संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चिरेण तपसा ब्रह्मन्देव्य दत्तं प्रसन्नया ।।१७ तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः सोऽपृच्छन्माल्यमुत्तमम् । पृष्टमात्रेण सा तुष्टा ददौ तस्मै महात्मने ।।१८ कराभ्यां तत्समादाय कृतार्थोऽस्मीति सत्वरम् । दधौ स्वशिरसा भक्त्या तामुवाचातिहर्षितः ।।१९ ब्रह्मादीनामलभ्यं यत्तल्लब्धं भाग्यतो मया । भक्तिरस्तु पदांभोजे देव्यास्तव समुज्ज्वला ।।२० भविष्यच्छोभनाकारे गच्छ सौम्ये यथासुखम् । सा तं प्रणम्य शिरसा ययौ तुष्टा यथागतम् ।।२१
उस अंगना ने बहुत लम्बे समय तक तप करके परा अम्बिका को प्रसन्न कर लिया था ओर उस अम्बिका के द्वारा अर्पित एक माला को प्राप्त किया था तथा उससे वह परम सन्तुष्ट मन वाली सुप्रसन्न थी ।१५। उस हिरन के समीप सुन्दर नेत्रों वाली को देखकर मुनिश्रेष्ठ ने उससे कहा था—हे भीरु ! आप कहाँ जा रही हो ? और आपने यह कहाँ से प्राप्त की है ? ।१६। उसने महात्माजी को प्रणाम करके नम्रता से कहा—हे ब्राह्मण ! बहुत समय तक तपश्चर्या करने से देवी ने प्रसन्न होकर मुझे यह दी है ।१७। उसके वचन को सुनकर फिर उसने उस उत्तम माला के बावत पूछा था । केवल पूछने ही से परम प्रसन्न हो गयी थी और फिर उस माला को उस महात्मा को दिया था ।१८। उस महात्मा ने उसको अपने दोनों हाथों से लेकर यह कहते हुए कि मैं कृतार्थ हो गया उसको भक्तिभाव अपने शिर में धारण कर लिया था और फिर अति हर्षित होकर उससे कहा था ।१९। जो ब्रह्मादिक के लिए भी अलभ्य है वह आज मैंने भाग्य से प्राप्त की है । आपकी देवी के चरण कमलों में समुज्ज्वल भक्ति होवे ।२०। हे सौम्ये ! परम शोभन आकार वाली आप हैं अब सुख पूर्वक गमन करें । उस अंगना ने भी मुनि को प्रणाम करके और चरणों में शिर रखकर वह जैसे आई थी प्रसन्न होती हुई चली गई थी ।२१।
प्रेषयित्वा स तां भूयो ययौ विद्याधराध्वना । विद्याधरवधूहस्तात्प्रतिजग्राह वल्लकीम् ।।२२