भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 557, कुल 893 में से

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पृष्ठ 557

हयग्रीव अगस्त्य संवाद ] [ १४७

दुर्वाससमथाहूय प्रजिघाय तदंतिकम् । खण्डाजिनधरो दंडी धूलिधूसरविग्रहः । उन्मत्तरूपधारी च ययौ विद्याधराध्वना ॥१३ एतस्मिन्नन्तरे काले काचिद्विद्याधरांगना । यदृच्छया गता तस्य पुरश्चारुतराकृतिः ॥१४

जिसके दर्शन करने से ईश्वर जो सर्वज्ञ हैं वे भी विमोहित हो गये थे। उन्होंने पार्वती जी को भी त्याग करके शीघ्रता से उसके द्वारा रुद्ध होकर रति का विस्तार किया था।८। उसमें असुरों के अर्दन करने वाले एक शासक को उसने उत्पन्न किया था।६। अगस्त्यजी ने कहा—शिव तो समस्त प्राणियों के स्वामी हैं तथा वशी और कामदेव को भी भस्मीभूत कर देने वाले हैं फिर वे कैसे देवी के द्वारा विमोहित हो गये थे और उन्होंने उसमें एक पुत्र को भी जन्म ग्रहण करा दिया था ? ।१०। हयग्रीव ने कहा—पहिले समय में अमर पुर का स्वामी विजय की श्री तथा समृद्धि से समन्वित था और देव-असुर और मनुष्यों के समुदाय से युक्त त्रैलोक्य का पालन किया करता था।११। वह कैलास के शिखर के समान समुच्च आकार वाले गजेन्द्र पर समारूढ़ होकर सभी लोकों में विचरण करने लग गया था और सबके द्वारा उसकी पूजा की जाती थी। भवानी को पति ने उसको प्रमत्त जानकर जो कि अविनाशी हैं उसके मद का हनन करने की इच्छा की थी। फिर दुर्वासा मुनि को बुलाकर उसके समीप में भेजा था। जो खण्ड मृगचर्म के धारण करने वाले थे और दण्डधारी थे। उनका सब शरीर धूल से मटीला हो रहा था। उनका स्वरूप उन्मत्त जैसा था। वे विद्याधरों के मार्ग से गये थे।१२-१३। इसी बीच में उस समय में कोई विद्याधर की अङ्गना वहाँ पर यदृच्छा से उसके ही आगे समागत हो गयी थी। जिसकी आकृति अधिक सुन्दर थी।१४।

चिरकालेव तपसा तोषयित्वा परांबिकाम् । तत्सर्मार्पितमाल्यं च लब्ध्वा संतुष्टमानसा ॥१५ तां दृष्ट्वा मृगशावाक्षीमुवाच मुनिपुङ्गवः । कुत्र वा गम्यते भीरु कुतो लब्धमिदं त्वया ॥१६ प्रणम्य सा महात्मानमुवाच विनयान्विता ।

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