संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इति शप्त्वा विनीतेन तेन संपूजितोऽपि सः । तूष्णीमेव ययौ ब्रह्मन्भाविकार्यमनुस्मरन् ॥२६ विजयश्रीस्ततस्तस्य दैत्यं तु बलिमन्वगात् । नित्यश्रीर्नित्यपुरुषं वासुदेवमथान्वगात् ॥३० इन्द्रोऽपि स्वपुरं गत्वा सर्वदेवसमन्वितः । विषण्णचेता निःश्रीकश्चिन्तयामास देवराट् ॥३१ अथामरपुरे दृष्ट्वा निमित्तान्यशुभानि च । बृहस्पतिं समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह ॥३२ भगवन्सर्वधर्मज्ञ त्रिकालज्ञानकोविद । दृश्यतेऽदृष्टपूर्वाणि निमित्तान्यशुभानि च ॥३३ किंफलानि च तानि स्युरुपायो वाऽथ कीदृशः । इति तद्वचनं श्रुत्वा देवेन्द्रस्य बृहस्पतिः । प्रत्युवाच ततो वाक्यं धर्मार्थसहितं शुभम् ॥३४ कृतस्य कर्मणो राजन्कल्पकोटिशतैरपि । प्रायश्चित्तोपभोगाभ्यां विना नाशो न जायते ॥३५
इस रीति से शाप देकर जब वह शान्त हुए तो विनीत उस इन्द्र ने उनका पूजन भी किया था किन्तु हे ब्रह्मन् ! आगे होने वाले कार्य का अनुस्मरण करते हुए वह चुपचाप चले गये थे ।२६। इसके अनन्तर उस इन्द्र की जो विजय की श्री थी वह असुरराज बलि का अनुगमन कर गयी थी और और जो नित्य श्री थी वह नित्य पुरुष वासुदेव के समीप में चली गयी थी ।३०। इन्द्र भी अपने पुर में पहुँच कर सब देवगणों से युक्त होता हुआ श्री से विहीन होकर ही विषाद से युक्त चित्त वाला हो गया था और वह चिन्ता करने लगा था ।३१। इसके पश्चात् उस देवों के पुर में परमाशुभ निमित्तों को उसने देखा था । फिर अपने गुरु बृहस्पतिजी को बुलाकर यह वाक्य उनसे कहा—।३२। हे भगवान् ! आप तो सभी धर्मों के ज्ञाता हैं और तीनों कालों के ज्ञान के महान् पंडित हैं । अब तो ऐसे अशुभ निमित्त दिखलाई दे रहे हैं जो पहिले कभी भी नहीं देखे गये थे । इन सबका क्या