्तृतीयो विदुषां तृतीयस्तु परं महः ॥२ अगस्त्यो नाम देवर्षिर्वेदवेदाङ्गपारगः । सर्वसिद्धान्तसारज्ञो ब्रह्मानन्दरसात्मकः ॥३ चचाराद्भुतहेतूनि तीर्थान्यायतननि च । शैलारण्यापगामुख्यान्सर्वाञ्जनपदानपि ॥४ तेषु तेष्वखिलाञ्जंतूनज्ञानतिमिगवृतान् । शिश्नोदरपरान्दृष्ट्वा चिन्तयामास तान्प्रति ॥५ तस्य चिन्तयमानस्य चरतो वसुधामिमाम् । प्राप्तमासीन्महापुण्यं कांचीनगरमुत्तमम् ॥६ तत्र वारणशैलेन्द्रमेकाग्रनिलयं शिवम् । कामाक्षीं कलिदोषघ्नीमपूजयदथात्मवान् ॥७
हे इस जगत् की एक ही जननि ! आपकी सेवा में मेरा सादर प्रणाम निवेदित हैं । आप चार भुजाओं वाली हैं आपके मस्तक में चन्द्रमा की कला का भूषण विद्यमान है—आपके अत्यन्त उन्नत उरोज हैं-आपका वर्ण कुंकुम के राग के सदृश रक्त है—पुण्ड्र-इक्षु, पाश-अंकुश और पुष्पों का वाण आपके करों में सुशोभित है ।१। आपके वाम अङ्ग में परम सुन्दर वस्तु हमारे नित्य ही कल्याण के लिए होवे । जिससे विद्वानों में तीसरे और तृतीय परम तेज विद्यमान है ।२। वह अगस्त्य नाम वाले देवर्षि हैं जो वेदों और वेदाङ्ग शास्त्रों के पारगामी विद्वान् हैं । वे सब सिद्धान्तों के सार के ज्ञाता हैं और ब्रह्मानन्द के रस के ही स्वरूप वाले हैं ।३। अद्भुतता के हेतु स्वरूप तीर्थों का और पवित्र आयतनों का जिन्होंने सञ्चरण किया था
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तथा समस्त शैल-अरण्य-नदियाँ आदि प्रमुख स्थलों का एवं जनपदों का भी जिन्होंने परिभ्रमण किया है ।४। उन-उन स्थलों में जहाँ-जहाँ पर उन्होंने परिभ्रमण किया था वहाँ पर सभी जन्तुओं को ज्ञान से शून्य तथा अत्यन्त ही अन्धकार से समन्वित एक केवल उदर पूर्ति तथा काम वासना में परायण देखा था। उन्होंने यह बुरो दशा देखकर उनके विषय में चिन्तन किया था ।५। वे इसी प्रकार से चिन्तन करते हुए संचरण कर रहे थे और इस भूमि पर विचर रहे थे कि उन्हें काञ्ची नगर मिला था जो महान् पुण्यमय और अत्युत्तम था ।६। वहाँ पर इन आत्मवान् अगस्त्यजी ने वारण शैल के स्वामी और एकाग्र ध्यान में तल्लीन भगवान् शिव का तथा कलियुग के दोषों का हनन करने वाली देवी कामाक्षी का अर्चन किया था ।७।
लोकहेतोर्दयार्द्रस्य धीममश्चिन्तनो मुहुः ।
चिरकालेन तपसा तोषितोऽभूज्जनार्दन ॥८
हयग्रीवां तनुं कृत्वा साक्षाच्चिन्मात्रविग्रहाम् ।
शङ्खचक्राक्षवलयपुस्तकोज्ज्वलबाहुकाम् ॥६
पूरयित्रीं जगत्कृत्स्नं प्रभया देहजातया ।
प्रादुर्बभूव पुरतो मुनेरमिततेजसा ॥१०
तं दृष्ट्वानन्दभरितः प्रणम्य च मुहुर्मुहुः ।
विनयावनतो भूत्वा सन्तुष्टाव जगत्पतिम् ॥११
अथोवाच जगन्नाथस्तुष्टोऽस्मि तपसा तव ।
वरं वरय भद्रं ते भविता भूसुरोत्तम ॥१२
इति पृष्टो भगवता प्रोवाच मुनिसत्तमः ।
यदि तुष्टोऽसि भगवन्निमे पामरजन्तवः ॥१३
केनोपायेन मुक्ताः स्युरेतन्मे वक्तुमर्हसि ।
इति पृष्टो द्विजेनाथ देवदेवो जनार्दनः ॥१४
लोकों के कारण से दया से आर्द्र (पसीजे हुए हृदय वाले)—परमधीमान् और बारम्बार चिन्तन करने वाले उन अगस्त्य मुनि के अधिक समय तक किये हुए तप से भगवान् प्रसन्न हो गये थे ।८। हयग्रीव के शरीर को
५. द्वितीय खण्ड — उपसंहारपाद (प्रलय, कालमान व योगविवरण)
धारण करके साक्षात् चिद् (ज्ञान) ही के विग्रह वाली और शंख, चक्र, वलय और पुस्तक के धारण करने से समुज्ज्वल बाहुओं वाली तथा अपने देह से समुत्पन्न प्रभा से सम्पूर्ण जगत् जगत् को पूरित करने वाली अपने अपरिमित तेज से मुनि के आगे प्रादुर्भूत हुई थी ।९-१०। उनका दर्शन प्राप्त करके आनन्द से भरे हुए ऋषि ने उनको बारम्बार प्रणाम किया था और विनय से अवनत होकर जगत् के पति की भली भाँति स्तुति की थी ।११। इसके अनन्तर जगन्नाथ प्रभु ने कहा था—हे भूसुरों में श्रेष्ठ ! मैं आपके तप से सन्तुष्ट हो गया हूं आप किसी भी वरदान का वरण करो। तुम्हारा कल्याण होगा ।१२। जब भगवान् के द्वारा इस रीति से पूछा गया तो श्रेष्ठ मुनि ने कहा—हे भगवन् ! यदि परम सन्तुष्ट है तो यही मुझे बतलाइए कि ये पामर जन्तुगण किस उपाय से मुक्त होगे। जब इस रीति से द्विज के द्वारा पूछा गया था तो देवों के भी देव जनार्दन ने कहा था—।१३-१४।
एष एव पुरा प्रश्नः शिवेन चरितो मम ।
अयमेव कृतः प्रश्नो ब्रह्मणा तु ततः परम् ॥१५॥
कृतो दुर्वाससा पश्चाद्भवता तु ततः परम् ॥१६॥
भवद्भिः सर्वभूतानां गुरुभूतैर्महात्मभिः ।
ममोपदेशो लोकेषु प्रथितोऽस्तु वरो मम ॥१७॥
अहमादिर्हि भूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः ।
सृष्टिस्थितिलयानां तु सर्वेषामपि कारकः ॥१८॥
त्रिमूर्तिस्त्रिगुणातीतो गुणहीनो गुणाश्रयः ॥१९॥
इच्छाविहारो भूतात्मा प्रधानपुरुषात्मकः ।
एवं भूतस्य मे ब्रह्मंस्त्रिजगद्रूपधारिणः ॥२०॥
द्विधाकृतमभूद्रूपं प्रधानपुरुषात्मकम् ।
मम प्रधानं यद्रूपं सर्वलोकगुणात्मकम् ॥२१॥
यह ही प्रश्न बहुत पहिले शिवजी ने मुझसे किया था। इसके पीछे ऐसा ही प्रश्न ब्रह्माजी ने भी किया था ।१५। इसके अनन्तर दुर्वासा मुनि ने यह प्रश्न किया था। इसके बाद में अब आपने भी यह प्रश्न मुझ से किया
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है ।१६। यह प्रश्न जो आपने किया है इसका कारण यही है कि आप महान् आत्मा वाले हैं और समस्त प्राणियों के गुरु के ही समान है । लोकों में मेरा उपदेश ही परम प्रसिद्ध वर है ।१७। मैं समस्त प्राणियों में आदि हूँ और मैं ही आदि कर्त्ता प्रभु हूँ जो स्वयं ही हुआ हूँ । इस लोक की सृष्टि-स्थिति और संहार के करने वाला भी सबका मैं ही हूँ ।१८। मैं ही तीन मूर्त्तियाँ वाला हूँ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु और महादेव-ये तीन मूर्त्तियां मेरी ही हैं जो कि मैं गुणों से पर-गुणों से रहित और गुणों का समाश्रय भी हूँ ।१९। मैं समस्त भूतों की आत्मा हूँ और मैं अपनी ही इच्छा से बिहार करने वाला हूँ । हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार के जगत् में तीन रूप धारण करने वाला हूँ ।२०। मेरा ही रूप दो प्रकार का है एक पुरुष और दूसरा प्रधान मेरा जो प्रधान नामक रूप है वह सब (सत्व-रज-तम) गुणों के ही स्वरूप वाला है ।२१।
अपरं यद्गुणातीतं परात्परतरं महत् ।
एवमेव तयोर्ज्ञात्वा मुच्यते ते उभे किमु ॥२२
तपोभिश्चिरकालोत्थैर्यमैश्च नियमैरपि ।
त्यागैर्दुष्कर्मनाशांते मुक्तिराश्वेव लभ्यते ॥२३
यद्रूपं यद्गुणयुतं तद्गुणैक्येन लभ्यते ।
अन्यत्सर्वं जगद्रूपं कर्मभोगपराक्रमम् ॥२४
कर्मभिर्लभ्यते तच्च तत्त्यागेनापि लभ्यते ।
दुस्तरस्तु तयोस्त्यागः सकलैरपि तापसैः ॥२५
अनपायं च सुगमं सदसत्कर्मगोचरम् ॥२६
आत्मस्थेन गुणेनैव सतां चाप्यसतापि वा ।
आत्मैक्येनैव यज्ज्ञानं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥२७
वर्णत्रयविहीनीनां पापिष्ठानां नृणामपि ।
यद्रूपध्यानमात्रेण दुष्कृतं सुकृतायते ॥२८
दूसरा मेरा स्वरूप सब गुणों से परे है और पर से भी अधिक पर हैं तथा महान् है । इस रीति से उन दोनों के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके वे दोनों ही मुक्त हो जाते हैं ।२२। चिरकाल पर्यन्त किये हुए तप-यम और
अगस्त्य यात्रा-जनार्दन आविर्भाव ] [ १४३
नियम तथा त्याग से दुष्कर्मों के विनाश होने के अन्त में बहुत ही शीघ्र मुक्ति प्राप्ति हो जाया करती है ।२३। जो रूप जिस गुण से युक्त होता है उन गुणों की एकता से प्राप्त किया जाता है । अन्य समस्त जगत् के स्वरूप वाला है जो कर्म—भोग और पराक्रम से संयुक्त होता है ।२४। जो कर्मों के द्वारा प्राप्त किया जाता है वह कर्मों के त्याग से भी पाया जाया करता है । हे तपस्विन् ! सभी के द्वारा उन दोनों का त्याग करना बड़ा ही कठिन होता है ।२५। सत् और असत् कर्मों को प्रत्यक्ष रूप से जान लेना निर्विघ्न और सुगम होता है ।२६। आत्मा में स्थित गुण से जो सत् हो या असत् हो । आत्मा के साथ एकता से जो भी ज्ञान है वह समस्त सिद्धियों के देने वाला होता है ।२७। तीन वर्णों से जो हीन हैं और महान् पापी हैं ऐसे मनुष्यों को भी जिसके केवल ध्यान से ही दुष्कृत भी सुकृत के स्वरूप में परिणत हो जाया करता है ।२८।
येऽर्चयंति परां शक्तिं विधिनाऽविधिनापि वा । न ते संसारिणो नूनं मुक्ता एव न संशयः ॥२९ शिवो वा यां समाराध्य ध्यानयोगबलेन च । ईश्वरः सर्वसिद्धानामर्द्धनारीश्वरोऽभवत् ॥३० अन्येऽब्जप्रमुखा देवाः सिद्धास्तद्ध्यानवैभवात् । तस्मादशेषलोकानां त्रिपुराराधनं विना ॥३१ न स्तो भोगापवर्गौ तु यौगपद्येन कुत्रचित् । तन्मनास्तद्गतप्राणस्तद्याजी तद्गतेहकः ॥३२ तादात्म्येनैव कर्माणि कुर्वन्मुक्तिमवाप्स्यसि । एतद्रहस्यमाख्यातं सर्वेषां हितकाम्यया ॥३३ सन्तुष्टेनैव तपसा भवतो मुनिसत्तम । देवाश्च मुनयः सिद्धा मानुषाश्च तथापरे । त्वन्मुखांभोजतोऽवाप्य सिद्धिं यांतु परात्पराम् ॥३४ इति तस्य वचः श्रुत्वा हयग्रीवस्य शार्ङ्गिणः । प्रणिपत्य पुनर्वाक्यमुवाच मधुसूदनम् ॥३५
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जो मानव पराशक्ति का अर्चन किया करते हैं चाहे वे विधि के साथ करें या बिना ही विधि से करें वे संसारी नहीं होते हैं अर्थात् बारम्बार जीवन—मरण की घोर यातनाएँ सहन करने वाले नहीं रहते हैं और निश्चय ही वे मुक्त हो जाया करते हैं—इसमें लेशमात्र भी जिसकी आराधना करके और ध्यान तथा योग के बल से अर्चना करके ईश्वर भी जो सभी सिद्धों के स्वामी हैं अर्धनारीश्वर हो गये थे ।२६-३०। अन्य देव भी जिनमें अब्ज प्रमुख हैं उसके ध्यान के ही वैभव से ही सिद्ध हो गये हैं । इस कारण से यह सिद्ध होता है कि समस्त लोगों को त्रिपुरदेव का ही आराधन मुख्य है । इसके बिना कुछ भी नहीं होता है ।३१। सुखों का उपभोग और मोक्ष दोनों ही एक साथ किसी भी प्रकार से नहीं प्राप्त हुआ करते हैं । उनमें ही मन के लगाने वाला—उसमें अपने प्राणों को संलग्न रखने वाला—उसका ही यजन करने वाला तथा अपनी इच्छा को उसमें ही केन्द्रित करने वाला मानव तादात्म्य भाव से अर्थात् उसमें ही सर्वतोभाव से एकता धारण करने वाला पुरुष कर्मों को करता हुआ मुक्ति को प्राप्त कर लेगा । यही रहस्य मैंने सबके हित की कामना से कह दिया है ।३२-३३। हे मुनियों में परम श्रेष्ठ ! मैं आपके तप से परम सन्तुष्ट हो गया हूँ । इसी से मैंने आपको यह बतला दिया है । देवगण—मुनिमण्डल—सिद्धसमुदाय—मनुष्य तथा दूसरे लोग आपके मुख कमल से भी पर से भी पर सिद्धि को प्राप्त कर लेवें ।३४। भगवान् हयग्रीव शाङ्ग के इस वचन का श्रवण करके अगस्त्य मुनि ने उनको प्रणिपात किया था और फिर मधुसूदन प्रभु से कहा था ।३५।
भगवन्कीदृशं रूपं भवता यत्पुरोदितम् । किंविहारं किंप्रभावमेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥३६
हयग्रीव उवाच– एषोऽशभूतो देवर्षे हयग्रीवो ममापरः । श्रोतुमिच्छसि यद्यत्त्वं तत्सर्वं वक्तुमर्हति ॥३७
इत्यादिश्य जगन्नाथो हयग्रीवं तपोधनम् । पुरतः कुम्भजातस्य मुनेरंतरधाद्धरिः ॥३८
ततस्तु विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा तपोधनः । हयग्रीवेण मुनिना स्वाश्रमं प्रत्यपद्यत ॥३६
आप मुझको बतलाइए। ३६। हयग्रीव जी ने कहा—हे देवर्षे ! यह अंशभूत मेरा अपर हयग्रीव है। आप जो-जो भी श्रवण करना चाहते हैं वही यह कहने के योग्य होता है। जगन्नाथ प्रभु इतना ही तपोधन हयग्रीव को आदेश देकर अगस्त्य मुनि के ही आगे अन्तर्हित हो गये थे। ३७-३८। इसके पश्चात् अगस्त्य मुनि बड़े ही विस्मित हुए और उनके रोम-रोम प्रसन्नता से उद्गत हो गये थे। फिर वे तप के ही मन वाले मुनि हयग्रीव मुनि के साथ अपने आश्रम में प्राप्त हो गये थे। ३६।
—x—
॥ हयग्रीव अगस्त्य संवाद ॥
अथोपवेश्य चैवैनमासने परमाद्भुते ।
हयाननमुपागत्यागस्त्यो वाक्यं समब्रवीत् ॥१
भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वसिद्धान्तवित्तम ।
लोकाभ्युदयहेतुर्हि दर्शनं हि भवादृशाम् ॥२
आविर्भावं महादेब्यास्तस्या रूपान्तराणि च ।
विहारांश्चैव मुख्या ये तान्नो विस्तरतो वद ॥३
हयग्रीव उवाच-
अनादिरखिलाधारा सदसत्कर्मरूपिणी ।
ध्यानैकदृश्या ध्यानांगी विद्यांगी हृदयास्पदा ॥४
आत्मैक्याद्व्यक्तिमायाति चिरानुष्ठानगौरवात् ॥५
आदौ पादुरभूच्छक्तिर्ब्रह्मणो ध्यानयोगतः ।
प्रकृतिर्नाम सा ख्याता देवानामिष्टसिद्धिदा ॥६
द्वितीयमुद्भूद्रूपं प्रवृत्तेऽमृतमंथने ।
सर्वसंमोहजनकमवाङ्मनसगोचरम् ॥७
इसके अनन्तर उनको परम अद्भुत आसन पर बिठाकर फिर हयानन के समीप में उपस्थित होकर अगस्त्य जी ने यह वाक्य कहा था।
१४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।१। हे भगवन् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञाता हैं और समस्त सिद्धान्तों के परम श्रेष्ठ जानने वाले हैं । आप सरीखे महापुरुषों का दर्शन तो लोकों के अभ्युदय का ही हेतु हुआ करता है ।२। महादेवी का आविर्भाव और उनके अन्य स्वरूप तथा मुख्य बिहार जो भी हैं उनको अब मेरे समक्ष में विस्तार से वर्णन कीजिए ।३। श्री हयग्रीवजी ने कहा—सत् और असत् कर्मों के रूप वाली जो पूर्ण धारा है वह अनादि है । ध्यान के ही अङ्गों वाली—विद्या ही जिसका शरीर है और उसका हृदय ही निवास का स्थल है वह ध्यान के ही द्वारा देखने के योग्य है । बहुत काल पर्यन्त अनुष्ठान के गौरव से जब अपनी आत्मा के साथ उसकी एकता हो जाती है तभी वह प्रकट हुआ करती है ।४-५। आदि काल में ब्रह्माजी के ध्यान के योग से वह शक्ति प्रादुर्भूत हुई थी । उसका प्रकृति-यह नाम विख्यात हुआ था जो देवों के इष्ट की सिद्धि देने वाली थी ।६। उसका दूसरा स्वरूप उस समय में उद्भूत हुआ था जिस समय में देवों और असुरों के द्वारा अमृत के प्राप्त करने के लिये समुद्र का मन्थन करना प्रवृत्त हुआ था । जो भगवान् शिव को भी मोह उत्पन्न करने वाला था जो कि वाणी और मन के भी अगोचर हैं ।७।
यद्दर्शनादभूदीशः सर्वज्ञोऽपि विमोहितः । विसृज्य पार्वतीं शीघ्रं तया रुद्धोऽतनोद्रतम् ॥८ तस्यां वै जनयामास शास्तारमसुरार्दनम् ॥९
अगस्त्य उवाच–
कथं वै सर्वभूतेशो वशी मन्मथशासनः । अहो विमोहितो देव्या जनयामास चात्मजम् ॥१०
हयग्रीव उवाच–
पुरामरपुराधीशो विजयश्रीसमृद्धिमान् । त्रैलोक्यं पालयामास सदेवासुरमानुषम् ॥११ कैलासशिखराकारं गजेन्द्रमधिरुह्य सः । चचाराखिललोकेषु पूज्यमानोऽखिलैरपि । तं प्रमत्तं विदित्वाथ भवानीपतिरव्ययः ॥१२
हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १४७
दुर्वाससमथाहूय प्रजिघाय तदंतिकम् । खण्डाजिनधरो दंडी धूलिधूसरविग्रहः । उन्मत्तरूपधारी च ययौ विद्याधराध्वना ॥१३ एतस्मिन्नन्तरे काले काचिद्विद्याधरांगना । यदृच्छया गता तस्य पुरश्चारुतराकृतिः ॥१४
जिसके दर्शन करने से ईश्वर जो सर्वज्ञ हैं वे भी विमोहित हो गये थे। उन्होंने पार्वती जी को भी त्याग करके शीघ्रता से उसके द्वारा रुद्ध होकर रति का विस्तार किया था।८। उसमें असुरों के अर्दन करने वाले एक शासक को उसने उत्पन्न किया था।६। अगस्त्यजी ने कहा—शिव तो समस्त प्राणियों के स्वामी हैं तथा वशी और कामदेव को भी भस्मीभूत कर देने वाले हैं फिर वे कैसे देवी के द्वारा विमोहित हो गये थे और उन्होंने उसमें एक पुत्र को भी जन्म ग्रहण करा दिया था ? ।१०। हयग्रीव ने कहा—पहिले समय में अमर पुर का स्वामी विजय की श्री तथा समृद्धि से समन्वित था और देव-असुर और मनुष्यों के समुदाय से युक्त त्रैलोक्य का पालन किया करता था।११। वह कैलास के शिखर के समान समुच्च आकार वाले गजेन्द्र पर समारूढ़ होकर सभी लोकों में विचरण करने लग गया था और सबके द्वारा उसकी पूजा की जाती थी। भवानी को पति ने उसको प्रमत्त जानकर जो कि अविनाशी हैं उसके मद का हनन करने की इच्छा की थी। फिर दुर्वासा मुनि को बुलाकर उसके समीप में भेजा था। जो खण्ड मृगचर्म के धारण करने वाले थे और दण्डधारी थे। उनका सब शरीर धूल से मटीला हो रहा था। उनका स्वरूप उन्मत्त जैसा था। वे विद्याधरों के मार्ग से गये थे।१२-१३। इसी बीच में उस समय में कोई विद्याधर की अङ्गना वहाँ पर यदृच्छा से उसके ही आगे समागत हो गयी थी। जिसकी आकृति अधिक सुन्दर थी।१४।
चिरकालेव तपसा तोषयित्वा परांबिकाम् । तत्सर्मार्पितमाल्यं च लब्ध्वा संतुष्टमानसा ॥१५ तां दृष्ट्वा मृगशावाक्षीमुवाच मुनिपुङ्गवः । कुत्र वा गम्यते भीरु कुतो लब्धमिदं त्वया ॥१६ प्रणम्य सा महात्मानमुवाच विनयान्विता ।
१४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चिरेण तपसा ब्रह्मन्देव्य दत्तं प्रसन्नया ।।१७ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः सोऽपृच्छन्माल्यमुत्तमम् । पृष्टमात्रेण सा तुष्टा ददौ तस्मै महात्मने ।।१८ कराभ्यां तत्समादाय कृतार्थोऽस्मीति सत्वरम् । दधौ स्वशिरसा भक्त्या तामुवाचातिहर्षितः ।।१९ ब्रह्मादीनामलभ्यं यत्तल्लब्धं भाग्यतो मया । भक्तिरस्तु पदांभोजे देव्यास्तव समुज्ज्वला ।।२० भविष्यच्छोभनाकारे गच्छ सौम्ये यथासुखम् । सा तं प्रणम्य शिरसा ययौ तुष्टा यथागतम् ।।२१
उस अंगना ने बहुत लम्बे समय तक तप करके परा अम्बिका को प्रसन्न कर लिया था ओर उस अम्बिका के द्वारा अर्पित एक माला को प्राप्त किया था तथा उससे वह परम सन्तुष्ट मन वाली सुप्रसन्न थी ।१५। उस हिरन के समीप सुन्दर नेत्रों वाली को देखकर मुनिश्रेष्ठ ने उससे कहा था—हे भीरु ! आप कहाँ जा रही हो ? और आपने यह कहाँ से प्राप्त की है ? ।१६। उसने महात्माजी को प्रणाम करके नम्रता से कहा—हे ब्राह्मण ! बहुत समय तक तपश्चर्या करने से देवी ने प्रसन्न होकर मुझे यह दी है ।१७। उसके वचन को सुनकर फिर उसने उस उत्तम माला के बावत पूछा था । केवल पूछने ही से परम प्रसन्न हो गयी थी और फिर उस माला को उस महात्मा को दिया था ।१८। उस महात्मा ने उसको अपने दोनों हाथों से लेकर यह कहते हुए कि मैं कृतार्थ हो गया उसको भक्तिभाव अपने शिर में धारण कर लिया था और फिर अति हर्षित होकर उससे कहा था ।१९। जो ब्रह्मादिक के लिए भी अलभ्य है वह आज मैंने भाग्य से प्राप्त की है । आपकी देवी के चरण कमलों में समुज्ज्वल भक्ति होवे ।२०। हे सौम्ये ! परम शोभन आकार वाली आप हैं अब सुख पूर्वक गमन करें । उस अंगना ने भी मुनि को प्रणाम करके और चरणों में शिर रखकर वह जैसे आई थी प्रसन्न होती हुई चली गई थी ।२१।
प्रेषयित्वा स तां भूयो ययौ विद्याधराध्वना । विद्याधरवधूहस्तात्प्रतिजग्राह वल्लकीम् ।।२२
हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १४६
दिव्यस्रगनुलेपांश्च दिव्यान्याभरणानि च । क्वचिद्दधौ क्वचिद्गृह्णन्क्वचिद्गायन्व्वचिद्धसन् ॥२३ स्वेच्छाविहारी स मुनिर्ययौ यत्र पुरंदरः । स्वकरस्थां ततो मालां शक्राय प्रददौ मुनिः ॥२४ तां गृहीत्वा गजस्कन्धे स्थापयामास देवराट् । गजस्तु तां गृहीत्वाथ क्षेपयामास भूतले ॥२५ तां दृष्ट्वा क्षेपितां मालां तदा क्रोधेन तापसः । उवाच न धृता माला शिरसा तु मयार्पिता ॥२६ त्रैलोक्यैश्वर्यमत्तेन भवता ह्यवमानिता । महादेव्या धृता या तु ब्रह्माद्यैः पूज्यते हि सा ॥२७ त्वया यच्छासितो लोकः सदेवासुरमानुषः । अशोभनो ह्यतेजस्को मम शापाद्भविष्यति ॥२८
उस अङ्गना को वहाँ से विदा करके वह मुनि फिर विद्याधरों के मार्ग से गये थे । विद्याधर की वधू के हाथ से वल्लकी का प्रतिग्रहण किया था ।२२। और दिव्य स्रक्-अनुलेप और गन्ध तथा परम दिव्य आभरण भी ग्रहण किये थे । कहीं पर तो इनको धारण कर लेते थे और कहीं पर हाथों में ही ग्रहण करते थे—कहीं पर गान करते जाते थे और कभी हँसते जाते थे ।२३। अपनी ही इच्छा से विहार करने वाले वह मुनि वहाँ पर पहुँचे थे जहाँ पुरन्दर विराजमान थे । फिर उस मुनि ने अपने करों में स्थित उस माला को इन्द्रदेव को समर्पित कर दी थी ।२४। उसको ग्रहण करके देवराज ने उस माला को हाथी के कन्धे पर स्थापित कर दिया । उस गज ने उसको लेकर भूतल में भेज दिया था ।२५। उस समय में उस माला को भूतल में प्रेषित की हुई देखकर तपस्वी को बड़ा क्रोध आ गया था और उसने कहा था कि मेरे द्वारा समर्पित की हुई माला को इन्द्र देव ने शिर पर धारण किया है ।२६। त्रैलोक्य के ऐश्वर्य से प्रमत्त आपने मेरी दी हुई माला का अपमान किया है । जिस माला को महादेवी ने धारण किया था और वह ब्रह्मा आदि के द्वारा पूजी जाया करती है ।२७। तूने देव असुर और मनुष्यों का लोक शासित किया है वह अब मेरे शाप से अशोभन तेज से रहित हो जायगा ।२८।
१५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इति शप्त्वा विनीतेन तेन संपूजितोऽपि सः । तूष्णीमेव ययौ ब्रह्मन्भाविकार्यमनुस्मरन् ॥२६ विजयश्रीस्ततस्तस्य दैत्यं तु बलिमन्वगात् । नित्यश्रीर्नित्यपुरुषं वासुदेवमथान्वगात् ॥३० इन्द्रोऽपि स्वपुरं गत्वा सर्वदेवसमन्वितः । विषण्णचेता निःश्रीकश्चिन्तयामास देवराट् ॥३१ अथामरपुरे दृष्ट्वा निमित्तान्यशुभानि च । बृहस्पतिं समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह ॥३२ भगवन्सर्वधर्मज्ञ त्रिकालज्ञानकोविद । दृश्यतेऽदृष्टपूर्वाणि निमित्तान्यशुभानि च ॥३३ किंफलानि च तानि स्युरुपायो वाऽथ कीदृशः । इति तद्वचनं श्रुत्वा देवेन्द्रस्य बृहस्पतिः । प्रत्युवाच ततो वाक्यं धर्मार्थसहितं शुभम् ॥३४ कृतस्य कर्मणो राजन्कल्पकोटिशतैरपि । प्रायश्चित्तोपभोगाभ्यां विना नाशो न जायते ॥३५
इस रीति से शाप देकर जब वह शान्त हुए तो विनीत उस इन्द्र ने उनका पूजन भी किया था किन्तु हे ब्रह्मन् ! आगे होने वाले कार्य का अनुस्मरण करते हुए वह चुपचाप चले गये थे ।२६। इसके अनन्तर उस इन्द्र की जो विजय की श्री थी वह असुरराज बलि का अनुगमन कर गयी थी और और जो नित्य श्री थी वह नित्य पुरुष वासुदेव के समीप में चली गयी थी ।३०। इन्द्र भी अपने पुर में पहुँच कर सब देवगणों से युक्त होता हुआ श्री से विहीन होकर ही विषाद से युक्त चित्त वाला हो गया था और वह चिन्ता करने लगा था ।३१। इसके पश्चात् उस देवों के पुर में परमाशुभ निमित्तों को उसने देखा था । फिर अपने गुरु बृहस्पतिजी को बुलाकर यह वाक्य उनसे कहा—।३२। हे भगवान् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञाता हैं और तीनों कालों के ज्ञान के महान् पंडित हैं । अब तो ऐसे अशुभ निमित्त दिखलाई दे रहे हैं जो पहिले कभी भी नहीं देखे गये थे । इन सबका क्या
हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १५१
फल होगा और इनका क्या कैसा भी कोई उपाय भी है ? बृहस्पतिजी ने देवराज के इस वाक्य का श्रवण कर फिर उन्होंने धर्मार्थ के सहित परम शुभ वाक्य में उत्तर दिया था ।३३-३४। हे राजन् ! किये हुए कर्मों का फल सैकड़ों करोड़ कल्पों में भी बिना प्रायश्चित्त और उपभोगों के कभी भी विनाश नहीं होता है ।३५।
इन्द्र उवाच- कर्म वा कीदृशं ब्रह्मन्प्रायश्चित्तं च कीदृशम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि तन्मे विस्तरतो वद ॥३६
बृहस्पतिरुवाच- हननस्तेयहिंसाश्च पानमन्यांगनारतिः । कर्म पंचविधं प्राहुर्दुष्कृतं धरणीपतेः ॥३७ ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रगोतुरंगखरोष्ट्रकाः । चतुष्पदोऽण्डजाब्जाश्च तिर्यंचोऽनस्थिकास्तथा ॥३८ अयुतं च सहस्रं च शतं दश तथा दश । दशपंचत्रिरेकार्धमानुपूर्व्यादिदं भवेत् ॥३६ ब्रह्मक्षत्रविशां स्त्रीणामुक्तार्थे पापमादिशेत् । पितृमातृगुरुस्वामिपुत्राणां चैव निष्कृतिः ॥४० गुर्वाज्ञया कृतं पापं तदाज्ञालंघनेऽर्थकम् । दशब्राह्मणभृत्यर्थमेकं हन्याद्द्विजं नृपः ॥४१ शतब्राह्मणभृत्यर्थं ब्राह्मणो ब्राह्मणं तु वा । पंचब्रह्मविदामर्थे वैश्यमेकं तु दंडयेत् ॥४२
इन्द्रदेव ने कहा—हे ब्रह्मन् ! वह कर्म किस प्रकार का है और प्रायश्चित्त कैसा है ? वह सब मैं सुनने का इच्छुक हूँ । वह मुझे विस्तार के साथ बतलाइए ।३६। बृहस्पति जी ने कहा—राजा के लिये पाँच तरह के दुष्कृत कहे गये हैं—किसी का हनन करना—स्तेय (चोरी)—हिंसा—मदिरा पान और अन्य अङ्गना के साथ में रति करना ।३७। ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य, शूद्र, गौ--अश्व, गधा, ऊँट, चतुष्पद--अण्डज--अब्ज—तिर्यक्—
१५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अनास्थिक ये योनियां हैं-इनमें अयुत, सहस्र-शत-दश-दश, पाँच, तीन, एक और आधा क्रम से आरम्भ से अन्त से अन्त तक जन्म धारण करना पड़ता है ।३८-३९। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य और स्त्रियों का ऊपर में कहे हुए अर्थ में पाप समादिष्ट होता है । पिता-माता-गुरु-स्वामी और पुत्रों की निष्कृति होती है ।४०। गुरु की आज्ञा से कृत पाप उसकी आज्ञालंघन में अर्थ पाता है । राजा को दश ब्राह्मणों की भृति (भरण) के लिए चाहिए कि एक द्विजका हनन कर देवे । तात्पर्य यह है कि यदि दश ब्राह्मणों की जीविका की रक्षा होती है तो एक द्विज का हनन कर देना चाहिए ।४१। सौ ब्राह्मणों की भृति के लिए अथवा ब्राह्मण को ब्राह्मण तथा पाँच ब्रह्म (वेद) के ज्ञाताओं के लिए एक वैश्य को दण्ड राजा को दे देना चाहिए ।४२।
वैश्यं दशविशामर्थे विशां वा दंडयेत्तथा । तथा शतविशामर्थे द्विजमेकं तु दंडयेत् ॥४३
शूद्राणां तु सहस्राणां दंडयेद्ब्राह्मणं तु वा । तच्छतार्थं तु वा वैश्यं तद्दशांशं तु शूद्रकम् ॥४४
बंधूनां चैव मित्राणामिष्टार्थे तु त्रिपादकम् । अर्थकलत्रपुत्रार्थे स्वात्मार्थे न तु किंचन ॥४५
आत्मानं हन्तुमारब्धं ब्राह्मणं क्षत्रियं विशम् । गां वा तुरगमन्यं वा हत्वा दोषैर्न लिप्यते ॥४६
आत्मदारात्मजभ्रातृबंधूनां च द्विजोत्तम । क्रमाद्दशगुणो दोषो रक्षणे च तथा फलम् ॥४७
भूपद्विजश्रोत्रियवेदविद्व्रतोवेदान्तविद्वेदविदां विनाशे । एकद्विपंचाशदथायुतं च स्यान्निष्कृतिश्चेति वदंति संतः ॥४८
तेषां च रक्षणविधौ हि कृते च दाने पूर्वोदितोत्तरगुणं प्रवदन्ति पुण्यम् । तेषां च दर्शनविधौ नमने च कार्ये शुश्रूषणेऽपि चरतां सदृशांश्च तेषाम् ॥४९
हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १५३
दस वैश्यों की सुरक्षा के लिये एक वैश्य अथवा वैश्यों को दण्ड दे देना चाहिए। अथवा शत (सौ) वैश्यों का हित सम्पादन होता हो तो एक द्विज को दण्ड दे देना चाहिए ॥४३॥ सहस्त्र शूद्रों के लिए अथवा ब्राह्मण को दण्डित करे। उसके शतार्ध वैश्य को या उसका दशार्ध शूद्र को दण्ड देवे ॥४४॥ बन्धुओं के और मित्रों के अभीष्ट अर्थ में त्रिपाद अर्थात् तीन भाग में और कलत्र तथा पुत्र के लिए भी तीन भाग अर्थ का करे अपनी आत्मा के लिए कुछ भी न करे ॥४५॥ जो आत्मा को अर्थात् अपने को हनन करना आरम्भ करे वह चाहे ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य कोई भी हो अथवा अश्व—गो या अन्य को मारता हो तो उसका हनन करके भी दोषों से लिप्त नहीं होता है ॥४६॥ हे द्विज श्रेष्ठ ! अपनी स्त्री-पुत्र-भाई और बन्धु का हनन करने में दशगुना दोष होता है और रक्षा करने में उतना ही फल भी होता है ॥४७॥ राजा—द्विज—श्रोत्रिय—वेदवेत्ता—व्रती—वेदान्त ज्ञाता और वेदों के मनीषी के विनाश करने में एक-दो-पचास और अयुत गुनी निष्कृति (प्रायश्चित्त) होता है—ऐसा सन्त पुरुष कहते हैं ॥४८॥ और इनकी रक्षा करने की विधि में और दान करने में पूर्व में जो कहा है उससे उत्तर गुना पुण्य कहते हैं। उनके दर्शन की विधि में तथा नमन करने में तथा इनकी सुश्रूषा करने में और इनके सदृश समाचरण करने वालों की भी शुश्रूषा आदि करने में भी वैसा ही फल होता है ॥४९॥
सिंहव्याघ्रमृगादीनि लोकहिंसाकराणि तु ।
नृपो हन्याच्च सततं देवार्थे ब्राह्मणार्थके ॥५०
आपत्स्वात्मार्थके चापि हत्वा मेध्यानि भक्षयेत् ॥५१
नात्मार्थे पाचयेदन्नं नात्मार्थे पाचयेत्पशून् ।
देवार्थे ब्राह्मणार्थे वा पचमानो न लिप्यते ॥५२
पुरा भगवती माया जगदुज्जीवनोन्मुखी ।
ससर्ज सर्वदेवांश्च तथैवासुरमानुषान् ॥५३
तेषां संरक्षणार्थाय पशूनपि चतुर्दश ।
यज्ञांश्च तद्विधानानि कृत्वा चैनानुवाच ह ॥५४
सिंह-व्याघ्र और मृग आदि जो लोगों की हिंसा करने वाले हैं उनको राजा देवों के तथा ब्राह्मणों के लिए निरन्तर हनन कर सकता है ॥५०॥
१५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आवृत्ति के समय में अपने लिए भी हनन करके मेघों (पवित्रों) का भक्षण कर लेवे ।५१। अपने अन्न का पाचन न करे और पशुओं का भी पाचन नहीं करना चाहिए। देवों तथा ब्राह्मणों के लिये यदि पकाया भी जावे तो शेष से लिप्त नहीं होता है ।५२। पहिले इस जगत् के उज्जीवन की ओर प्रवृत्ति वाली भगवती माया ने देवों—असुरों और मानवों का सृजन किया था । उनकी रक्षा के लिए चौदह पशुओं की भी रचना की थी उसी भाँति यज्ञों की तथा उनके विधानों की भी रचना करके इनको बताया था ।५३-५४।
स्तेयपान वर्णन
इन्द्र उवाच—
भगवन्सर्वमाख्यातं हिंसाद्यस्य तु लक्षणम् ।
स्तेयस्य लक्षणं किं वा तन्मे विस्तरतो वद ॥१
बृहस्पतिरुवाच—
पापानामधिकं पापं हननं जीवजातिनाम् ।
एतस्मादधिकं पापं विश्वस्ते शरणं गते ॥२
विश्वस्य हत्वा पापिष्ठं शूद्रं वाप्यंत्यजातिजम् ।
ब्रह्महत्याधिकं पापं तस्मान्नास्त्यस्य निष्कृतिः ॥३
ब्रह्मज्ञस्य दरिद्रस्य कृच्छ्रार्जितधनस्य च ।
बहुपुत्रकलत्रस्य तेन जीवितुमिच्छतः ।
तद्द्रव्यस्तेयदोषस्य प्रायश्चित्तं न विद्यते ॥४
विश्वस्तद्रव्यहरणं तस्याप्यधिकमुच्यते ।
विश्वस्ते वाप्यविश्वस्ते न दरिद्रधनं हरेत् ॥५
ततो देवद्विजातीनां हेमरत्नापहारकम् ।
यो हन्यादविचारेण सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥६
गुरुदेवद्विजसुहृत्पुत्रस्वात्मसुखेषु च ।
स्तेयादधः क्रमेणैव दशोत्तरगुणं त्वघम् ॥७
स्तेयपान वर्णन ] [ १५५
इन्द्र देव ने कहा—हे भगवन् ! आपने हिंसादि का सम्पूर्ण लक्षण बता दिया है। अब स्तेय का क्या लक्षण है—यह भी आप मेरे सामने विस्तार के साथ वर्णन कीजिए ।१। समस्त पापों में अधिक पाप जीव जातियों का हनन करना ही होता है। इससे भी अधिक पाप उसके हनन करने का होता है जो विश्वस्त होवे तथा शरण में समागत हो गया हो ।२। विश्वास देकर पापिष्ठ शूद्र वा अन्त्य जातिज हो जो उसका हनन करता है वह ब्रह्म हत्या से भी अधिक पाप होता है जिसका कोई भी प्रायश्चित्त ही नहीं होता है ।३। जो ब्रह्मज्ञ हो—दरिद्र हो और बड़ी ही कठिनाई से जिसने धन का अर्जन किया हो तथा बहुत पुत्रों और कलत्र वाला हो एवं उसी धन से जो जीवित रहने की इच्छा रखता हो उसके द्रव्य की चोरी इतना महान दोष होता है कि फिर उसका कोई भी प्रायश्चित्त नहीं होता है ।४। जो विश्वस्त हो उसके द्रव्य के हरण करने का पाप उससे भी अधिक होता है। विश्वस्त हो अथवा अविश्वस्त हो दरिद्र के धन का हरण कभी नहीं करना चाहिए ।५। देवों और द्विजातियों के सुवर्ण तथा रत्नों के अपहरण करने वाले को जो बिना ही विचार किये मार डालता है उसको अश्वमेध यज्ञ का पुण्य-फल प्राप्त होता है ।६। गुरु-देव-द्विज-पुत्र-और आत्म सुख के धन की चोरी करता है उसका अधःक्रम से ही दश गुना उत्तर अघ होता है ।७।
अन्त्यजात्पादजाद्वैश्यात्क्षत्रियाद्ब्राह्मणादपि । दशोत्तरगुणैः पापैर्लिप्यते धनहारकः ॥८ अत्रैवोदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । रहस्यातिरहस्यं च सर्वपापप्रणाशनम् ॥९ पुरा कांचीपुरे जातो वज्राख्यो नाम चोरकः । तस्मिन्पुरवरे रम्ये सर्वैश्वर्यसमन्विताः । सर्वे नीरोगिणो दांताः सुखिनो दययांचिताः ॥१० सर्वैश्वर्यसमृद्धेऽस्मिन्नगरे स तु तस्करः । स्तोकास्तोकक्रमेणैव बहुद्रव्यमपाहरत् ॥११ तदरण्येऽवटं कृत्वा स्थापयामास लोभतः । तद्गोपनं निशार्धायं तस्मिन्दूरं गते सति ॥१२ किरातः कश्चिदागत्य तं दृष्ट्वा तु दशांशतः । जहाराविदितस्तेन काष्ठभारं वहन्ययौ ॥१३
१५६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सोऽपि तच्छिलयाच्छाद्य मृद्भिरामूर्य यत्नतः । पुनश्च तत्पुरं प्रायाद्वज्रोऽपि धनतृष्णया ॥१४
अन्त्यज-शूद्र-वैश्य-क्षत्रिय और ब्राह्मण से भी दश गुणोत्तर पापों से धन के हरण करने वाला लिप्त हुआ करता है ।८। इस विषय में एक पुराना इतिहास उदाहृत करते हैं। यह रहस्यों का भी अधिक रहस्य है और पापों का विनाश कर देने वाला है ।६। प्राचीन काल में काञ्चीपुर में एक वज्र नाम वाला चोर उत्पन्न हुआ था। वह पुर ऐसा था कि वहाँ पर बड़ी रम्यता थी और वहाँ के निवासी जन सभी प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त—नीरोग—दान्त—सुखी—और दयान्वित थे ।१०। यह नगर सब तरह के ऐश्वर्य से समन्वित था उससे वह तस्कर ने स्तोकास्तोक अर्थात् न्यूनाधिक क्रम से बहुत से धन का अपहरण किया था ।११। उसको वह जङ्गल में एक गड्ढा बनाकर लोभ से रख दिया करता था । उसका गोपन आधी रात में किया करता था । जब धन रख चला गया था तब किसी किरात ने वहाँ आकर उसको देखा था उसका दशम भाग उसमें से किरात ने ले लिया था। वह तस्कर इसको नहीं जान पाया था। वह किरात तो काष्ठ का भार लेकर चला गया था ।१२-१३। वह तस्कर भी एक शिला से उस गड्ढे को ढक कर और मिट्टी से भरकर फिर उसी नगर में धन की तृष्णा से चला गया था ।१४।
एवं बहुधनं हृत्वा निश्चिक्षेप महीतले ।
किरातोऽपि गृहं प्राप्य बभाषे मुदितः प्रियां ॥१५
मया काष्ठं समाहर्तुं गच्छता पथि निर्जने ।
लब्धं धनमिदं भीरु समाधत्स्व धनार्थिनि ॥१६
तच्छ्रुत्वा तत्समादाय निधायाभ्यंतरे ततः ।
चिंतयंती ततो वाक्यमिदं स्वपतिमब्रवीत् ॥१७
नित्यं संचरते विप्रो मामकानां गृहेषु यः ।
मां विलोक्यैवमचिराद् बहुभाग्यवती भवेत् ॥१८
चातुर्वर्ण्यासु नारीषु स्थेयं चेद्राजवल्लभा ।
किं तु भिल्ले किराते च शैलूषे चांत्यजातिजे ।
लक्ष्मीर्न तिष्ठति चिरं शाताद्वल्मीकजन्मनः ॥१९॥
स्तेयपान वर्णन ] [ १५७
तथापि बहुभाग्यानां पुण्यानामपि पात्रिणे । दृष्टपूर्वं तु तद्वाक्यं न कदाचिद्वृथा भवेत् ॥२० अथ वात्मप्रयासेन कृच्छ्राद्यल्लभ्यते धनम् । तदेव तिष्ठति चिरादन्यद्गच्छति कालतः ॥२१
इस रीति से बहुत सा धन चोर कर वज्र ने भूमि में रख दिया उस किरात ने भी घर में आकर प्रसन्न होते हुए अपनी पत्नी से कहा था ।१५। मैंने काष्ठ का समाहरण करने के लिए वन में गमन करते हुए मार्ग में यह धन प्राप्त किया है । हे भीरु ! आपको तो धन की इच्छा है इसे अब अपने पास रक्खो ।१६। यह श्रवण करके उसने उस धन को ले लिया था और घर में अन्दर रख दिया था । फिर मन में कुछ चिन्तन करती हुई उसने अपने पति से यह वाक्य कहा था ।१७। जो यह विप्र हमारे घरों में नित्य ही सञ्चरण किया करता है । वह मुझ को देखकर कि यह थोड़े ही समय में बहुत भाग्य वाली हो गई है । चारों वर्णों की नारियों में यह यदि राज वल्लभा हो-ऐसा ही कहेंगे । किन्तु भील-किरात-शैलूष और अन्त्य जातीय पुरुष में वाल्मीकि के शापसे यह लक्ष्मी अधिक समय तक नहीं स्थित रहा करती है ।१८-१६। तो भी बहुत भाग्य वाले पुण्यों के पात्र के लिए यह वाक्य पूर्व में देखा गया है और यह कभी भी वृथा नहीं होता ।२०। अथवा जो धन अपने प्रयास से कष्ट के साथ प्राप्त किया जाता है वह ही धन स्थिर होता है और अधिक समय पर्यन्त ठहरता है । इसके अतिरिक्त जो अनायास मिल जाता है वह कुछ ही समय में चला जाया करता है ।२१।
स्वयमागतवित्तं तु धर्मार्थेविनियोजयेत् । कुरुष्वैतेन तस्मात्त्वं वापीकूपादिकाञ्छुभान् ॥२२ इति तद्वचनं श्रुत्वा भाविभाग्यप्रबोधितम् । बहूदकसमं देशं तत्रकव्यलोथयत् ॥२३ निर्ममेऽथ महेंद्रस्य दिग्भागे विमलोदकम् । सुबहुद्रव्यसंसाध्यं तटाकं चाक्षयोदकम् ॥२४ दत्तेषु कर्मकारिभ्यो निखिलेषु धनेषु च । असंपूर्ण तु तत्कर्म दृष्ट्वा चिंताकुलोऽभवत् ॥२५
१५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तं चौरं वज्रनामानमज्ञातोऽनुचराम्यहम् । तेनैव बहुधा क्षिप्तं धनं भूरि महीतले ॥२६ स्तोकं स्तोकं हरिष्यामि तत्र तत्र धनं बहु । इति निश्चित्य मनसा तेनाज्ञातस्तमन्वगात् ॥२७ तथैवाहृत्य तद्द्रव्यं तेन सेतुमपूरयत् । मध्ये जलावृतस्तेन प्रसादश्चापि शाङ्गिणः ॥२८
यह धन तो बिना ही श्रम के आपके पास आगया है। इसका तो धर्मार्थ आपको विनियोग करना चाहिए। अतः आप इस धन से शुभ कर्म बावड़ी—कूप और तालाब आदि के निर्माण करने में व्यय कर दीजिए ।२२। अपनी पत्नी के इस वचन का श्रवण करके जो कि आगे होने वाले भाग्य को सुबोधित करने वाला था उस किरात ने जहाँ-तहाँ पर देखा या कि सभी स्थल अधिक जल वाले थे ।२३। फिर ऐन्द्री दिशा में उसने एक विमल उदक वाला तलाब जो बहुत अधिक धन से बनाये जाने वाला था बनवाया था जिसमें जल कभी भी क्षीण नहीं होता था ।२४। सम्पूर्ण धन काम करने बालों को दे देने पर भी वह काम अपूर्ण देखकर वह चिन्ता से बेचैन हो गया था ।२५। उसने सोचा कि उस वज्र नामक चोर के पीछे उसके बिना जाने हुए मैं गमन करूँ । उसने ही प्रायः भूमि में अधिक धन डाला ही होगा ।२६। वहाँ-वहाँ से ही थोड़ा-थोड़ा करके बहुत-सा धन हरण करूँगा । ऐसा ही मन में निश्चय करके वह उसके बिना जाने हुए उसी के पीछे गया था ।२७। उसी भाँति से उसने उस धन का आहरण किया था और उस सेतु को पूर्ण कर दिया था। उस तालाब के मध्य में जिसके चारों ओर जल था, एक भगवान् विष्णु का प्रासाद भी बनवाया था ।२८।
अमृत मन्थन वर्णन
इन्द्र उवाच- भगवन्सर्वधर्मज्ञ त्रिकालज्ञानवित्तम । दुष्कृतं तत्प्रतीकारो भवता सम्यगीरितः ॥१ केन कर्मविपाकेन ममापदियमागता । प्रायश्चित्तं च किं तस्य गदस्व वदतां वर ॥२