भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 559, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 559

हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १४६

दिव्यस्रगनुलेपांश्च दिव्यान्याभरणानि च । क्वचिद्दधौ क्वचिद्गृह्णन्क्वचिद्गायन्व्वचिद्धसन् ॥२३ स्वेच्छाविहारी स मुनिर्ययौ यत्र पुरंदरः । स्वकरस्थां ततो मालां शक्राय प्रददौ मुनिः ॥२४ तां गृहीत्वा गजस्कन्धे स्थापयामास देवराट् । गजस्तु तां गृहीत्वाथ क्षेपयामास भूतले ॥२५ तां दृष्ट्वा क्षेपितां मालां तदा क्रोधेन तापसः । उवाच न धृता माला शिरसा तु मयार्पिता ॥२६ त्रैलोक्यैश्वर्यमत्तेन भवता ह्यवमानिता । महादेव्या धृता या तु ब्रह्माद्यैः पूज्यते हि सा ॥२७ त्वया यच्छासितो लोकः सदेवासुरमानुषः । अशोभनो ह्यतेजस्को मम शापाद्भविष्यति ॥२८

उस अङ्गना को वहाँ से विदा करके वह मुनि फिर विद्याधरों के मार्ग से गये थे । विद्याधर की वधू के हाथ से वल्लकी का प्रतिग्रहण किया था ।२२। और दिव्य स्रक्-अनुलेप और गन्ध तथा परम दिव्य आभरण भी ग्रहण किये थे । कहीं पर तो इनको धारण कर लेते थे और कहीं पर हाथों में ही ग्रहण करते थे—कहीं पर गान करते जाते थे और कभी हँसते जाते थे ।२३। अपनी ही इच्छा से विहार करने वाले वह मुनि वहाँ पर पहुँचे थे जहाँ पुरन्दर विराजमान थे । फिर उस मुनि ने अपने करों में स्थित उस माला को इन्द्रदेव को समर्पित कर दी थी ।२४। उसको ग्रहण करके देवराज ने उस माला को हाथी के कन्धे पर स्थापित कर दिया । उस गज ने उसको लेकर भूतल में भेज दिया था ।२५। उस समय में उस माला को भूतल में प्रेषित की हुई देखकर तपस्वी को बड़ा क्रोध आ गया था और उसने कहा था कि मेरे द्वारा समर्पित की हुई माला को इन्द्र देव ने शिर पर धारण किया है ।२६। त्रैलोक्य के ऐश्वर्य से प्रमत्त आपने मेरी दी हुई माला का अपमान किया है । जिस माला को महादेवी ने धारण किया था और वह ब्रह्मा आदि के द्वारा पूजी जाया करती है ।२७। तूने देव असुर और मनुष्यों का लोक शासित किया है वह अब मेरे शाप से अशोभन तेज से रहित हो जायगा ।२८।